सर्वतोभद्रचक्र
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सर्वतोभद्रचक्र

अग्निपुराण से नरपति तक का पौराणिक (सामान्य रूप) एवं यामल (ज्योतिषीय) रूप

शास्त्रीय शोध-निबन्ध

निबन्ध-लक्षण
यह निबन्ध सर्वतोभद्रचक्र को उसके प्राचीन शास्त्रीय धरातल पर समझने का प्रयत्न है। इसमें अग्निपुराण को सर्वतोभद्र का सामान्य मण्डल-शास्त्र, नरपति-परम्परा को उसी सामान्य तत्त्व का ज्योतिषगत प्रयुक्त रूप, तथा Kundalee Software को उस प्रयुक्त रूप का गणनात्मक एवं फलपरीक्षित संरक्षित रूप माना गया है।
यहाँ किसी आधुनिक अल्पदर्शी व्याख्या, जाल-लोक (internet) के चलताऊ मत, अथवा शास्त्र-विरुद्ध सरलीकरण का आश्रय नहीं लिया गया है। प्रस्तुत आलेख में यामल तन्त्रोक्त सर्वतोभद्रचक्र की संरचना को “नरपति-प्रारूप” (model) कहा गया है क्योंकि नरपति कवि ने ही इस आगम यामल चक्र को हमलोगों तक पँहुचाया ।


उपोद्घात

सर्वतोभद्रचक्र भारतीय शास्त्रपरम्परा में उन विरल मण्डलों में है जिनमें ध्वनि, दिशा, काल, नक्षत्र, राशि, तिथि, वार, ग्रह, देवता, वेध, तथा फल—ये सब एकीकृत रूप से प्रतिष्ठित किए जाते हैं। इसे यदि केवल अक्षर-चक्र कहा जाए, तो इसका नक्षत्रार्थ नष्ट हो जाता है; यदि केवल नक्षत्र-चक्र कहा जाए, तो इसका ध्वनि-तत्त्व खो जाता है; यदि केवल प्रश्न-चक्र कहा जाए, तो देश, पण्य, रोग, युद्ध, तथा नामाधारित फलसिद्धि अनिर्वचनीय हो जाती है। अतः सर्वतोभद्र का स्वरूप समेकित है, खण्डित नहीं।

इस समेकित स्वरूप को समझने के लिए दो स्तर स्वीकार करने पड़ते हैं।
प्रथम, सामान्य स्तर, जहाँ सर्वतोभद्र एक मूल मण्डल-व्याकरण के रूप में खड़ा है।
द्वितीय, प्रयुक्त स्तर, जहाँ वही व्याकरण किसी विशिष्ट कार्य — जैसे पूजा, ज्योतिष, प्रश्न, रोग, युद्ध, देश, पण्य, अथवा नामफल — के लिए विशेष रूप ग्रहण करता है।

अग्निपुराण का महत्त्व इसी कारण है कि वह सर्वतोभद्र को पहले एक सामान्य मण्डल-व्याकरण के रूप में प्रस्तुत करता है। वहाँ कोष्ठ, पद्म, पीठ, वीथी, द्वार, शोभा, उपशोभा, भद्र, व्यूह, तथा विभिन्न क्षेत्र-विस्तारों का विधान है। इसके विपरीत नरपति-परम्परा उस सामान्य व्याकरण को ज्योतिषगत कार्यरूप देती है। वहाँ ग्रहवेध, नक्षत्र, स्वर, वर्ण, राशि, तिथि, दिशा, अस्त, उदित, नाड़ी, रोग, युद्ध, प्रश्न, देश, पण्य, तथा नाम — इन सबका एक संयुक्त पठन सम्भव है।

अतः इस निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य यह है कि अग्निपुराण सर्वतोभद्रचक्र का सामान्य तत्त्व-विन्यास देता है, और नरपति उसी सामान्य तत्त्व का ज्योतिषगत प्रयुक्त रूप प्रस्तुत करता है। इस प्रतिपाद्य के आलोक में नरपति-प्रारूप (प्रारूप) का विवेचन, और उसके भीतर निहित द्विविध वेध-पद्धति का अन्वेषण, इस निबन्ध का मुख्य प्रयोजन है।


सर्वतोभद्र का सामान्य तत्त्व

२.१ सर्वतोभद्र पहले मण्डल है, बाद में उपयोग

सर्वतोभद्र का मूल स्वरूप एक सुव्यवस्थित चतुरस्र क्षेत्र है। यह क्षेत्र कोष्ठों में विभक्त होता है; इसके भीतर पद्मक्षेत्र, पीठ, बाह्य पङ्क्ति, वीथी, द्वार, शोभा, उपशोभा, तथा मध्य-भद्र की व्यवस्था सम्भव होती है। इस प्रकार सर्वतोभद्र किसी एक प्रयोजन के लिए बना हुआ आकस्मिक चित्र नहीं, बल्कि ऐसा क्षेत्र है जो अनेक प्रकार की शास्त्रीय अर्थ-रचनाओं को धारण कर सकता है।

यही कारण है कि उसके भीतर एक ही प्रकार की सामग्री सदा नहीं रहेगी। कहीं देवता-व्यूह आरोपित होंगे, कहीं ध्वनि-विन्यास, कहीं नक्षत्र-विन्यास, कहीं राशि-दिक्-विन्यास, कहीं तिथि-वार, कहीं रोगफल, कहीं युद्धफल, कहीं पण्यगति। जो इस मूल तत्त्व को नहीं समझता, वह सर्वतोभद्र को केवल खानों की तालिका बना देता है।

