Vedic Dialectics
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वैदिक द्वन्द्वात्मकता :

भूमिका, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, सन्धि, सन्धान (अनुसन्धान द्वारा), निष्कर्ष, उत्कर्ष
(ChatGPT से मैंने दीर्घ आंग्लभाषा लेख का अनुवाद कराया तो उसने अत्यधिक संक्षेप कर दिया और दो बार गम्भीर त्रुटियाँ की जिन्हें सुधरवाना पड़ा,किन्तु अन्तिम लेख ठीक है । शुद्ध हिन्दी कहने पर वह लेख को दुर्बोध बना देता है जिस कारण मैंने प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने के लिए कहा । अभी स्वास्थ्य ठीक नहीं है,वरना इस अत्यन्त महत्वपूर्ण लेख को विस्तार से लिखता,यह पुस्तक के योग्य है ।)
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( ऋग्वेद, उपनिषद्, योगसूत्र, व्यासभाष्य, Kant, Mach, Popper, Hegel, Marx तथा आधुनिक विज्ञान के सन्दर्भ में )

१. भूमिका

(क) पृष्ठभूमि

मनुष्य सत्य की खोज करता है, पर साधारणतः दो बड़ी भूलें करता है।
पहली भूल यह कि जो कुछ इन्द्रियों से प्रकट हो रहा है, वही पूर्ण सत्य है।
दूसरी भूल यह कि जो कुछ बुद्धि को एक बार सुगठित रूप में जँच गया, वही अन्तिम सिद्धान्त है।
इन दो भूलों से दो विपरीत विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं।
एक ओर प्रत्यक्षवाद (Positivism) है, जो कहता है कि इन्द्रिय-प्रदत्त रूप ही ज्ञान का क्षेत्र है; इसके पार जो कुछ कहा जाए, वह निरर्थक है।
दूसरी ओर बेलगाम तत्त्वमीमांसा (Metaphysics) है, जो बिना आत्मशोधन, बिना साधना, बिना अधिकार, केवल शब्द-रचना से परमसत्य की बातें करने लगती है।
वैदिक चिन्तन इन दोनों का अतिक्रमण करता है। वह न तो केवल इन्द्रिय-रूप को अन्तिम मानता है, न केवल कल्पना-रूप को। वह कहता है—पहले देखो कि कथन के भीतर अन्तर्विरोध कहाँ है; फिर देखो कि देखनेवाला कौन है; फिर देखो कि जो प्रकट है, उसके पीछे क्या है; और तब भी किसी मानवीय निष्कर्ष पर अन्तिम विराम मत लगाओ।
यही वैदिक द्वन्द्वात्मकता है = तैत्तीरीय उपनिषद में वर्णित और ऋग्वेद में सङ्केतित ।
यह पद्धति केवल वाद-विवाद नहीं है। यह सत्य-शोधन की विधि है। यह केवल “दो पक्ष” रखने का नाम नहीं। यह अन्तर्विरोध-खोज, मिथ्या-आश्रय-भेदन, साधन-शुद्धि, और अन्ततः सन्धान की पद्धति ( = अनुसन्धान) है।

(ख) अग्रभूमि

आज की दशा यह है कि—
विद्वान् जन प्रायः ग्रन्थ-संग्रह करते हैं, पर अन्तर्विरोध नहीं पकड़ते।
विज्ञानबुद्धि वाले जन यन्त्रों को शुद्ध करते हैं, पर द्रष्टा को शुद्ध नहीं करते।
तत्त्वमीमांसक जन परमसत्य की चर्चा करते हैं, पर आत्मानुशासन नहीं रखते।
समाज-विचारक जन dialectics की बात करते हैं, पर उसे dogma बना देते हैं।
योग की बात करने वाले अनेक जन यम, नियम, ब्रह्मचर्य, चित्त-शोधन को छोड़ कर केवल शरीर-क्रीड़ा में लग जाते हैं।
इसलिए आज आवश्यकता है कि सत्य-अन्वेषण की एक ऐसी पद्धति रखी जाए जो—
सरल हो,
गम्भीर हो,
भारतीय हो,
आधुनिक भ्रमों की परीक्षा कर सके,
विज्ञान, दर्शन, योग, समाज-चिन्तन—सब पर लागू हो सके।
इस लेख का उद्देश्य वही है।
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२. पूर्वपक्ष

मुख्य प्रतिज्ञा
वैदिक द्वन्द्वात्मकता वह पद्धति है जिसमें किसी भी कथन, मत, ग्रन्थ, अनुभव, समाचार, सिद्धान्त, या प्रत्यक्ष को पहले उसकी अन्तःसंगति और अन्तर्विरोध की कसौटी पर परखा जाता है; फिर उसके प्रतिपक्ष को उसी के भीतर से निकाला जाता है; फिर सन्धि की जाती है; और फिर उस सन्धि का लक्ष्यवेधी व्यावहारिक प्रयोग—अर्थात् सन्धान—किया जाता है।
इस सप्तपदी पद्धति का पूर्ण रूप है—
भूमिका → पूर्वपक्ष → उत्तरपक्ष → सन्धि → सन्धान (as per अनुसन्धान) → निष्कर्ष → उत्कर्ष
यहाँ प्रत्येक पद का अपना तकनीकी अर्थ है।

(क) भूमिका

भूमिका का अर्थ केवल भूमिका-लेखन नहीं।
भूमिका का अर्थ है—
विषय की भूमि,
कारण,
सीमा,
प्रसंग,
अभी क्या प्रश्न है,
पहले क्या भ्रम चल रहे हैं,
किस सीमा तक विचार करना है।
भूमिका बिना विचार आरम्भ ही न हो।

