वैदिक सौन्दर्यशास्त्र − भाग २
|
Table of Contents
|
अर्थसिद्धि के अनुप्रयोग : देवभाषा, इतिहास, महाकाव्य, राष्ट्र और यन्त्रबुद्धि
प्रथम भाग में अर्थसिद्धि की तात्त्विक धुरी प्रतिष्ठित की जा चुकी है। वहाँ यह स्थिर किया जा चुका है कि अर्थ केवल शब्दकोशीय बोध नहीं, अपितु रूप, प्रसंग, तात्पर्य, व्यञ्जना, और सहृदय-चेतना में उद्भूत अन्तर्बोध का क्रमबद्ध प्रकाश है। उस पूर्वभूमि को पुनः दोहराना यहाँ अपेक्षित नहीं। प्रस्तुत द्वितीय भाग का प्रयोजन यह दिखाना है कि वही अर्थसिद्धि जब वास्तविक साहित्य, इतिहास-दृष्टि, राष्ट्र-दृष्टि, धर्ममीमांसा, तथा आधुनिक AI-रचना के क्षेत्र में प्रविष्ट होती है, तब उसका परीक्षण किस प्रकार होता है। दूसरे शब्दों में, प्रथम भाग ने अर्थसिद्धि का तत्त्व दिया था; यह द्वितीय भाग उसके व्यवहार, उसकी कसौटियों, तथा उसके अनुप्रयोग-क्षेत्रों का निरूपण है।
इस भाग का केन्द्रीय प्रतिपाद्य यह है कि जहाँ कहीं भी शब्द, कथा, इतिहास, देवता, राष्ट्र, धर्म, या यन्त्रबुद्धि का प्रश्न उपस्थित होता है, वहाँ निर्णायक तत्त्व बाह्य रूप नहीं, अर्थसिद्धि ही होती है। रूपसिद्धि उसके लिए अनिवार्य अवश्य है, किन्तु यदि रूप शुद्ध हो और अर्थ विपर्यस्त, तो समस्त रचना अन्ततः भ्रम का साधन बन जाती है। इसी कारण वैदिक दृष्टि में भाषा का शोधन केवल व्याकरण का विषय नहीं, बल्कि धर्म, ज्ञान, सौन्दर्य, और समाजबोध की रक्षा का उपकरण है।
१. देवभाषा और मानवभाषा : अर्थसिद्धि की प्रथम परीक्षा
अर्थसिद्धि का प्रथम प्रश्न यह है कि क्या सभी भाषिक प्रयोग समान प्रामाण्य रखते हैं। यदि कोई यह मान ले कि समाज में जो अर्थ सबसे अधिक प्रचलित है, वही स्वयंसिद्ध सत्य है, तो फिर न शास्त्र की आवश्यकता रह जाती है, न धात्वर्थ की, न निरुक्त की, न मीमांसा की। किन्तु भारतीय दृष्टि इस सरलता को स्वीकार नहीं करती। यहाँ देवभाषा और मानवभाषा का भेद इसी कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
देवभाषा वह है जिसमें शब्द अपने मूलतत्त्व से विच्छिन्न नहीं होता। वहाँ ध्वनि, धातु, रूप, और अर्थ के बीच भीतरी सम्बद्धता रहती है। शब्द किसी बाह्य वस्तु का मात्र संकेत नहीं, एक सन्निहित शक्ति का वहन भी करता है। उसके भीतर अर्थ केवल convention से स्थिर नहीं होता, बल्कि उस शब्द की उत्पत्ति, धातु-क्रम, उपसर्ग, प्रत्यय, तथा दीर्घ परम्परा से पोषित अन्तःप्रज्ञा से पुष्ट होता है। इसीलिए वैदिक पदों का अर्थ केवल translation द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता; उनके लिए धातु, निरुक्त, प्रसंग, देवता, ऋषि, तथा सम्पूर्ण मन्त्र-सन्दर्भ की आवश्यकता होती है।
इसके विपरीत मानवभाषा सामाजिक व्यवहार का क्षेत्र है। वहाँ शब्द का प्रयोग समाज की आवश्यकताओं, संप्रेषण की सुविधा, प्रचलन, प्रादेशिक रूढ़ि, और समय-परिवर्तन से रूपान्तरित होता रहता है। इससे भाषा नष्ट नहीं होती; किन्तु उसका अर्थ-क्षेत्र बहुधा मूलधात्वर्थ से दूर भी जा सकता है। इसीलिए अर्थसिद्धि के लिए यह जानना आवश्यक है कि हम किसी शब्द को किस स्तर पर ग्रहण कर रहे हैं। यदि देवभाषिक पद को मानवभाषिक रूढ़ि से समझा जाएगा, तो परिणाम विपर्यस्त होगा। यदि मानवभाषिक प्रयोग को भी हर स्थिति में धात्वर्थ पर ही जकड़ दिया जाएगा, तो व्यवहार की विविधता का न्याय न होगा। अतः अर्थसिद्धि का प्रथम कौशल यह है कि वह शब्द के प्रयोग-स्तर की पहचान करे।