२.२ एकत्व और रूपभेद

अग्निपुराण का वचन—“सत्पन्थास्तु मूर्तिभेदेन विभक्तं मन्यतेऽच्युतम्”—इस प्रकरण का केन्द्रीय दार्शनिक सूत्र है। इसका तात्पर्य यह है कि एक अदृश्य सत्ता ब्रह्म वा अच्युत है और बाकी सब विस्तार हैं। सम्पूर्ण मण्डल एक ही ब्रह्मतत्त्व का रूप-विस्तार है। उसके भीतर जो भेद हैं वे कार्यगत, रूपगत, और प्रयोजनगत हैं; वे अन्तिम तत्त्वभेद नहीं हैं।

यही कारण है कि एक ही सर्वतोभद्र कभी परमब्रह्म-व्यूहों का पूजामण्डल बन सकता है, कभी ज्योतिषगत वेध-क्षेत्र, कभी युद्ध-विचार का साधन, कभी रोग-विचार का, कभी देश-विचार का, कभी पण्य-विचार का। तत्त्व एक है; उपयोग अनेक हैं।

२.३ बाह्य, मध्य, अन्तः — अर्थ-स्तरों का क्रम

सर्वतोभद्र की परतें केवल ज्यामिति नहीं हैं। बाह्य परिधि का सम्बन्ध प्रायः दिक्, पहचान, प्रवेश, प्रसार, और सार्वजनिक प्रक्षेपण से होता है। मध्य स्तर सम्बन्ध, अनुशासन, विन्यास, और वितरण का स्तर है। आभ्यन्तर स्तर बीज, काल, और तत्त्व-समाहार का है। इसीलिए आगे नरपति-प्रारूप में बाह्य नक्षत्र-क्षेत्र, मध्य वर्ण-क्षेत्र, राशि-दिक्-क्षेत्र, तथा आन्तरिक काल-क्षेत्र का संयोजन शास्त्रीय रूप से संगत बैठता है।


अग्निपुराण : सर्वतोभद्र का मण्डल-व्याकरण

३.१ चतुरस्र क्षेत्र और कोष्ठ-विभाग

अग्निपुराण पहले साधक, शुद्धभूमि, देवतायतन, तथा हरि-ईश्वर-पूजन का विधान करता है। इससे ज्ञात होता है कि सर्वतोभद्र केवल तकनीकी रचना नहीं, संस्कारित क्षेत्र है। इसके बाद चतुरस्र क्षेत्र निर्मित किया जाता है और उसमें कोष्ठ-विभाग आरम्भ होता है। यह प्रारम्भ ही बताता है कि चक्र का रूप आकस्मिक नहीं, विधिसम्मत है।

जब कोष्ठ-विभाग से पद्म, पीठ, वीथी, द्वार, तथा विभिन्न स्तर निकलते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वतोभद्र का आधार गणितीय-रेखात्मक अनुशासन है। कोई भी प्रयुक्त रूप उसी अनुशासन का विशेष आरोप है।

३.२ पद्मक्षेत्र, कर्णिका, केशर, दल, दलसन्धि, दलाग्र

अग्निपुराण केवल वर्गाकार कोष्ठों का विधान करके नहीं रुकता; वह पद्मक्षेत्र रचता है। वृत्त बनाया जाता है। उसके भीतर कर्णिका-क्षेत्र, केशर-क्षेत्र, दलसन्धि, तथा दलाग्र के पृथक् विभाग किए जाते हैं। कोणसूत्र और दिक्सूत्र फैलाकर अष्टपत्र, द्वादशदल, और अन्य पद्मरूप सिद्ध किए जाते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि सर्वतोभद्र का मूल स्वभाव केन्द्र और विस्तार के बीच जीवित सम्बन्ध को व्यक्त करना है।

यदि यही तत्त्व आगे नरपति-प्रारूप में ध्वनि, नक्षत्र, राशि, और काल के रूप में पढ़ा जाए, तो यह अग्निपुराण के विपरीत नहीं, उसी का कार्यरूप है।

३.३ पीठ, वीथी, द्वार, शोभा, उपशोभा

अग्निपुराण में पद्म के बाहर पीठ आती है, फिर पंक्ति, फिर वीथी, फिर दिशाओं में द्वार, फिर शोभा, फिर उपशोभा। इन सबका तात्पर्य यह है कि सर्वतोभद्र के विभिन्न स्थल समान प्रकार के नहीं हैं। कुछ प्रवेश-द्वार हैं, कुछ पथ हैं, कुछ पार्श्व-विस्तार हैं, कुछ मध्य-स्थिरता के सूचक हैं। यही तत्त्व बाद में नरपति-प्रारूप में स्वर−कोण-द्वार और व्यञ्जन−स्तम्भ-द्वार की व्याख्या के लिए आधार देता है। (शतपद चक्र में व्यञ्जन−स्तम्भ का प्रयोग हुआ है जो वस्तुतः सर्वतोभद्र से ही निःसृत है ।)

३.४ भद्र, व्यूह, और रूप-बहुलता

अग्निपुराण कहीं नवव्यूह का विधान करता है, कहीं पञ्चविंशतिव्यूह का, कहीं मध्य-भद्र का, कहीं भद्राष्टक का, कहीं द्वार-द्वादशक का, कहीं अधिक विस्तीर्ण क्षेत्र-विभाग का। इससे यह सिद्ध होता है कि सर्वतोभद्र किसी एक चित्र के साथ जड़ नहीं है। वह एक मूल संरचना है जिसमें प्रयोजनानुसार विभिन्न रूप विकसित किए जा सकते हैं।