(ख) पूर्वपक्ष

पूर्वपक्ष का अर्थ है किसी मत को उसकी सबसे बलवान दशा में रखना।
जिसे खण्डित करना हो, पहले उसे समझो।
जिसे अस्वीकार करना हो, पहले उसे सबसे अच्छी भाषा में रखो।
जिस मत की शक्ति न समझी, उसकी दुर्बलता पहचानना भी सम्भव नहीं।

(ग) उत्तरपक्ष

उत्तरपक्ष केवल विरोध नहीं।
उत्तरपक्ष का अर्थ है—
पूर्वपक्ष के भीतर छिपा विरोध,
उसकी सीमा,
उसका अभाव,
उसका अतिक्रम,
उसका मिथ्या-आश्रय,
उसका असंगत विस्तार,
उसका व्यावहारिक दोष।
यही वह चरण है जहाँ thesis की antithesis उसी के भीतर से निकलती है।

(घ) सन्धि

सन्धि का अर्थ है दो विरोधी पक्षों के बीच ऐसा मिलन खोजना जो दोनों को मिटाए नहीं, पर दोनों को उच्चतर धरातल पर व्यवस्थित करे।
सन्धि का अर्थ “समझौता” नहीं।
सन्धि का अर्थ है—तत्त्वगत संगति।
यदि पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों में आंशिक सत्य है, तो सन्धि उस आंशिक सत्य को उसके उचित स्थान पर बैठाती है।

(ङ) सन्धान

यहीं आधुनिक dialectics की सबसे बड़ी कमी है।
आधुनिक द्वन्द्वात्मकता बहुत बार thesis, antithesis, synthesis तक तो बोलती है; पर सन्धान नहीं जानती।
सन्धान तकनीकी पद है। इसका गम्भीर मूल धनुर्वेद में है।
जैसे धनुर्धर—
लक्ष्य देखता है,
दूरी परखता है,
दिशा ठीक करता है,
धनुष पर बाण चढ़ाता है,
चित्त को एकाग्र करता है,
और फिर लक्ष्यवेध करता है,
वैसे ही चिन्तक या साधक—
पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष से प्राप्त सन्धि को
जीवन, विज्ञान, समाज, साधना, राजनीति, शास्त्र-अध्ययन, या आत्मपरीक्षण के वास्तविक लक्ष्य पर
साधता है।
सन्धान = सन्धि का लक्ष्यवेधी प्रयोग।
यही सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु है।
सन्धान बिना सारी द्वन्द्वात्मकता केवल शब्दरचना बन कर रह जाती है।

(च) अनुसन्धान

अनुसन्धान "सन्धान की पूर्ण विधि" है।
यह शब्द आज बहुत हल्के अर्थ में प्रयुक्त होता है, पर यहाँ इसका अर्थ अत्यन्त गम्भीर है।
अनुसन्धान में यह सब आता है—
प्रमाण-संग्रह
पूर्व परीक्षण
मानदण्ड-निर्धारण
विधि-निर्माण
पुनरावृत्ति
त्रुटि-परीक्षण
अभिलेखन
उत्तरदायित्व
संशोधन
अतः—
सन्धि = तात्त्विक मेल
सन्धान = लक्ष्य पर उसका व्यावहारिक साधन
अनुसन्धान = उस साधन की पूर्ण पद्धति

(छ) निष्कर्ष

इस चरण में पूछा जाता है—
क्या सिद्ध हुआ?
क्या नहीं सिद्ध हुआ?
कहाँ सीमा रह गयी?
कौन-सा भाग अस्थायी है?
कौन-सा भाग व्यवहारोपयोगी है?
कौन-सा भाग पुनः परीक्षण योग्य है?

(ज) उत्कर्ष

उत्कर्ष लेख का भाग नहीं, उसका फल है।
उससे पाठक में क्या उच्चतर विवेक जागा?
कौन-सा मिथ्या-आश्रय टूटा?
कौन-सा नया लक्ष्य स्पष्ट हुआ?
यही उत्कर्ष है।
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३. वैदिक द्वन्द्वात्मकता का मूल बीज : ऋग्वेद और निषेध-पद्धति

बहुत लोग समझते हैं कि “नेति नेति” केवल उत्तरवर्ती उपनिषद्-वाक्य है और प्रारम्भिक वैदिक चिन्तन इतना सूक्ष्म नहीं था। यह समझ अधूरी है।
ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का प्रथम मन्त्र कहता है—

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्

न असत् था, न सत् था।
यह वाक्य नास्तिकता नहीं है।
यह शून्यवाद नहीं है।
यह reality के अभाव का कथन नहीं है।
यह यह भी नहीं कहता कि सत्य विरोधात्मक है।
यह कहता है कि साधारण बुद्धि जिन दो खूँटों पर विचार बाँधती है—सत् और असत्—ultimate reality उन खूँटों से नहीं बँधती।
यही वैदिक निषेध-पद्धति का आरम्भ है।
बाद में उपनिषद् में औपचारिक रूप से “नेति नेति” कहा गया।
पर उसका बीज यहाँ है।
इसलिए सही कथन यह होगा—
“नेति नेति” का सूत्ररूप बाद में स्पष्ट हुआ,
पर उसका अपरोक्ष बीज नासदीय सूक्त में है।
इसका तात्पर्य क्या है?
अर्थ यह नहीं कि reality का कोई आधार नहीं।
अर्थ यह है कि reality को साधारण मानसिक श्रेणियों—being/non-being, अस्ति/नास्ति, यह/वह—में पूर्णतः नहीं बाँधा जा सकता।
यहाँ से वैदिक dialectics का महान नियम निकलता है—
जहाँ मन किसी एक धारणा को अन्तिम आधार बना कर रुक जाता है, वहीं निषेध की आवश्यकता है।
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४. सत्य का “निश्चित आधार” क्यों नहीं कहा जा सकता?