यहीं से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि भाषा का सामाजिक प्रचलन अन्तिम निर्णायक नहीं है। सामाजिक प्रयोग उपयोगी हो सकता है, व्यापक भी हो सकता है, किन्तु प्रामाण्य की दृष्टि से वह स्वतः सर्वोपरि नहीं हो जाता। देवभाषा का क्षेत्र समाज से ऊपर इसलिए नहीं है कि वह समाज-विरोधी है, बल्कि इसलिए कि वह समाज का भी आधारभूत अर्थ-बीज वहन करती है। इसीलिए जहाँ शास्त्रीय अर्थ और प्रचलित अर्थ में विरोध उपस्थित हो, वहाँ अर्थसिद्धि को शास्त्रीय परीक्षण की ओर जाना ही होगा।
२. ऋषिग्रन्थ, प्रक्षेप और अर्थ-परीक्षण
जब देवभाषा और मानवभाषा का भेद समझ में आता है, तब अगला प्रश्न यह उठता है कि विशाल ग्रन्थ-सम्पदा में कौन-सा अंश ऋषि-दृष्टि का है, और कौन-सा उत्तरकालीन प्रक्षेप का। यह प्रश्न केवल philology का प्रश्न नहीं, बल्कि अर्थसिद्धि का प्रश्न है। किसी ग्रन्थ का बाह्य नाम, प्रचलित प्रतिष्ठा, या लोकप्रिय संस्करण उसके प्रत्येक वाक्य को स्वतः ऋषिवाक्य सिद्ध नहीं कर देता। यदि किसी अंश में वैदिक नियम, धात्वर्थ-संगति, धर्मतत्त्व, या मूल पात्र-स्वभाव के विपरीत सामग्री हो, तो उसके परीक्षण की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
यहाँ सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है। प्रक्षेप-विचार का अर्थ यह नहीं कि जो प्रसंग हमारी रुचि या भक्तिभाव से मेल न खाए, उसे तुरन्त अस्वीकार कर दिया जाए। ऐसा करने पर अर्थसिद्धि नहीं, मनोवृत्ति-सिद्धि होगी। किसी अंश की परीक्षा उसके भाषा-विन्यास, व्याकरणिक संरचना, छन्द, प्रसंग-संगति, सामाजिक milieu, पात्रधर्म, तथा व्यापक ग्रन्थ-तत्त्व से की जानी चाहिए। जहाँ यह सब संगत है, वहाँ केवल भावात्मक असुविधा के कारण उसे प्रक्षिप्त कहना अवैज्ञानिक होगा। जहाँ यह सब असंगत है, वहाँ केवल परम्परित श्रद्धा के कारण उसे मूलरचना मान लेना भी उचित नहीं।
इस बिन्दु पर अर्थसिद्धि की शक्ति यह है कि वह किसी अंश को केवल “प्रिय” या “अप्रिय” कहकर नहीं छोड़ती। वह पूछती है—इस पद का तात्पर्य क्या है? यह प्रसंग किस धर्म-संघर्ष को व्यक्त कर रहा है? पात्र का यह निर्णय उसकी पूर्वस्थित प्रकृति से मेल खाता है या नहीं? शब्दों का चयन उस युग और उस वाणी-स्तर के अनुकूल है या नहीं? इस प्रकार अर्थसिद्धि साहित्य-परीक्षण को भावुकता से बचाकर विवेकपूर्ण अनुशीलन में रूपान्तरित करती है।
३. इतिहास : बीत चुका काल नहीं, वर्तमान की जीवित पृष्ठभूमि
आधुनिक “History” और भारतीय “इतिहास” के मध्य मौलिक भेद है। आधुनिक दृष्टि प्रायः अतीत को completed past के रूप में देखती है—एक ऐसी काल-रेखा के रूप में जो घट चुकी, लुप्त हो चुकी, और अब केवल record के रूप में शेष है। भारतीय दृष्टि में इतिहास का प्रयोजन इससे भिन्न है। यहाँ इतिहास का मूल्य इस बात में है कि वह वर्तमान को समझने में कितना सहायक है। जो अतीत वर्तमान में किसी अर्थपूर्ण रूप में जीवित नहीं, वह इतिहास का केन्द्रीय अंश नहीं बनता।