यही तथ्य नरपति-प्रारूप की वैधता का सामान्य शास्त्रीय आधार बनता है। यदि अग्निपुराण बहुरूप-विन्यास को स्वीकार करता है, तो ज्योतिषगत प्रयुक्त रूप का अस्तित्व स्वाभाविक है।

३.५ मध्य-तत्त्व और समष्टि

अग्निपुराण में परमब्रह्म-पूजा, वासुदेवादि-व्यूह, तथा एक-पङ्कज में बहुव्यूह-पूजा का विधान इस बात का सूचक है कि मण्डल का मध्य केवल एक स्थानीय केन्द्र नहीं, बल्कि समष्टि का तात्त्विक संकेत है। इसी कारण बीच का ब्रह्म-स्थान (आकाश का प्रतिबिम्ब) सम्पूर्ण मण्डल की एकता का द्योतक है, न कि शेष से विच्छिन्न कोई पृथक् “अत्यधिक-बलवान” छोटा खण्ड।


नरपति-प्रारूप की रूप-संरचना

४.१ बाह्य ३२ कोष्ठ : २८ नक्षत्र और ४ स्वर−कोण-द्वार

Kundalee Software में संरक्षित नरपति-प्रारूप के अनुसार बाह्य ३२-कोष्ठ में २८ नक्षत्र हैं और चार बाह्य कोण स्वर-स्थान मात्र नहीं, बल्कि स्वर-द्वार हैं। यह बिन्दु नरपति-प्रारूप का जीवन है। यदि इन कोणों को केवल चार स्वर-खानों के रूप में समझा जाए, तो उनकी द्वार-भूमिका लुप्त हो जाती है। वस्तुतः इन्हीं के द्वारा स्वर-धारा सम्पूर्ण चक्र की कर्ण-रेखाओं में विस्तार ग्रहण करती है।

इस प्रकार बाह्य ३२ कोष्ठ का अर्थ यह नहीं कि २८ नक्षत्रों के साथ चार अतिरिक्त रिक्त स्थान हैं; बल्कि यह कि नक्षत्र-परिधि के साथ स्वर-प्रवेश की चार दिशात्मक संधियाँ हैं। अग्निपुराणीय द्वार-तत्त्व के साथ इसका गहरा साम्य है।

४.२ २४ कोष्ठ का व्यञ्जन-वलय

अगला २४-स्तर मुख्य व्यञ्जन-वलय है। किन्तु यह सम्पूर्ण व्यञ्जन-संख्या का प्रत्यक्ष प्रदर्शन नहीं करता। यह दृश्य व्यञ्जन-विन्यास है। इसके भीतर अक्षर-तत्त्व का विस्तार स्तम्भों के माध्यम से आगे बढ़ता है। इसलिए २४ यहाँ दृश्य विन्यास है, अन्तिम समष्टि नहीं।

४.३ चार स्तम्भ — अतिरिक्त १२ व्यञ्जनों के द्वार

नरपति-प्रारूप के अनुसार चार स्तम्भ अतिरिक्त १२ व्यञ्जनों के प्रवेश-द्वार हैं। इस प्रकार २४ + १२ = ३६ व्यञ्जन-संरचना सिद्ध होती है। यहाँ स्तम्भ महज रेखाचित्र के विभाजन-बिन्दु नहीं; वे अक्षर-प्रवाह के नियामक केन्द्र हैं। इस कारण व्यञ्जन-क्षेत्र को बन्द वृत्त नहीं, द्वार-युक्त विस्तार के रूप में पढ़ना चाहिए।

मूल व्यञ्जन ३३ हैं जो ३३ कोटि देवताओं के प्रतीक हैं,क्ष त्र ज्ञ मिलाकर ३६ हैं जिनमें १६ शक्तिस्वरूपा स्वरों को मिलाकर ५२ और ॐ को मिलाकर अक्षमाला के ५३ अक्षर हैं । अव्यक्त को व्यक्त नहीं करते,वरना ५४ वाममार्ग के पाठ और ५४ दक्षिणपाठ मिलाकर १०८ मूल धातु हैं — अलिखित ऐन्द्र व्याकरण के जो कुण्डलिनी में कार्यरत रहते हैं ।

पूर्व-दिशा में “क” (देवताओं में प्रथम ; “क” देव को हविषा विधेम : ऋग्वेद) का स्थान और वहाँ से क्रम का आरम्भ यह सूचित करता है कि वर्ण-संरचना भी दिशा-नियत है, न कि निरपेक्ष वर्णसूची।

४.४ स्तम्भ-क्रम — पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर

Kundalee Software की परम्परागत व्याख्या में स्तम्भ-क्रम पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर माना गया है। यह क्रम सामान्य समतलीय घड़ी-दृष्टि (clockwise) से नहीं, बल्कि आकाश से पृथ्वी की ओर आरोपित काल-दिशा के रूप में समझा जाता है। इससे स्पष्ट है कि नरपति-प्रारूप में दिक् स्थिर रेखा नहीं, बल्कि काल-संचालित क्षेत्र है। काल की यह दिशागति पारम्परिक पञ्चाङ्गों में उल्लिखित रहती है ।