यहाँ सावधानी आवश्यक है।
जब कहा जाता है कि “सत्य का कोई fixed anchor नहीं”, तो इसका अर्थ यह नहीं कि सत्य अस्थिर है।
अर्थ यह है कि अनन्त चैतन्य को कोई सीमित category अन्तिम रूप से बाँध नहीं सकती।
वास्तविकता यदि—
अनन्त है,
चैतन्यस्वरूप है,
आत्मप्रकाश है,
देश-काल-परिमाण से परे है,
तो उसे किसी निश्चित range, domain, bound, frame, या conceptual anchor में कैद करना ही भूल है।
अतः निषेध का अर्थ reality का अभाव नहीं;
निषेध का अर्थ है—सीमित निरूपण का भेदन।
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५. Kant : appearance और thing-in-itself

अब पश्चिमी विचार की ओर चलें।
Kant का एक बड़ा योगदान यह है कि उसने स्पष्ट किया कि जो कुछ मनुष्य जानता है, वह वस्तु का प्रत्ययगत रूप है, वस्तु-स्वरूप स्वयं नहीं।
साधारण रूप में कहें तो—
हमें जो मिलता है, वह appearance (things-to-us) है,
उसके पार thing-in-itself या noumenon है।
यहाँ एक बड़ी भ्रान्ति चलती है कि Kant ने noumenon का निषेध कर दिया। यह असत्य है। उसने noumenon का स्वीकार किया, पर यह कहा कि हमारी सामान्य ज्ञान-रचना appearance के क्षेत्र में बँधी है।

वैदिक चिन्तन से साम्य :-

इन्द्रिय-प्रदत्त रूप अन्तिम नहीं,
ज्ञान mediated है,
जो प्रकट है, वही परमार्थ नहीं,

भेद

Kant के यहाँ noumenon प्रायः सीमा-चिह्न है।
वैदिक चिन्तन में ultimate reality आत्मप्रकाश चैतन्य है, जिसका साक्षात्कार सम्भव है।
अतः Kant महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसने appearance और reality के बीच भेद रखा।
उसकी मर्यादा यह है कि उसके यहाँ noumenon मूलतः सीमा का बोध कराता है;
वैदिक साधना में वही ultimate reality आत्मसाक्षात्कार का विषय बनती है।
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६. phenomena क्या हैं?

यहाँ एक गम्भीर भूल आधुनिक मनुष्य करता है। वह सोचता है—जो आँख से देखा, वही तथ्य है।
परन्तु तथ्य सीधे नहीं मिलता। वह एक प्रक्रिया से बनता है।
प्रकटन (phenomenon) में यह सब सम्मिलित है—

इन्द्रिय-प्रवेश
मन की ग्रहण-प्रक्रिया
अहंकार का रंग
बुद्धि का निर्णय
संस्कार का प्रभाव
आदतों का ढाँचा
पूर्वग्रह का आवरण
भाषा का जाल
इसलिए phenomenon = केवल दृश्य रूप नहीं।
Phenomenon = इन्द्रिय-ज्ञान + मनोवृत्ति + अहंकार-आवरण + बुद्धि-निर्णय + संस्कार-रचना
यही कारण है कि दो मनुष्य एक ही घटना देखकर भिन्न “तथ्य” बताते हैं।
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७. द्रष्टा कौन है?

यह सबसे मूल प्रश्न है।
यदि देखने वाला ही ठीक से ज्ञात नहीं, तो उसका देखा हुआ कैसे ठीक होगा?
जो देखा जा सकता है, वह अन्तिम द्रष्टा नहीं
शरीर देखा जा सकता है
श्वास देखी जा सकती है
विचार देखे जा सकते हैं
स्मृति देखी जा सकती है
भाव देखे जा सकते हैं
वासना देखी जा सकती है
नैतिक दबाव देखा जा सकता है
बुद्धि का तर्क भी देखा जा सकता है
इसलिए इनमें से कोई भी अन्तिम “मैं” नहीं।
मनोवैज्ञानिक “मैं” की परतें :-

आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा

id जैसी वृत्तियाँ
superego जैसा नियन्त्रण
shifting ego
social self
memory-self
ये सब परिवर्तनशील हैं।

भारतीय अन्तःकरण-तत्त्व की भाषा

मन – विकल्प, सङ्कल्प-विकल्प, इन्द्रिय-समन्वय
अहंकार – ‘मैं’ और ‘मेरा’ बनानेवाली वृत्ति
बुद्धि – निश्चय और विवेक
इनके साथ संस्कार
ये सब भी अन्तिम द्रष्टा नहीं। ये उपकरण हैं।
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अन्तिम द्रष्टा

अन्तिम द्रष्टा है—
साक्षी
आत्मा
पुरुष
शुद्ध चैतन्य
वही सबको प्रकाशित करता है।
वह सामान्य अर्थ में object नहीं बनता।
अतः —
मन सोचता है, अहंकार अपनाता है, बुद्धि निर्णय करती है, इन्द्रियाँ समाचार लाती हैं; पर आत्मा साक्षी है।
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८. यदि द्रष्टा विकृत है, तो दर्शन भी विकृत होगा

यह सरल नियम है।
पर आधुनिक चिन्तन इसे बहुत बार भूल जाता है।
त्रुटि चार स्थानों पर हो सकती है—