यहाँ “जीवित” का अर्थ केवल लोक-प्रचलन नहीं है। कोई घटना लोककथा में स्मृत हो, यह पर्याप्त नहीं; उसका सम्बन्ध वर्तमान के धर्मनिर्णय, सामाजिक आत्मबोध, नैतिक दिशा, या सांस्कृतिक संवहन से भी होना चाहिए। जिस प्रकार किसी जीवित व्यक्ति की पृष्ठभूमि को जाने बिना उसके वर्तमान स्वभाव का समुचित बोध नहीं हो सकता, उसी प्रकार समाज के वर्तमान को उसके अर्थपूर्ण अतीत से पृथक् करके नहीं समझा जा सकता। इसीलिए इतिहास का प्रयोजन केवल “क्या हुआ” बताना नहीं, बल्कि “आज जो है, वह किन तत्त्वों से बना” यह दिखाना है।
यहीं से यह भी स्पष्ट होता है कि इतिहास की सामग्री अनन्त नहीं हो सकती। अतीत में अनगिनत घटनाएँ घटीं, किन्तु वे सब इतिहास नहीं बनतीं। जो तत्व वर्तमान-संरचना में, लोक-स्मृति में, धर्म-विवेक में, आदर्श-गठन में, अथवा सांस्कृतिक आत्मबोध में प्रवेश कर गए हैं, वही इतिहास के विषय हैं। इस दृष्टि से इतिहास भूतकाल का शवगृह नहीं, वर्तमान का दर्पण है। अर्थसिद्धि इसी कारण यहाँ निर्णायक बनती है, क्योंकि वही यह स्थिर करती है कि अतीत का कौन-सा पक्ष आज भी अर्थवाही है और कौन-सा केवल निष्प्रयोज्य विवरण है।
४. महाकाव्य : युग का सार और भावी युग का मार्ग
इतिहास की यह जीवित अवधारणा महाकाव्य में और भी उच्चतर रूप ग्रहण करती है। महाकाव्य को यदि केवल दीर्घ narrative, वीरकथा, या भावोच्छ्वासयुक्त महान साहित्य मान लिया जाए, तो उसका आधा भी ग्रहण नहीं होता। महाकाव्य वास्तव में किसी युग की समग्र आत्मा का सघन रूप है। उसमें केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि युगधर्म, युगदोष, युगसंघर्ष, और युगसंक्रमण एक केन्द्र में एकत्र हो जाते हैं।
महाकाव्य का नायक भी साधारण पात्र नहीं हो सकता। वह उस युग का धारक होता है। उसके जीवन में समाज का विघटन, धर्म का संकट, लोक की दुर्बलता, और मर्यादा की परीक्षा—सब एकत्र प्रतिबिम्बित होते हैं। इसी कारण महाकाव्य neither comedy nor tragedy है। उसमें हर्ष भी हो सकता है, करुणा भी, युद्ध भी, विरह भी; किन्तु इन सबका अन्तिम प्रयोजन मनोरञ्जन नहीं, युगतत्त्व का उद्घाटन है।
इस दृष्टि से यह कहना समुचित है कि महाकाव्य केवल अपने युग का दर्पण नहीं, अगले युग का मार्गदर्शक भी होता है। यदि कोई महाकाव्य अपने समय की घटनाओं को कहकर समाप्त हो जाए, और भावी काल के लिए कोई धर्मबोध, कोई चेतावनी, कोई दिशा न छोड़े, तो वह इतिहासात्मक हो सकता है, महाकाव्यात्मक नहीं। महाकाव्य का धर्म यह है कि वह युग के प्राणवृत्त को एक ऐसी कथा में रूपान्तरित करे जो आने वाले समाज को अपनी ही गति का पूर्वदर्शन दे सके।
रामायण और महाभारत इसी कारण भारतीय इतिहास-दृष्टि में अद्वितीय हैं। वे घटनाओं का केवल वृत्तान्त नहीं देते; वे युग के भीतर घट रही धर्म-क्षति, लोक-चिन्तन की विकृति, तथा उच्चतर मर्यादा की परीक्षा को मूर्त करते हैं। इस अर्थ में महाकाव्य की अर्थसिद्धि उसके कथानक में नहीं, उसके युग-सार में निहित है।