४.५ १६ कोष्ठ का राशि-दिक्-वलय

अगले १६-स्तर में १२ राशियाँ और ४ दिक्-मध्य हैं। Kundalee Software की सामग्री में स्पष्ट कहा गया है कि प्रत्येक दिशा में तीन-तीन राशियाँ स्थित हैं, और जिस दिशा-त्रय में सूर्य हो वही दिशा अस्त मानी जाती है। इससे १६-स्तर का स्वरूप स्पष्ट होता है—यह राशि-समूह मात्र नहीं, बल्कि राशि-संलग्न दिक्-नियमन-चक्र है।

४.६ अन्तर्नवक और मध्य-ब्रह्मचिह्न

अन्तर्नवक में पाँच कोष्ठ वार-तिथि-सम्बन्धी काल-विन्यास के लिए ग्रहण किए जा सकते हैं, और चार कोने सूक्ष्म स्वर-तत्त्वों के लिए। किन्तु मध्य-ब्रह्म-स्थान का अर्थ यहाँ किसी एक पृथक् महाकोष्ठ से अधिक है। वह समग्र चक्र-एकता का द्योतक है। वह पूरे क्षेत्र का तात्त्विक केन्द्र है, न कि केवल एक स्थानीय अत्युच्च फल-स्थान। मध्य-ब्रह्म-स्थान मन्दिर में गर्भगृह और आवास में आँगन के तुलसी चौरा हेतु नियत रहता है ताकि आकाश से सम्पर्क बना रहे । आकाश से सम्पर्क हेतु ही आँगन का तुलसी चौरा खुले आकाश के नीचे रहता है और मन्दिर का गर्भगृह ऊँचे शिखर के नीचे । सर्वतोभद्रचक्र में यह पूर्णातिथि का स्थान है जिसकी पूर्णाहुति पर दर्शपौणमास यज्ञ की परिपाटी थी ।


नरपति-प्रारूप के द्विविध वेध-रूप

नरपति-प्रारूप की पूर्ण समझ के लिए इसके वेध-तन्त्र को द्विविध रूप में ग्रहण करना आवश्यक है।

५.१ जन्मकालिक ग्रहवेध

प्रथम रूप वह है जिसमें जातक के जन्माधारित, नामाधारित, अथवा स्थिर तत्त्वों पर ग्रहों का वेध देखा जाता है। इसमें जन्मनक्षत्र, नामाक्षर, स्वर, वर्ण, राशि, तिथि, तथा नाड़ी-स्थान के सम्बन्ध में ग्रहवेध की परीक्षा की जाती है। Kundalee Software में संरक्षित नियमों के अनुसार—

  • नाम के स्वर या वर्ण पर एक क्रूरवेध उद्वेग देता है, दो भय, तीन हानि, चार रोग, और पाँच मृत्यु-तुल्य कष्ट।
  • नक्षत्र-विद्ध होने पर भ्रम, अक्षर-विद्ध होने पर हानि, स्वर-विद्ध होने पर रोग, तिथि-विद्ध होने पर भय, राशि-विद्ध होने पर महाविघ्न, और पंचविद्ध होने पर मृत्यु कही गयी है।
  • सूर्य-वेध सन्ताप, मङ्गल-वेध धनहानि, शनि-वेध रोग-पीड़ा, राहु-केतु-वेध विघ्न, शुक्र-वेध रतिसुख, बुध-वेध प्रज्ञा, और गुरु-वेध सर्वशुभफल देता है।

यह रूप स्थिराधारित है। यह जातक के मूल विन्यास पर ग्रह-प्रहार की परीक्षा है।

५.२ वर्तमान ग्रहवेध

द्वितीय रूप वर्तमानकालिक ग्रहस्थितियों से उत्पन्न वेध का है। यह रोगारम्भ, यात्रा, प्रश्न, युद्ध, देश, तथा पण्य-विचार में विशेष महत्त्व रखता है। Kundalee Software के अनुसार—

  • जो तिथि, राशि, अंश, नक्षत्र क्रूरग्रह से विद्ध हो, उसे शुभकर्मों में त्याज्य कहा गया है।
  • रोगारम्भकाल में वेधकारक ग्रह क्रूर और वक्री हो तो मृत्यु; शुभ और वक्री हो तो दीर्घरोग।
  • शत्रु का क्रूरविद्ध स्थान आक्रमणयोग्य; दुर्ग का विद्ध स्थल भेदनयोग्य; योद्धा के नक्षत्र से जिस अङ्ग में वेध पड़े, उसी अङ्ग में प्रहार से विजय।
  • प्रश्नकालिक लग्न क्रूरविद्ध हो तो कार्यासिद्धि नहीं; शुभवेध से सिद्धि; मिश्रवेध से मिश्रफल।

यह रूप गोचरगत और वर्तमानकालीय है।

५.३ वर्तमान आकाशगत नक्षत्र-परस्पर-वेध

नरपति-प्रारूप के इन दो रूपों के अतिरिक्त एक पूरक तत्त्व और ग्रहण करना चाहिए—वर्तमान आकाश में नक्षत्रों का अन्य नक्षत्रों पर वेध। इसका संकेत महाभारत के कर्ण-वचन में माना गया है। यद्यपि यह बिन्दु नरपति-पाठ में स्पष्ट रूप से न मिले, तथापि वर्तमान-वेध की पूर्णता के लिए इसका स्वीकार समीचीन है।