द्रष्टा में
द्रष्टा की स्थिति में
उपकरण में
व्याख्या में

आधुनिक विज्ञान तीसरे और चौथे क्षेत्र में बहुत प्रबल है।
वह यन्त्र ठीक करता है, माप ठीक करता है, पुनरावृत्ति करता है, गणना करता है, सामूहिक समीक्षा करता है।
पर पहले क्षेत्र — द्रष्टा की शुद्धि — में उसकी पहुँच सीमित है।
यहीं से योग की आवश्यकता प्रारम्भ होती है।
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९. योगसूत्र : चित्त का सम्पूर्ण नियन्त्रण

योगसूत्र का सार “शरीर-व्यायाम” नहीं, बल्कि चित्तवृत्ति-निरोध है।
यहाँ चित्त केवल superficial thought नहीं, बल्कि संपूर्ण मनोमय तन्त्र है।
अष्टाङ्ग इस प्रकार हैं—
यम – सामाजिक और नैतिक नियन्त्रण
नियम – स्वनियन्त्रण
आसन – शरीर को स्थिर और आज्ञाकारी बनाना
प्राणायाम – श्वास-प्रवाह का नियन्त्रण
प्रत्याहार – इन्द्रियों को विषय-धावन से रोकना
धारणा – चित्त को एक देशक्षेत्र में बाँधना
ध्यान – उसी में अखण्ड प्रवाह
समाधि – ध्यान का परिपाक
यह body-neglect नहीं है
जो लोग कहते हैं कि उच्च साधना का अर्थ शरीर की उपेक्षा है, वे योगसूत्र को नहीं समझते।
शरीर योग में अन्तिम नहीं है; पर वह उपेक्षणीय भी नहीं है।
यदि शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, आचरण, वृत्ति—सब अव्यवस्थित हैं, तो चित्त की शुद्धि कैसे होगी?
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बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग योग

पहले पाँच अंग बहिरङ्ग हैं।
अन्तिम तीन अन्तरङ्ग हैं।
इन अन्तिम तीन का संयुक्त रूप संयम है।
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धारणा का यथार्थ

“चित्तदेशबन्धः धारणा”
अर्थात् चित्त को एक निश्चित क्षेत्र में बाँधना।
इसका प्रत्यक्ष फल यह है कि अनावश्यक thought-stream बाहर रहे।
इसलिए “धारणा = thought-control” कहना तब तक उचित है जब तक “thought-control” को सतही suppression न समझा जाए। यह चित्त के क्षेत्र-नियन्त्रण का नाम है।
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१०. व्यासभाष्य का स्थान

योगसूत्र की अनेक व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, पर यह दृष्टि मानती है कि व्यासभाष्य ही उसका पूर्णतः संगत और निर्विरोध विवेचन है।
इस मत का आधार यह है कि किसी भी व्याख्या की कसौटी यह होनी चाहिए—
क्या वह सूत्रों की अन्तःसंगति को बचाती है?
क्या वह योग की साधनात्मक रीढ़ को सुरक्षित रखती है?
क्या वह यम, नियम, ब्रह्मचर्य, चित्तशोधन को गौण नहीं करती?
क्या वह केवल शाब्दिक चातुरी नहीं है?
क्या उसमें lived yogic authority है?
यदि किसी commentary में—
आचरण-विघात,
साधना-विरोध,
अन्तर्विरोध,
अथवा योग को केवल बौद्धिक खेल बना देने की प्रवृत्ति हो,
तो वह व्याख्या भले प्रसिद्ध हो, पर authoritative नहीं मानी जा सकती।
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११. Hegel और Marx : सत्य और भूल

Hegel और Marx की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। उन्होंने देखा कि विचार-संरचना अपने भीतर विरोध रखती है। thesis की सीमा ही उसकी antithesis को जन्म देती है।
यह बहुत गम्भीर बात है।
पर उनकी भूल भी यहीं से प्रारम्भ हुई।

Hegel की भूल :-

उसने dialectical movement को एक विशाल speculative architecture में जड़ कर दिया।
प्रक्रिया जीवित रही नहीं; तन्त्र बन गयी।

Marx की भूल :-

उसने dialectics को ऐतिहासिक-भौतिक अनिवार्यता में बदल दिया।
एक प्रकार की contradiction को समस्त इतिहास का प्रधान तत्त्व मान लिया।