५. सीता-त्याग : रामायण की अर्थ-गर्भिता का केन्द्र
यदि महाकाव्य को युगसार के रूप में पढ़ा जाए, तो रामायण के भीतर कौन-सा प्रसंग उसके केन्द्रीय अर्थ को सर्वाधिक प्रखरता से उद्घाटित करता है—यह प्रश्न उठता है। इस प्रश्न का उत्तर अनेक दृष्टियों से भिन्न हो सकता है, किन्तु अर्थसिद्धि की कसौटी से देखने पर सीता-त्याग का प्रसंग असाधारण महत्त्व धारण करता है।
यह प्रसंग केवल दाम्पत्य-वियोग नहीं है। यदि इसे केवल पारिवारिक या भावात्मक परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा, तो उसका आधा भी न समझा जाएगा। यहाँ राजधर्म, लोकदृष्टि, मर्यादा, व्यक्तिगत सत्य, सार्वजनिक विश्वास, तथा समाज की आन्तरिक दुर्बलता—ये सब एक ही निर्णय में संकुचित हो जाते हैं। श्रीराम के समक्ष केवल यह प्रश्न नहीं है कि वे निजी रूप से क्या जानते हैं; प्रश्न यह है कि लोक की दृष्टि, राजधर्म की मर्यादा, और राज्य की नैतिक प्रतिष्ठा का वहन किस प्रकार हो। इसीलिए यह प्रसंग कठोर है, व्यथाजनक है, और साथ ही रामायण के अर्थ-कौशल का केन्द्रीय केन्द्र भी है।
यदि कोई इस प्रसंग को केवल आधुनिक भावनात्मक न्याय से पढ़ेगा, तो उसे एक पक्ष दिखाई देगा। यदि कोई इसे केवल निष्करुण राजधर्म के रूप में पढ़ेगा, तो दूसरा पक्ष। किन्तु महाकाव्य की अर्थसिद्धि दोनों को एक साथ देखने का आग्रह करती है। यहाँ सत्य यह भी है कि सीता निर्मला हैं; और यह भी कि लोक में सन्देह उदित हुआ है; और यह भी कि राजा का दायित्व निजी सत्य से व्यापक है; और यह भी कि लोक का यह सन्देह स्वयं युग-दोष का लक्षण है। इस प्रकार यह प्रसंग पात्र-नैतिकता से अधिक समाज-नैतिकता को उद्घाटित करता है। इसी कारण इसे रामायण के भीतर त्रेता की आन्तरिक दरार के रूप में भी देखा जा सकता है।
६. राष्ट्र, भारती, ईला और सरस्वती : अर्थ का समष्टि-विस्तार
अर्थसिद्धि का क्षेत्र केवल शब्द और वाक्य तक सीमित नहीं रहता। जब भाषा समष्टि-चेतना का विषय बनती है, तब राष्ट्र, संस्कृति, गुरु-शिष्य-सम्बन्ध, तथा देवता-संज्ञाएँ भी अर्थमीमांसा के विषय बन जाती हैं। इसी धरातल पर भारती, ईला, और सरस्वती की त्रयी का विचार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
“राष्ट्र” को यदि केवल political state माना जाए, तो उसकी अर्थसिद्धि अत्यल्प होगी। भारतीय दृष्टि में राष्ट्र वह संस्था है जो प्रजा के जीवन को चार पुरुषार्थों के संतुलन में धारण, निर्देशित, और सम्पन्न करे। यहाँ राष्ट्र केवल भूमि-सीमा नहीं; वह जीवित सांस्कृतिक चैतन्य है। इसीलिए उसकी आन्तरिक शक्ति किसी सेनाबल या राजतन्त्र में ही नहीं, बल्कि वाणी, विद्या, गुरु-परम्परा, और सामूहिक बोध में भी निहित होती है।