इस तत्त्व का अर्थ यह है कि वेध केवल “ग्रह बनाम चक्र” रूप में ही नहीं, बल्कि “चलमान नक्षत्र-क्षेत्र बनाम चक्रगत नक्षत्र-स्थान” रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इस प्रकार वर्तमान वेध-पठन और सूक्ष्म हो जाता है। जन्मकालिक वेध जातक-केंद्रित है; वर्तमान ग्रहवेध गोचर-केंद्रित; और वर्तमान नक्षत्र-परस्पर-वेध आकाशगत नक्षत्र-सम्बन्ध की अतिरिक्त परत है।


अस्त, उदित, नाड़ी, देश, पण्य, ग्रहबल

६.१ दिशा का अस्त और उदित

Kundalee Software की सामग्री के अनुसार प्रत्येक दिशा में तीन राशियाँ हैं। जिस दिशा-त्रय में सूर्य हो, वही दिशा अस्त होती है; शेष उदित। ईशान-कोण के स्वर पूर्व, अग्नि-कोण के स्वर दक्षिण, नैर्ऋत्य के स्वर पश्चिम, और वायव्य के स्वर उत्तर से सम्बद्ध माने जाते हैं। इससे दिशा-सापेक्ष स्वर-विन्यास स्पष्ट होता है।

अस्त दिशा के सम्मुख यात्रा, युद्ध, विवाद, भवनद्वार, और अशुभकर्म वर्जित कहे गये हैं; उदित दिशा में पुष्टि, सुख, विजय, श्री, और पदलाभ तक सम्भव माना गया है। इससे दिशा शुद्ध भूगोल नहीं, काल-सम्बद्ध फलतत्त्व सिद्ध होती है।

६.२ नाड़ी-नक्षत्र

जन्म, कर्म, आधान, विनाश, सामुदायिक, सांघातिक—ये छह नाड़ी-नक्षत्र सर्वसाधारण के लिए माने गये हैं। राजकीय प्रयोजन के लिए जाति, देश, तथा राज्याभिषेक—ये तीन अतिरिक्त नाड़ी-बिन्दु आते हैं। इनके वेध से मृत्यु, क्लेश, विग्रह, अनिष्ट, हानि, कुलनाश, बन्धन, तथा देशनाश तक के फल कहे गये हैं। इससे स्पष्ट है कि सर्वतोभद्र में कुछ नक्षत्रस्थान विशेष भारयुक्त हैं।

६.३ अज्ञात जन्मकाल और नामाधारित फल

नरपति-प्रारूप का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्त्व यह है कि अज्ञात जन्मकाल में भी प्रचलित नाम से सर्वतोभद्रफल कहा जाता है। इससे यह चक्र जन्मपत्री-आश्रित साधन मात्र नहीं रह जाता, बल्कि ध्वनि, दिक्, काल, तथा वेध पर आधारित सार्वप्रयोज्य ज्योतिषमण्डल बन जाता है।

६.४ देश, मण्डल, ग्राम, पण्य

Kundalee Software में देश, मण्डल, ग्राम, वर्ष, मास, दिन, तथा धातु, मूल, जीव—इन सबका पृथक् वेध-विचार दिया गया है। पदार्थों की तेजी-मन्दी देश, काल, और पण्य—इन तीनों के वेध से कही जाती है। इससे सिद्ध है कि नरपति-प्रारूप का सर्वतोभद्र केवल मनुष्यकेंद्रित नहीं; यह सामाजिक, राजकीय, और भौतिक क्षेत्र में भी कार्य करता है।

६.५ ग्रहबल और वेधमात्रा

स्वराशि, उच्च, नीच, मित्र, सम, शत्रु, वक्रता, गति, दृष्टि, तथा विंशोपक-मात्रा के आधार पर वेधफल की तीव्रता बदलती है। क्रूरग्रह के लिए बल-क्रम का विलोम, वक्री क्रूरग्रह का दुगुना अशुभ, उच्चस्थ शुभग्रह का तिगुना शुभ, तथा दृष्टिहीन वेध का निष्फल होना—ये सब दिखाते हैं कि यह प्रारूप केवल “वेध है या नहीं” तक सीमित नहीं, बल्कि “वेध कितना प्रबल है” इसका भी मापन करता है।


अग्निपुराण और नरपति की सन्धि

अब दोनों पक्ष स्पष्ट हो जाते हैं।

अग्निपुराण कहता है—
एक ऐसा मण्डल रचो जिसमें कोष्ठ, पद्म, पीठ, वीथी, द्वार, शोभा, उपशोभा, भद्र, और विभिन्न व्यूह-विन्यास सम्भव हों।

नरपति कहता है—
उसी मण्डल में नक्षत्र, स्वर, वर्ण, राशि, तिथि, दिशा, वेध, नाड़ी, रोग, युद्ध, प्रश्न, देश, पण्य, तथा नामाधारित फल आरोपित किए जा सकते हैं।

अतः दोनों में विरोध नहीं है। नरपति, अग्निपुराणीय सर्वतोभद्र का ज्योतिषगत कार्यरूप है। इसी कारण नरपति-प्रारूप में जो कुछ विशेष दिखता है—जैसे कोण-द्वार, स्तम्भ-द्वार, राशि-दिक्-विन्यास, काल-सम्बद्ध अस्त-उदित, जन्मकालिक एवं वर्तमान वेध, तथा नक्षत्र-परस्पर-वेध—ये सब अग्निपुराणीय सामान्य मण्डल-व्याकरण के भीतर समाहित किए जा सकते हैं।

सन्धि-सूत्र
अग्निपुराण = सामान्य सर्वतोभद्र-व्याकरण
नरपति = उसी व्याकरण का ज्योतिषगत प्रयुक्त रूप
Kundalee Software = नरपति-प्रारूप का संरक्षित, गणनात्मक, फलपरीक्षित रूप