उनके ऊपर मुख्य आपत्ति :-

दोनों ने dialectics को dogma बना दिया।
यहीं वे Socratic पद्धति से दूर हो गये।
सही dialectics कहती है—
thesis को कसो
उससे antithesis निकालो
synthesis तक जाओ
फिर synthesis को भी अन्तिम मत मानो
अर्थात् —
हर synthesis अगली thesis है।
यही जीवित द्वन्द्वात्मकता है।
“हर synthesis अगली thesis है” यह वाक्य यदि बिना सावधानी के रखा जाए, तो वह उसी ऐतिहासिक-क्रमवाद में गिर जाता है जिसमें Hegel, Marx, Spengler, Toynbee आदि फँसे। इन सबमें एक साझा प्रवृत्ति थी — इतिहास को किसी न किसी प्रकार की पेचदार उन्नति-रेखा मानना, मानो मानव-समूह किसी क्रमबद्ध चक्र या screw-जैसी गति से नीचे से ऊपर जा रहा हो। भेद केवल इतना था कि किसी ने उसे विचार-उन्नति कहा, किसी ने भौतिक-उत्पादन-शक्ति और वर्ग-संघर्ष की उन्नति कहा, किसी ने सभ्यताओं के उत्थान-पतन का दीर्घ-ताल माना, और किसी ने चुनौती-प्रतिक्रिया की ऐतिहासिक रचना। पर इन सबमें एक dogma समान रहा—इतिहास को किसी एक बाहरी pattern में बाँध देना।
वैदिक द्वन्द्वात्मकता ऐसा नहीं करती। वह यह नहीं कहती कि प्रत्येक synthesis अनिवार्यतः इतिहास की अगली सीढ़ी बनकर किसी रेखीय या पेचदार प्रगति में बदल जाएगी। वह केवल इतना कहती है कि मानवीय बुद्धि का कोई भी निष्कर्ष अन्तिम नहीं, अतः उस पर पुनः परीक्षण सम्भव है। यह बौद्धिक पुनर्परीक्षण है, न कि इतिहास के लिए कोई mechanical rule। सत्य की खोज में अगला चरण कभी उन्नति होगा, कभी पतन, कभी भ्रम, कभी पुनरावर्तन, कभी विस्मृति, कभी आंशिक पुनर्प्राप्ति; क्योंकि इतिहास का संचालन केवल शास्त्रीय वाक्यों या उत्पादन-शक्तियों से नहीं, बल्कि चेतना, धर्म, अधर्म, संस्कार, शक्ति, लोभ, तप, पतन, स्मृति, विस्मृति, और द्रष्टा की शुद्धि-अशुद्धि से भी होता है। इसलिए सही वाक्य यह होना चाहिए — “कोई भी synthesis अन्तिम नहीं; वह पुनः परीक्षण योग्य है”, न कि “हर synthesis अगली thesis बनकर इतिहास को ऊपर ले जाएगी।” यही बिन्दु वैदिक पद्धति को Hegelian, Marxian, Spenglerian और Toynbee-प्रकार के इतिहास-दोग्मा से अलग करता है।
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१२. Socratic पद्धति और वैदिक पद्धति

Socrates का बल प्रश्न पर था।
वह सामने वाले के कथन में अन्तर्विरोध पकड़ता था।
यह महान पद्धति है।
वैदिक पद्धति इससे भी आगे जाती है, क्योंकि वह केवल कथन-भेदन नहीं करती, वह आत्म-भेदन भी कराती है।
वह पूछती है —
कथन में विरोध कहाँ है?
देखने वाला कौन है?
देखने वाले की अशुद्धि कहाँ है?
जिस सत्य को तुम पकड़ना चाहते हो, क्या वह तुम्हारी category में बँधता भी है?
क्या तुममें उसे जानने का अधिकार है?
इसलिए वैदिक द्वन्द्वात्मकता केवल argument नहीं; साधना भी है।
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१३. Mach और प्रत्यक्षवाद की विकृति

Mach ने विज्ञान को एक दिशा दी जिसमें सिद्धान्त को unobservable reality का उद्घाटन न मानकर phenomena की economy मानने की प्रवृत्ति बढ़ी।
इससे यह मनोवृत्ति बनी कि विज्ञान को केवल प्रकट रूपों के संगठन तक सीमित रहना चाहिए।
यदि इस दृष्टि को कठोरता से मान लिया जाए, तो—
atom, field, spacetime-structure, quantum-state, hidden law — सब सन्दिग्ध हो जाएँगे,
क्योंकि ये इन्द्रियों से सीधे नहीं दिखते।
पर आधुनिक physics वास्तव में क्या कर रही है?
वह phenomena के पीछे छिपे नियम, संरचना, आधार, तत्त्व, सममिति, क्षेत्र—इनकी खोज कर रही है।
अर्थात् वह व्यवहारतः noumenal खोज में लगी है।
इसलिए strict Positivism विज्ञान का सहायक नहीं, रोधक है।

Unified Field Theory और प्रत्यक्षवाद :-

यदि विज्ञान कहे कि केवल वही मान्य है जो प्रत्यक्ष-रूप में उपस्थित है, तो किसी Unified Field Theory का विचार ही कट जाएगा।
UFT का प्रयत्न तो phenomena के पीछे स्थित एकत्व-तत्त्व खोजने का है।
अतः —
कठोर प्रत्यक्षवाद के भीतर एकत्व-तत्त्व का विज्ञान असम्भव है।
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१४. Karl Popper का महत्त्व

Popper ने कहा कि विज्ञान सत्यापन-पूजा पर नहीं, बल्कि सम्भावित खण्डन पर चलता है।
इसका महत्त्व बहुत बड़ा है।
उसने विज्ञान को यह साहस दिया कि—
bold hypothesis रखो
पर उसे पवित्र मत बनाओ
उसे परीक्षा के लिए प्रस्तुत करो
टूटे तो छोड़ो
बचे तो भी अन्तिम मत मानो
यह वैज्ञानिक “नेति” का एक रूप है।

परन्तु Popper की सीमा :-
Popper की पद्धति फिर भी बाह्य रूप से साझा परीक्षण की भूमि पर खड़ी है।
जहाँ object of knowledge ऐसा हो जिसे जानने के लिए observer की आन्तरिक साधना अनिवार्य हो, वहाँ Popper भी पूर्ण समाधान नहीं देता।
उदाहरण —
यदि कोई योगी कहे कि उसने शुद्ध चैतन्य का प्रत्यक्ष अनुभव किया, तो वैज्ञानिक कहेगा — “public proof दो।”
पर यदि उस अनुभव के लिए साधना, चित्तशोधन, ब्रह्मचर्य, प्राणनिग्रह, अन्तर्मुखता अनिवार्य हों, तो उस public proof की माँग अनुचित है; क्योंकि माँग करने वाला स्वयं योग्य नहीं बना।
यहाँ विज्ञान की सीमा स्पष्ट होती है।
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१५. बेलगाम तत्त्वमीमांसा क्यों अधिक घातक हो सकती है?