इसी समष्टि-प्रसंग में भारती, ईला, और सरस्वती को समझना चाहिए। यदि इन्हें केवल देवी-नाम कहकर छोड़ दिया जाए, तो अर्थ का केन्द्रीय सूत्र हाथ से निकल जाएगा। ईला को गुरु-मुखोद्गत दिव्य-बोध की शक्ति के रूप में देखा जा सकता है—वह प्रथम प्रज्वलन है जहाँ शुद्ध अन्तःकरण में सत्य का प्रकाश अवतीर्ण होता है। सरस्वती वह शक्ति है जो इस बोध को ग्रहणकर्ता की बुद्धि, भावना, और कर्म-प्रवृत्ति में प्रवाहित करती है। भारती उस समष्टि-धारणशक्ति का नाम है जिसके द्वारा यह वाणी, यह विद्या, और यह धर्मबोध राष्ट्र के जीवित तन्तु में परिणत होते हैं।
इस प्रकार तिस्रोदेव्याः की अर्थसिद्धि केवल पौराणिक personification नहीं है। वे ज्ञान के अवतरण, संप्रेषण, और समष्टि-धारण की त्रिविध अवस्थाओं का द्योतन करती हैं। जहाँ गुरु है, शिष्य है, राष्ट्र है, और वाणी के माध्यम से धर्म का संवहन है—वहाँ यह त्रयी केवल उपास्य नहीं, अर्थ-प्रणाली की भी केन्द्रीय संरचना है।
७. “वध” और “हत्या” : धर्मार्थ-भेद की अनिवार्यता
अर्थसिद्धि का एक अत्यन्त शिक्षाप्रद उदाहरण “वध” और “हत्या” का भेद है। आधुनिक language models, सामान्य dictionaries, और अपर्याप्त translation-प्रणालियाँ इन दोनों को प्रायः समानार्थक मान लेती हैं, क्योंकि वे शब्दों का निर्णय surface usage और सामान्य co-occurrence के आधार पर करती हैं। किन्तु भारतीय धर्ममीमांसा में यह समानता अस्वीकार्य है।
“हत्या” का सम्बन्ध अधार्मिक, पापकर्मात्मक, स्वार्थजन्य, तामसिक अथवा अन्यायपूर्ण प्राणनाश से है। “वध” कुछ प्रसंगों में दुष्ट-निग्रह, दण्ड, या धर्मसंरक्षणार्थ क्षात्रकर्तव्य का वहन कर सकता है। यहाँ केवल बाह्य क्रिया नहीं, कर्ता, कारण, प्रसंग, धर्माधार, और प्रयोजन—सब मिलकर अर्थनिर्णय करते हैं। यदि इन सबको हटाकर केवल “one word = one equivalent” की पद्धति अपनाई जाए, तो शास्त्रार्थ और धर्मार्थ दोनों नष्ट हो जाएँगे।
यह उदाहरण यह भी दिखाता है कि अर्थसिद्धि बिना धर्ममीमांसा के पूर्ण नहीं हो सकती। शब्द का अर्थ केवल lexical field से नहीं, मूल्य-सरणी और कर्तव्य-सरणी से भी निर्धारित होता है। “वध” और “हत्या” का भेद इसी कारण केवल भाषिक भेद नहीं, धर्म और अधर्म की रेखा का भी सूचक है। यह वह बिन्दु है जहाँ semantics और ethics एक-दूसरे में प्रविष्ट हो जाते हैं।
८. अर्थसिद्धि और यन्त्रबुद्धि : आधुनिक AI के लिए भारतीय रूपरेखा
जब अर्थसिद्धि की यह बहुस्तरीय समझ सामने आती है, तब आधुनिक AI के विषय में एक मूल प्रश्न उठता है। यदि यन्त्रबुद्धि का आधार केवल statistical patterning, token prediction, और विशाल corpus से निकला हुआ अनुमान है, तो क्या वह कभी देवभाषिक या शास्त्रीय अर्थ-क्षेत्र में विश्वसनीय हो सकती है? उत्तर है—नहीं, जब तक उसका आधाररूप पुनर्गठित न किया जाए।
समस्या का मूल यह है कि वर्तमान systems frequency को correctness के लगभग तुल्य मान लेते हैं। जो अर्थ अधिक बार प्रयुक्त हुआ, वह उन्हें अधिक “स्वाभाविक” प्रतीत होता है। किन्तु शास्त्र-क्षेत्र में यही पद्धति घातक है, क्योंकि वहाँ बहुप्रचलित अर्थ भी शास्त्रविरुद्ध हो सकता है, और अल्पप्रचलित अर्थ ही प्रामाणिक हो सकता है। इसीलिए भारतीय AI की रचना में प्रथम और अनिवार्य स्तर stochastic नहीं, rule-based होना चाहिए।