निष्कर्ष

इस निबन्ध से निम्न बातें सिद्ध होती हैं।

प्रथम, सर्वतोभद्रचक्र का मूल स्वरूप एक सामान्य मण्डल-व्याकरण है, जिसका प्रतिपादन अग्निपुराण में मिलता है।

द्वितीय, नरपति उसी सामान्य व्याकरण का ज्योतिषगत प्रयुक्त रूप है, जिसमें ध्वनि, दिशा, काल, नक्षत्र, राशि, वेध, नाड़ी, प्रश्न, रोग, युद्ध, देश, पण्य, और नाम—इन सबका समेकित पठन सम्भव है।

तृतीय, नरपति-प्रारूप में वेध-द्वय स्वीकार करना चाहिए—(१) जन्मकालिक ग्रहवेध, और (२) वर्तमान ग्रहवेध। इनके अतिरिक्त वर्तमान आकाशगत नक्षत्र-परस्पर-वेध का तत्त्व पूरक विस्तार के रूप में ग्रहणीय है।

चतुर्थ, Kundalee Software में संरक्षित नरपति-प्रारूप इस प्रयुक्त परम्परा का सुव्यवस्थित गणनात्मक रूप प्रस्तुत करता है, जिसमें बाह्य नक्षत्र-वलय, स्वर-द्वार, व्यञ्जन-वलय, स्तम्भ-द्वार, राशि-दिक्-नियमन, आन्तरिक काल-विन्यास, तथा वेध-फल-तन्त्र एकीकृत हैं।

पञ्चम, अग्निपुराण और नरपति में विरोध नहीं, बल्कि सामान्य और प्रयुक्त का सम्बन्ध है। अतः सर्वतोभद्र के अनेक कार्यरूप सम्भव हैं; नरपति उनमें प्रमुख ज्योतिषगत रूप है।

अन्तिम निष्कर्ष
सर्वतोभद्र एकात्म तत्त्व का बहुरूपी मण्डल है। अग्निपुराण उसका सामान्य शास्त्र है; नरपति उसका ज्योतिषगत प्रयोग; और Kundalee Software उस प्रयोग का दीर्घ-परीक्षित संरक्षण। सर्वतोभद्र का यथार्थ पुनरुद्धार तभी सम्भव है जब इन तीनों को एक अखण्ड परम्परा के भेदरूप मानकर पढ़ा जाए।


परिशिष्ट-क : अग्निपुराणोक्त सर्वतोभद्रमण्डल-पाठ

सर्वतोभद्रमण्डलकथनम् (अध्याय २९)

नारद उवाच
साधकः साधयेन्मन्त्रं देवतायतनादिके
शुद्धभूमौ गृहे प्रार्च्य मण्डले हरिमीश्वरम् ।
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे मण्डलादीनि वै लिखेत्
रसवाणाक्षिकोष्ठेषु सर्वतोभद्रमालिखेत् ।
षट्त्रिंशत्कोष्ठकैः पद्मं पीठं पङ्क्त्या वहिर्भवेत्
द्वाभ्यान्तु वीथिका तस्माद् द्वाभ्यां द्वाराणि दिक्षु च ॥