कई लोग Mach के प्रत्यक्षवाद से ऊबकर सीधे अनियन्त्रित metaphysics में चले जाते हैं। यह और भी बड़ी भूल है। क्यों?
क्योंकि प्रत्यक्षवाद कम-से-कम इतना तो कहता है कि “मैं यहाँ तक ही मानता हूँ।”
पर बेलगाम metaphysics बिना साधना, बिना स्वनियन्त्रण, बिना सत्याचरण, बिना अन्तःकरण-शुद्धि के परमसत्य की चर्चा करती है।
यह वही दशा है जैसे कोई कहे—
मैंने गणित नहीं पढ़ी, पर differential equation पर अन्तिम मत दे रहा हूँ;
मैंने चिकित्सा नहीं सीखी, पर शल्यकर्म करूँगा;
मैंने योग नहीं किया, पर समाधि पर प्रवचन दूँगा।
अतः तत्त्वमीमांसा की भी अपनी योग्यता है।
यम, नियम, ब्रह्मचर्य, चित्तशोधन, अन्तर्मुखता — ये सब बिना उच्चतर तत्त्वचर्चा बहुत बार शुष्क कल्पना बन जाती है।
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१६. विज्ञान को योग की आवश्यकता क्यों है?

यह कथन यदि कच्चे रूप में कहा जाए—“हर वैज्ञानिक को पूर्ण योगी होना चाहिए” — तो कुछ लोग विरोध करेंगे।
पर सूक्ष्म कथन यह है—
बाह्य विज्ञान के लिए
सभी को पूर्ण समाधिस्थ योगी होना आवश्यक नहीं।
क्योंकि बाह्य विज्ञान—
यन्त्र
गणना
पुनरावृत्ति
समीक्षा
मापन
सामूहिक परीक्षा
इनसे बहुत कुछ कर सकता है।
परन्तु सही वैज्ञानिक में यह योगिक गुण अवश्य चाहिए —
पक्षपातहीनता
अहंकार-निग्रह
सत्यनिष्ठा
धैर्य
स्वयं की भूल पकड़ने की क्षमता
पूर्वग्रह-क्षय
इच्छाओं का नियन्त्रण
अर्थात् प्रत्येक अच्छा वैज्ञानिक कम-से-कम आंशिक योगी होना चाहिए।
उच्चतर विज्ञान के लिए
जैसे-जैसे inquiry—
consciousness,
inner experience,
observer-structure,
noumenal depth,
value,
direct awareness
की ओर बढ़ेगी, वैसे-वैसे observer की शुद्धि अनिवार्य होती जाएगी।
अतः —
साधारण बाह्य विज्ञान के लिए आंशिक योगिक अनुशासन पर्याप्त हो सकता है;
पर चैतन्य-विज्ञान के लिए गहन योगिक साधना अपरिहार्य हो जाती है।
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१७. सन्धान : आधुनिक द्वन्द्वात्मकता की खोई हुई कड़ी

अब फिर मुख्य बिन्दु पर लौटें।
Hegel और Marx ने dialectics की शक्ति देखी;
पर आधुनिक dialectics में एक बड़ी कड़ी टूट गयी — सन्धान।
केवल सिद्धान्त से क्या होता है?
यदि मैं बहुत सुन्दर भाषा में लिख दूँ कि—
reality phenomena से परे है,
observer को शुद्ध होना चाहिए,
विज्ञान सीमित है,
योग गम्भीर है,
तो इससे क्या बदलता है?
यदि न जीवन बदले,
न साधना बदले,
न देखने की रीति बदले,
न व्यवहार बदले,
न अनुसन्धान की विधि बने,
तो सब व्यर्थ है।

Marx का अर्धसत्य :-

Marx ने ठीक कहा कि दार्शनिकों ने जगत् की व्याख्या बहुत की; आवश्यकता उसे बदलने की है।
पर इससे पहले एक और वाक्य चाहिए था—
जगत् को बदलने से पहले अपने को बदलो।
अपने असली स्वरूप में स्थित हुए बिना किया गया परिवर्तन प्रायः अहंकार, हिंसा, प्रतिशोध, वर्ग-द्वेष, या सत्ता-लिप्सा का विस्तार बन जाता है।
यही कारण है कि बाह्य क्रान्ति बहुत बार नई दासता बन जाती है।
परिवर्तनकर्ता स्वयं शुद्ध न हो, तो परिवर्तन भी विकृत होगा।

सन्धान का वास्तविक अर्थ :-

अतः सन्धान यह है—
जो सन्धि से समझा, उसे लक्ष्य पर साधो
पर लक्ष्य पर साधने से पहले अपने चित्त को साधो
अपने को साधे बिना किया गया लक्ष्यवेध बहुत बार अन्ध-प्रहार बन जाता है
यही वैदिक द्वन्द्वात्मकता को आधुनिक dialectics से पृथक् करता है।
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१८. अनुसन्धान : सन्धान की पूर्ण पद्धति