यह rule-based आधार रूपसिद्धि से आरम्भ होगा। अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, सन्धि, समास, प्रत्यय, विभक्ति, लकार, तथा रूपनिर्माण की समूची प्रक्रिया—ये सब यन्त्र के लिए आधारभूमि बनें। इसका तात्पर्य यह नहीं कि AI को केवल व्याकरण-यन्त्र बना दिया जाए; तात्पर्य यह है कि शब्द की उत्पत्ति और वैध रूप-रचना का निर्णय पहले स्थिर किया जाए। जब तक रूप सिद्ध न हो, तब तक अर्थ पर जाने का कोई दृढ़ मार्ग नहीं।
द्वितीय स्तर अर्थसिद्धि का होगा। यहाँ निघण्टु, निरुक्त, अमरकोश, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, वाक्यपदीय, तथा प्रामाणिक gloss corpus सम्मिलित होंगे। यह स्तर केवल synonym mapping नहीं करेगा; यह पूछेगा—धातु क्या है, प्रसंग क्या है, तात्पर्य क्या है, विरोधाभास कहाँ है, मूल्य-सरणी क्या है, और कौन-सा अर्थ शास्त्राधारित है।
तृतीय स्तर शब्दबोध का होगा, जहाँ वाक्यगत सम्बन्ध, कर्ता-कर्म-करण-रूप व्यवस्था, अन्वय-व्यातिरेकी जाँच, तथा प्रसंग-सम्बद्ध अर्थनिर्णय होगा। इसी स्तर पर वाक्य के भीतर अनेक पदों का संयुक्त अर्थ उद्घाटित होगा।
चतुर्थ और अन्तिम स्तर heuristic अथवा ML का हो सकता है। वहाँ ranking, search, summarisation, retrieval, अथवा ambiguous cases का व्यवस्थापन हो। किन्तु यहाँ भी वह स्वामी नहीं, सहायक होगा। उसे अन्तिम निर्णयाधिकार नहीं होगा; वह केवल पूर्वस्थापित शास्त्रीय संरचना के अधीन कार्य करेगा।
यहीं प्रथम भाग की दार्शनिक धुरी पुनः स्मरणीय है। यन्त्र का क्षेत्र मध्यमा और वैखरी तक है। परा और पश्यन्ती का क्षेत्र साधक, द्रष्टा, आचार्य, अथवा सहृदय के अन्तःकरण में स्थित है। इसीलिए AI कला या शास्त्र का उत्पादक-ईश्वर नहीं हो सकता; वह एक अनुशासित साधन भर हो सकता है। जहाँ यह मर्यादा भंग होती है, वहाँ यन्त्रबुद्धि अर्थविपर्यास का साधन बन जाती है।
९. अर्थसिद्धि के दो अवयव : शास्त्र और साहित्य का समन्वय
अर्थसिद्धि की परिपक्व रूपरेखा को दो अवयवों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम अवयव शास्त्राधारित अर्थनिश्चय का है। यहाँ व्याकरण, निरुक्त, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, तथा धर्मशास्त्रीय मूल्य-रचना के आधार पर अर्थ की मूलरेखा स्थिर की जाती है। यह क्षेत्र निर्णायक है, क्योंकि इसी से यह निश्चय होता है कि कौन-सा अर्थ वैध है, कौन-सा अवैध; कौन-सा प्रसंगानुकूल है, कौन-सा नहीं; कौन-सा धात्वर्थसम्मत है, कौन-सा रूढ़ि-जनित विपर्यास।
द्वितीय अवयव साहित्याधारित अर्थविस्तार का है। यहाँ महाकाव्य, पुराण, काव्य, भाष्य, दर्शन, निबन्ध, और व्यापक वाङ्मय के भीतर अर्थ के व्यावहारिक विस्तार को परखा जाता है। शास्त्र मूलरेखा देता है; साहित्य उसके जीवित रूपों को प्रकट करता है। शास्त्र बिना साहित्य के कठोर और संकुचित हो सकता है। साहित्य बिना शास्त्र के शिथिल और भ्रमप्रवण हो सकता है। अतः दोनों का समन्वय ही पूर्ण अर्थसिद्धि का साधन है।