वर्तुलं भ्रामयित्वा तु पद्मक्षेत्रं पुरोदितम्
पद्मार्धे भामयित्वा तु भागं द्वादशमं वहिः ।
विभज्य भ्रामयेच्छेषं चतुःक्षेत्रन्तु वर्तुलम्
प्रथमं कर्णिकाक्षेत्रं केशराणां द्वितीयकम् ।
तृतीयं दलसन्धीनां दलाग्राणां चतुर्थकम् ।
प्रसार्य कोणसूत्राणि कोणदिङ्मध्यमन्ततः
निधाय केशराग्रे तु दलसन्धींस्तु लाञ्छयेत् ।
पातयित्वाथ सूत्राणि तत्र पत्राष्टकं लिखेत् ।
दलसन्ध्यन्तरालन्तु मानं मध्ये निधाय तु
दलाग्रं भ्रामयेत्तेन तदग्रं तदनन्तरम् ।
तदन्तरालं तत्पार्श्वे कृत्वा वाह्यक्रमेण च
केशरे तु लिखेद्द्वौ द्वौ दलमध्ये ततः पुनः ।
पद्मलक्ष्मैतत् सामान्यं द्विषट्कदलमुच्यते ।
कर्णिकार्धेन मानेन प्राक्संस्थं भ्रामयेत् क्रमात्
तत्पार्श्वे भ्रमयोगेन कुण्डल्यः षड् भवन्ति हि ।
एवं द्वादश मत्स्याः स्युर्द्विषट्कदलकञ्च तैः ।
पञ्चपत्राभिसिद्ध्यर्थं मत्स्यं कृत्वैवमब्जकम् ।
व्योमरेखावहिः पीठन्तत्र कोष्टानि मार्जयेत् ।
त्रीणि कोणेषु पादार्थं द्विद्विकान्यपराणि तु
चतुर्दिक्षु विलिप्तानि गात्रकाणि भवन्त्युत ।
ततः पङ्क्तिद्वयं दिक्षु वीठ्यर्थन्तु विलोपयेत्
द्वाराण्याशासु कुर्वीत चत्वारि चतसृष्वपि ।
द्वाराणां पार्श्वतः शोभा अष्टौ कुर्याद्विचक्षणः
तत्पार्श्व उपशोभास्तु तावत्यः परिकीर्तिताः ।
समीप उपशोभानां कोणास्तु परिकीर्तिताः
चतुर्दिक्षु ततो द्वे द्वे चिन्तयेन्मध्यकोष्ठकैः ।
चत्वारि वाह्यतो मृज्यादेकैकं पार्श्वयोरपि
शोभार्थं पार्श्वयोस्त्रीणि त्रीणि लुम्पद्दलस्य तु ।
तद्वद्विपर्यये कुर्यादुपशोभां ततः परम्
कोणस्यान्तर्वहिस्त्रीणि चिन्तयेद्द्विर्विभेदतः ।
एवं षोडशकोष्ठं स्यादेवमन्यत्तु मण्डलम् ।
द्विषट्कभागे षट्त्रिंशत्पदं पद्मन्तु वीथिका ।
एका पङ्क्तिः प्राभ्यां तु द्वारशोभादि पूर्ववत् ।
द्वादशाङ्गुलिभिः पद्ममेकहस्ते तु मण्डले ।
द्विहस्ते हस्तमात्रं स्याद्वृद्ध्या द्वारेण वाचरेत् ।
अपीठञ्चतुरस्रं स्याद्विकरञ्चक्रपङ्कजम् ।
पद्मार्धं नवभिः प्रोक्तं नाभिस्तु तिसृभिः स्मृता ।
अष्टाभिर्द्वारकान् कुर्यान्नेमिन्तु चतुरङ्गुलैः ।
त्रिधा विभज्य च क्षेत्रमन्तर्द्वाभ्यामथाङ्कयेत् ।
पञ्चान्तस्वरसिद्ध्यर्थं तेष्वस्फाल्य लिखेदरान् ।
इन्दीवरदलाकारानथवा मातुलाङ्गवत् ।
पद्मपत्रायतान्वापि लिखेदिच्छानुरूपतः ।
भ्रामयित्वा वहिर्नेमावरसन्ध्यन्तरे स्थितः
भ्रामयेदरमूलन्तु सन्धिमध्ये व्यवस्थितः ।
अरमध्ये स्थितो मध्यमरणिं भ्रामयेत् समम् ।
एवं सिद्ध्यन्तराः सम्यक् मातुलाङ्गनिभाः समाः ।
विभज्य सप्तधा क्षेत्रं चतुर्दशकरं समम्
द्विधा कृते शतं ह्यत्र षण्नवत्यधिकानि तु ।
कोष्टकानि चतुर्भिस्तैर्मध्ये भद्रं समालिखेत्
परितो विसृजेद्वीथ्यै तथा दिक्षु समालिखेत् ।
कमलानि पुनर्वीथ्यै परितः परिमृज्य तु
द्वे द्वे मध्यमकोष्ठे तु ग्रीवार्थं दिक्षु लोपयेत् ।
चत्वारि वाह्यतः पश्चात्त्रीणि त्रीणि तु लोपयेत्
ग्रीवापार्श्वे वहिस्त्वेका शोभा सा परिकीर्तिता ।
विमृज्य वाह्यकोणेषु सप्तान्तस्त्रीणि मार्जयेत्
मण्डलं नवभागं स्यान्नवव्यूहं हरिं यजेत् ।
पञ्चविंशतिकव्यूहं मण्डलं विश्वरूपगम् ।
द्वात्रिंशद्धस्तकं क्षेत्रं भक्तं द्वात्रिंशता समम् ।
एवं कृते चतुर्विंशत्यधिकन्तु सहस्रकं
कोष्ठकानां समुद्दिष्टं मध्ये शोडशकोष्ठकैः ।
भद्रकं परिलिख्याथ पार्श्वे पङ्क्तिं विमृज्य तु
ततः षोडशभिः कोष्टैर्दिक्षु भद्राष्टकं लिखेत् ।
ततोऽपि पङ्क्तिं सम्मृज्य तद्वत् षोडशभद्रकं
लिखित्वा परितः पङ्क्तिं विमृज्याथ प्रकल्पयेत् ।
द्वारद्वादशकं दिक्षु त्रीणि त्रीणि यथाक्रमम्
षड्भिः परिलुप्यान्तर्मध्ये चत्वारि पार्श्वयोः ।
चत्वार्यन्तर्वहिर्द्वे तु शोभार्थं परिमृज्य तु
उपद्वारसिद्ध्यर्थं त्रीण्यन्तः पञ्च वाह्यतः ।
परिमृज्य तथा शोभां पूर्ववत् परिकल्पयेत्
वहिः कोणेषु सप्तान्तस्त्रीणि कोष्ठानि मार्जयेत् ।
पञ्चविंशतिकव्यूहे परं ब्रह्म यजेत् कजे ।
मध्ये पूर्वादितः पद्मे वासुदेवादयः क्रमात् ।
वराहं पूजयित्वा च पूर्वपद्मे ततः क्रमात्
व्यूहान्सम्पूजयेत्तावत् यावत् षड्विंशमो भवेत् ।
यथोक्तं व्यूहमखिलमेकस्मिन् पङ्कजे क्रमात्
यष्टव्यमिति यत्नेन प्रचेता मन्यतेऽध्वरम् ।
सत्पन्थास्तु मूर्तिभेदेन विभक्तं मन्यतेऽच्युतम् ।
चत्वारिंशत्करं क्षेत्रं ह्युत्तरं विभजेत् क्रमात् ।
एकैकं सप्तधा भूयस्तथैवैकं द्विधा पुनः ।
चतुःषष्ट्युत्तरं सप्तशतान्येकं सहस्रकं
कोष्ठकानां भद्रकञ्च मध्ये षोडशकोष्ठकैः ।
पार्श्वे वीथीं ततश्चाष्टभद्राण्यथ च वीथिका ।
षोडशाब्जान्यथो वीथी चतुर्विंशतिपङ्कजम् ।
वीथीपद्मानि द्वात्रिंशत् पङ्क्तिवीथिकजान्यथ ।
चत्वारिंशत्ततो वीथी शेषपङ्क्तित्रयेण च ।
द्वारशोभोपशोभाः स्युर्दिक्षु मध्ये विलोप्य च
द्विचतुःषड्द्वारसिद्ध्यै चतुर्दिक्षु विलोपयेत् ।
पञ्च त्रीण्येककं वाह्ये शोभोपद्वारसिद्धये
वाराणां पार्श्वयोरन्तः षड्वा चत्वारि मध्यतः ।
द्वे द्वे लुम्पेदेवमेव षड् भवन्त्युपशोभिकाः ।
एकस्यां दिशि सङ्ख्याः स्युश्चतस्रः परिसङ्ख्यया ।
एकैकस्यां दिशि त्रीणि द्वाराण्यपि भवन्त्युत ।
पञ्च पञ्च तु कोणेषु पङ्क्तौ पङ्क्तौ क्रमात् मृजेत्
कोष्टकानि भवेदेवं मर्त्येष्ट्यं मण्डलं शुभम् ॥