अब अनुसन्धान को विस्तार से समझें।
यदि किसी विषय पर वैदिक द्वन्द्वात्मक अनुसन्धान करना हो, तो क्रम यह होगा—
१. विषय-निर्धारण
विषय क्या है?
उदाहरण—योगसूत्र, Kant, विज्ञान की सीमा, समाज-व्यवस्था, भोजन-पद्धति, राजनीति, समाचार।
२. भूमिका
इस विषय की भूमि क्या है?
कौन-से प्रचलित भ्रम हैं?
३. पूर्वपक्ष
विषय को सबसे बलवान रूप में रखो।
४. उत्तरपक्ष
उसकी सीमा, विरोध, दोष, छिपा हुआ प्रतिपक्ष दिखाओ।
५. सन्धि
यदि किसी उच्चतर धरातल पर दोनों का सत्य एकत्र किया जा सकता हो, तो करो।
६. द्रष्टा-परीक्षण
इस विषय को देखने वाला कौन है?
उसके पूर्वग्रह क्या हैं?
उसका लाभ-हानि-सम्बन्ध क्या है?
उसकी साधना-स्थिति क्या है?
उसका उपकरण क्या है?
७. सन्धान
अब इस समझ को वास्तविक लक्ष्य पर साधो।
यही प्रयोग है।
यही क्रिया है।
यही जीवन-सापेक्षता है।
८. पुनर्परीक्षण
लक्ष्य वेधा या नहीं?
फल क्या निकला?
त्रुटि कहाँ रह गयी?
९. अभिलेखन
जो सीखा, उसे सुरक्षित रखो।
१०. उत्तरदायित्व
यदि भूल निकले, तो स्वीकारो।
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१९. शरीर, कार्य, और आत्म-परिवर्तन

यहाँ एक और बिन्दु अनिवार्य है।
कुछ लोग समझते हैं कि उच्च साधना का अर्थ है शरीर की उपेक्षा। यह ठीक नहीं।
मनुष्य शरीर-रक्षा मात्र के लिए नहीं जन्मा, यह ठीक है।
पर यह भी सत्य है कि देह-रूप उपकरण की पूर्ण उपेक्षा कर के दीर्घकालिक कार्य-शक्ति सुरक्षित नहीं रहती।
अतः सही सिद्धान्त यह होना चाहिए—
देह को लक्ष्य मत बनाओ; पर देह को साधन-रूप में उपेक्षित भी मत करो।
उचित आहार
उचित विश्राम
उचित आसन
उचित प्राणनियन्त्रण
उचित इन्द्रियनिग्रह
ये सब कार्य-शक्ति के अंग हैं।
जो देह को ही सब कुछ मानता है, वह भी चूकता है।
जो देह को कुछ नहीं मानता, वह भी चूकता है।
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२०. द्रष्टा-शोधन ही मूल क्रान्ति है

आज संसार परिवर्तन की बातें बहुत करता है।
पर परिवर्तन के नाम पर प्रायः यह होता है—
अहंकार बदलता है, सत्य नहीं
सत्ता बदलती है, चित्त नहीं
नारा बदलता है, वृत्ति नहीं
बन्धन का रूप बदलता है, बन्धन नहीं
इसलिए मूल प्रश्न है—
क्या परिवर्तनकर्ता स्वयं बदला?
यदि नहीं, तो उसका सारा परिवर्तन मिथ्या भी हो सकता है।
यहीं वैदिक वाक्य खड़ा होता है—
स्वयं को जानो, स्वयं को साधो, स्वयं को शुद्ध करो; तभी बाह्य कर्म सत्यफल देगा।
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२१. निष्कर्ष

अब संक्षेप में समस्त विचार को बिन्दुवार रखें।
वैदिक द्वन्द्वात्मकता केवल thesis-antithesis-synthesis नहीं है।
उसका पूर्ण क्रम है —
भूमिका, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, सन्धि, सन्धान(अनुसन्धान द्वारा), निष्कर्ष, उत्कर्ष।
नासदीय सूक्त का “नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्” वैदिक निषेध-पद्धति का आरम्भिक रूप है।
“नेति नेति” reality का निषेध नहीं, सीमित निरूपणों का निषेध है।
ultimate reality अनन्त चैतन्य है; उसे finite category में बाँधना भूल है।
Kant ने thing-to-us और thing-in-itself का महत्त्वपूर्ण भेद रखा।
Mach-प्रेरित कठोर प्रत्यक्षवाद ने विज्ञान को phenomena तक बाँधने की चेष्टा की।
Popper ने विज्ञान को verification-dogma से कुछ अंशों में बचाया।
पर Popperian पद्धति भी observer-qualification की समस्या का अन्तिम समाधान नहीं है।
योगसूत्र चित्तनियन्त्रण की पूर्ण प्रणाली है; उसमें body-neglect का कोई सिद्धान्त नहीं।
यम, नियम, ब्रह्मचर्य, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार — ये सब observer calibration हैं।
धारणा, ध्यान, समाधि अन्तरङ्ग योग हैं; ये एक inner continuum हैं।
व्यासभाष्य का महत्त्व इस दृष्टि में इसलिए है कि वह योगसूत्र की अन्तःसंगति को सुरक्षित रखता है।
Hegel और Marx ने अन्तर्विरोध (inner contradiction) का सत्य भाग देखा, पर dialectics को dogma बना दिया।
Marx ने परिवर्तन की आवश्यकता देखी, पर आत्म-परिवर्तन की अनिवार्यता नहीं जोड़ी।
सन्धान आधुनिक dialectics से लुप्त मुख्य तत्त्व है।
बिना सन्धान, सारी सिद्धान्त-चर्चा निष्फल है।
अनुसन्धान सन्धान की पूर्ण विधि है।
बाह्य जगत् का परिवर्तन तभी शुभ होगा जब परिवर्तनकर्ता स्वयं अपनी मिथ्या-पहचान से ऊपर उठे।
अन्ततः सत्य की खोज में द्रष्टा, दृष्टि, और दृश्य — तीनों की परीक्षा आवश्यक है।
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२२. उत्कर्ष

इस सम्पूर्ण विचार का उच्चतर फल क्या है?
यह कि मनुष्य को अब तीन प्रकार की साधना एक साथ करनी होगी।

१. बुद्धि की साधना

हर कथन में अन्तर्विरोध पकड़ो।
किसी प्रसिद्ध नाम से मोहित मत हो।
न प्राचीन नाम से, न आधुनिक नाम से, न science से, न scripture से।

२. द्रष्टा की साधना

कौन देख रहा है?
अहंकार?
लोभ?
भय?
समूह-दबाव?
आदत?
कुटिल बुद्धि?
या शुद्ध साक्षी की दिशा में बढ़ता हुआ चित्त?