आधुनिक formal logic, semantic graphs, corpus analysis, और computational tools इसी द्वितीय अवयव में उपयोगी हो सकते हैं, यदि वे प्रथम अवयव के अधीन रहें। यदि वे उसी का स्थान ले लें, तो अर्थ का शास्त्रीय मेरुदण्ड टूट जाएगा। इसीलिए भारतीय AI या भारतीय semantics की किसी भी विश्वसनीय योजना को इस द्वि-अवयवी रचना पर खड़ा होना ही होगा।
१०. उपसंहार : अर्थसिद्धि का वास्तविक प्रयोजन
इस द्वितीय भाग का अन्तिम निष्कर्ष यह है कि “अर्थ” को केवल “meaning” मानना अधूरा है। संस्कृत में “अर्थ” वह भी है जो किसी शब्द से बोधित होता है, और वह भी है जिसे चित्त चाहता है, धारण करता है, लक्ष्य बनाता है, तथा साध्य के रूप में प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार अर्थ का एक पक्ष वाच्यार्थ है, दूसरा पक्ष अभिलषित फल है, और तीसरा पक्ष संकल्पित साध्य है। इसी कारण “अर्थसिद्धि” का आशय केवल यह नहीं कि किसी पद, वाक्य, कथा, या शास्त्र का सही अर्थ समझ लिया गया; उसका गम्भीर आशय यह भी है कि चित्त में उदित संकल्प धर्मानुगत मार्ग से चलकर सिद्ध फल में परिणत हो।
यहीं यज्ञ का व्यापक अर्थ निर्णायक बनता है। यज्ञ को यदि केवल वेदिकाग्नि में आहुति तक सीमित कर दिया जाए, तो अर्थसिद्धि का आधा तत्त्व नष्ट हो जाता है। यज्ञ का व्यापक स्वरूप धर्म है—अर्थात् वह सम्यक् विधान जिसके द्वारा इच्छा स्वेच्छाचार न बनकर ऋतबद्ध संकल्प में रूपान्तरित होती है, संकल्प समुचित क्रिया में उतरता है, क्रिया समष्टि-संगति से संयुक्त होती है, और तब फल सिद्ध होता है। इस प्रकार धर्म ही वह विधान है जो इच्छित “अर्थ” को वैध, पवित्र, और स्थायी सिद्धि की दिशा देता है। धर्मविरुद्ध इच्छा भी इच्छा है, किन्तु उसकी सिद्धि अर्थसिद्धि नहीं, विकृति है; क्योंकि वहाँ संकल्प ऋत से विमुख होकर अधःपतन का कारण बनता है। अतः अर्थसिद्धि का तात्त्विक लक्षण है—संकल्प की धर्मसम्मत सिद्धि।
इस दृष्टि से पश्यन्ती और दृश्यसिद्धि का सम्बन्ध भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। पश्यन्ती वह अतीन्द्रिय क्षेत्र है जहाँ अर्थ अभी शब्द, रूप, और स्थूल पदार्थ में प्रकट नहीं हुआ, किन्तु संकल्प-बीज के रूप में विद्यमान है। वहाँ अर्थ अभी अदृश्य है, पर शून्य नहीं; अप्रकट है, पर असत् नहीं। वही अर्थ जब मध्यमा के अनुशासन में रूप-विन्यास, क्रम, साधन, मर्यादा, और क्रियात्मक संरचना ग्रहण करता है, तब वह वैखरी और दृश्य के क्षेत्र में उतरने की सामर्थ्य प्राप्त करता है। अन्ततः दृश्यसिद्धि वही है जहाँ पश्यन्ती का अतीन्द्रिय अर्थ इन्द्रियग्राह्य वस्तुओं, घटनाओं, संस्थाओं, सम्बन्धों, और फलित परिणामों में अवतीर्ण होता है। इसीलिए अर्थसिद्धि को केवल semantics का विषय मानना अल्पदर्शिता है; यह वस्तुतः संकल्प के जगत्-रूप में अवतरण की प्रक्रिया भी है।
इसी आधार पर भाषा, इतिहास, महाकाव्य, राष्ट्र, धर्म, और AI—इन सबकी पुनर्व्याख्या सम्भव होती है। भाषा में अर्थसिद्धि तब है जब शब्द अपने तात्पर्य और प्रयोजन को विकृत किए बिना वहन करे। इतिहास में अर्थसिद्धि तब है जब अतीत वर्तमान के लिए जीवित दिशा बन सके। महाकाव्य में अर्थसिद्धि तब है जब युग का अन्तर्यर्थ कथा में मूर्त हो। राष्ट्र में अर्थसिद्धि तब है जब सामूहिक संकल्प धर्मरूप यज्ञ-विधान द्वारा लोकहितकारी संस्थाओं और आचरणों में परिणत हो। और यन्त्रबुद्धि में अर्थसिद्धि तब है जब वह रूपसिद्धि और शास्त्रीय अनुशासन के अधीन रहकर पश्यन्तीजन्य मानवीय संकल्प को दृश्य-वाचिक साधनों में यथासम्भव अविकृत रूप से वहन करे।