३. कर्म की साधना

जो समझा, उसे साधो।
लक्ष्य पर वेध करो।
यही सन्धान है।
सन्धान बिना दर्शन मरा हुआ है।
सन्धान बिना योग अधूरा है।
सन्धान बिना विज्ञान एक-पक्षीय है।
सन्धान बिना समाज-विचार नारा बन जाता है।
अतः अन्तिम वाक्य यह है—
सत्य केवल देखा नहीं जाता; सत्य के योग्य बना भी जाता है।
सत्य केवल सोचा नहीं जाता; साधा भी जाता है।
सत्य केवल कहा नहीं जाता; सन्धान द्वारा लक्ष्यवेध किया जाता है।
और इसीलिए—
पहले कथन को कसो।
फिर उसके भीतर से प्रतिपक्ष निकालो।
फिर सन्धि करो।
फिर सन्धान करो।
फिर अनुसन्धान करो।
फिर निष्कर्ष निकालो।
फिर भी रुकना मत।
यही वैदिक द्वन्द्वात्मकता है।
यही जीवित चिन्तन है।
यही dogma-विनाशक पद्धति है।
यही सत्य-पथ है।
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बुद्ध, वेद, मौन, अधिकार और नागसेन : एक आवश्यक स्पष्टीकरण

बुद्ध को सीधे “वेद-विरोधी”, “नास्तिक” या “निरात्मवादी” कह देना स्थूल और अशुद्ध पठन है। यह वैदिक द्वन्द्वात्मकता की कसौटी पर भी नहीं टिकता, क्योंकि उसमें पहले मूल वचन, प्रसंग, श्रोता का अधिकार, और बाद की व्याख्या—इन सबका पृथक् परीक्षण आवश्यक है। बुद्ध की रीति यह नहीं थी कि जो भी उच्चतम प्रश्न सामने आए—जैसे आत्मा क्या है, ब्रह्म क्या है, मृत्यु के पार क्या है, परमसत्य को कैसे कहा जाए—उन पर तुरन्त कोई जड़ वाक्य दे दिया जाए। इस विषय में वे वैदिक गुरु-परम्परा के अधिक निकट हैं, न कि आधुनिक वादियों के। जैसे वैदिक आचार्य शिष्य के अधिकार के अनुसार पथ बताते हैं और यह जानते हैं कि ब्रह्म या आत्मा शब्दों से नहीं सिखाए जा सकते, वैसे ही बुद्ध भी अनेक स्थलों पर प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर मार्ग सिखाते हैं। अतः बुद्ध का मौन अज्ञान का लक्षण नहीं, बल्कि प्रश्नकर्ता, प्रश्न-रचना और साधना-उपयोगिता—इन तीनों का विचार है। यह उसी प्रकार का मौन है जैसा सुकरात के यहाँ प्रश्न के अनुशासन में दिखता है—पहले प्रश्न को पकाओ, फिर उत्तर की बात करो।
बुद्ध को वेद-निरसन का प्रतीक बना देना भी अनुचित है। जिन लोगों ने केवल कुछ आलोचनात्मक स्थलों को पकड़कर बुद्ध को पूर्ण वेद-विरोधी सिद्ध करना चाहा, उन्होंने उन स्थलों की उपेक्षा की जहाँ बुद्ध वैदिक प्रतिष्ठित तत्त्वों का सम्मानपूर्वक उल्लेख करते हैं। इसका एक स्पष्ट उदाहरण वह सुप्रसिद्ध गाथा है—

“अग्गिहुत्तमुखा यङ्ङा, सावित्ती छन्दसो मुखं;
राजा मुखं मनुस्सानं, नदीनं सागरो मुखं।
नक्खत्तानं मुखं चन्दो, आदिच्चो तपतं मुखं;
पुञ्ञं आकङ्खमानानं, सङ्घो वे यजतं मुखन्ति॥”
यहाँ “सावित्ती छन्दसो मुखं” कहकर बुद्ध सावित्री को छन्दों का प्रधान कहते हैं; “अग्गिहुत्तमुखा यङ्ङा” कहकर अग्निहोत्र को यज्ञों का प्रधान बताते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि वे वैदिक प्रतिष्ठानों को केवल तिरस्कार की दृष्टि से नहीं देखते। अतः बुद्ध की पद्धति यह है—पहले श्रोता की मान्य, पूज्य, प्रतिष्ठित वस्तुओं को स्वीकारो; फिर उसी आधार पर उसे उच्चतर साधना-पथ की ओर मोड़ो।
बुद्ध का मूल मौन और उनका पथ-प्रधान उपदेश यदि ठीक से न समझा जाए, तो बाद का व्याख्याकार उस मौन को अपनी ओर से किसी निषेधात्मक सिद्धान्त में बदल सकता है। यही मेरी नागसेन-सम्बन्धी आलोचना का केन्द्र है।

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