अतः इस समस्त विवेचन का सार यह है कि अर्थसिद्धि का वास्तविक प्रयोजन द्विविध है—पहला, बोध की शुद्धि; दूसरा, संकल्प की सिद्धि। जो शब्द को समझे पर जीवन में उसे फलित न कर सके, उसकी अर्थसिद्धि आधी है। जो इच्छा तो रखे, पर धर्म का विधान न माने, उसकी सिद्धि भी मिथ्या है। पूर्ण अर्थसिद्धि वही है जहाँ सही बोध सही संकल्प को जन्म दे, सही संकल्प धर्मरूप यज्ञ में प्रविष्ट हो, और वही अन्ततः दृश्य-जगत् में सत्य, शुभ, और स्थायी फल के रूप में प्रकट हो।
उत्कर्ष
अर्थ का रहस्य यही है कि वह केवल मन में ठहरी हुई कल्पना नहीं, और केवल शब्द में बन्द संकेत भी नहीं। अर्थ मूलतः संकल्प है—चेतना का वह आन्तरिक अभिमुखीकरण जो किसी सत्य, किसी रूप, किसी फल, किसी साध्य की ओर बढ़ना चाहता है। जब यह संकल्प अविवेचित रहता है, तब वह केवल इच्छा कहलाता है; जब वह धर्म से संयमित होता है, तब वह यज्ञमय होता है; और जब वही यज्ञमय संकल्प रूप, क्रिया, सम्बन्ध, और फल में सिद्ध होता है, तब अर्थसिद्धि घटित होती है।
इसलिए पश्यन्ती को केवल “inner vision” कह देना पर्याप्त नहीं। पश्यन्ती वह सूक्ष्म क्षेत्र है जहाँ जगत् अभी अंकुररूप में है। जो कुछ बाद में दृश्य बनता है—वस्तु, घटना, काव्य, राष्ट्र-व्यवस्था, धर्माचरण, या जीवन-फल—उसका बीज पहले पश्यन्ती में संकल्परूप से स्थित होता है। यदि वहाँ विकार है, तो बाहर विकृत रूप प्रकट होगा। यदि वहाँ शुद्ध संकल्प है, और वह धर्मरूप यज्ञ से अनुशासित है, तो वही बाहर शुभ दृश्यसिद्धि में परिणत होगा। इसीलिए दृश्य-जगत् को पश्यन्ती का स्थूल परिणाम भी कहा जा सकता है।
यहाँ से एक और गम्भीर निष्कर्ष निकलता है। अर्थसिद्धि केवल व्याख्या की विधि नहीं; यह सृष्टि-बोध की विधि भी है। शब्द का अर्थ समझना और जगत् में अर्थ का प्राकट्य देखना—दोनों अन्ततः एक ही तत्त्व की दो दिशाएँ हैं। एक दिशा भीतर से बाहर जाती है—संकल्प से दृश्य तक। दूसरी दिशा बाहर से भीतर लौटती है—दृश्य से तात्पर्य तक। यज्ञ इन दोनों दिशाओं का सेतु है। भीतर का संकल्प यज्ञ द्वारा बाहर फलित होता है; बाहर का दृश्य यज्ञबुद्धि द्वारा भीतर पुनः अर्थवान् होता है। इसी आवागमन में जीवन, संस्कृति, कला, धर्म, और ज्ञान—सभी का प्राण निहित है।
अतः अन्तिम उत्कर्ष यह है कि अर्थसिद्धि को केवल “right meaning” न समझा जाए। वह “right fulfilment” भी है। वह केवल शाब्दिक निश्चय नहीं, बल्कि धर्मानुगत संकल्प की फलसिद्धि है। वह केवल बौद्धिक स्पष्टता नहीं, बल्कि पश्यन्ती के अदृश्य बीज का दृश्य जगत् में सत्य-रूप प्रादुर्भाव है। जहाँ यह तत्त्व समझ में आता है, वहाँ भाषा पुनः वाणी बनती है, इच्छा पुनः संकल्प बनती है, क्रिया पुनः यज्ञ बनती है, और जगत् पुनः अर्थवान् हो उठता है।