इत्यादिमहापुराणे आग्नेये मण्डलादिलक्षणं नाम ऊनत्रिंशोऽध्यायः।

अग्निपुराणोक्त सर्वतोभद्रमण्डल का विस्तृत हिन्दी अर्थ

सर्वतोभद्रमण्डल का कथन

नारद उवाच —
नारद ने कहा —

साधकः (साधना करने वाला) साधयेन्मन्त्रं (मन्त्र-साधना करे) देवतायतनादिके (देवालय आदि स्थान में), शुद्धभूमौ (शुद्ध भूमि पर) गृहे (घर में) प्रार्च्य (पहले पूजन करके) मण्डले (मण्डल में) हरिम्-ईश्वरं (हरि और ईश्वर को)।

अर्थात् साधक को चाहिए कि वह देवालय आदि में, अथवा शुद्ध भूमि वाले घर में, पहले मण्डल में हरि-ईश्वर का पूजन करके मन्त्र-साधना करे।

चतुरस्रीकृते क्षेत्रे (चौकोर बनाए हुए क्षेत्र में) मण्डलादीनि (मण्डल आदि) लिखेत् (अंकित करे)। रसवाणाक्षि-कोष्ठेषु (रस-वाण-अक्षि संख्या के कोष्ठों में; पाठानुसार) सर्वतोभद्रं (सर्वतोभद्र मण्डल) आलिखेत् (लिखे)।

अर्थात् चौकोर क्षेत्र बनाकर उसमें मण्डल आदि अंकित करे, और नियत कोष्ठों में सर्वतोभद्र मण्डल रचे।

षट्त्रिंशत्-कोष्ठकैः (छत्तीस कोष्ठों से) पद्मं (कमल-रूप) पीठं (आसन-प्रदेश) पङ्क्त्या (पंक्ति सहित) वहिर्भवेत्। द्वाभ्यां तु वीथिका (दो से वीथिका, चलने का पथ) तस्मात्, द्वाभ्यां द्वाराणि (दो-दो से द्वार) दिक्षु च (दिशाओं में) ।

अर्थात् छत्तीस कोष्ठों से पद्म बने; उसके बाहर पंक्ति सहित पीठ हो; फिर दो-दो से वीथिका बने और दिशाओं में दो-दो से द्वार बनाए जाएँ।

वर्तुलं (वृत्त) भ्रामयित्वा (घुमाकर, बनाकर) पद्मक्षेत्रं (पद्म का क्षेत्र) पुरोदितम् (पूर्व कथित रीति से) करे। पद्मार्धे (पद्म के अर्धभाग में) भागं द्वादशमं (बारह भाग) वहिः (बाहर की ओर) विभज्य (विभाजित करके) शेषं चतुःक्षेत्रं वर्तुलं भ्रामयेत् (शेष को चार क्षेत्रों वाला वृत्त बनाए)।

अर्थात् पहले बताए अनुसार वृत्त बनाकर पद्म-क्षेत्र बनाए; फिर पद्म के अर्धभाग को बाहर की ओर बारह भागों में बाँटे; शेष भाग को चार विभागों वाला वर्तुल बनाए।

प्रथमं कर्णिका-क्षेत्रं (बीजकोश का क्षेत्र) । केशराणां (केसरों का) द्वितीयकम् (दूसरा भाग) । तृतीयं दलसन्धीनां (पंखुड़ियों के संधि-स्थान का) । दलाग्राणां (पंखुड़ियों के अग्रभाग का) चतुर्थकम् (चौथा भाग)।

अर्थात् पहला भाग कर्णिका का, दूसरा केशर का, तीसरा दलसन्धि का और चौथा दलाग्र का होगा।

प्रसार्य (फैला कर) कोणसूत्राणि (कोणों की रेखाएँ) कोण-दिक्-मध्यम् अन्ततः (कोणों से दिशाओं के मध्य भाग तक) निधाय, केशराग्रे (केसर के अग्र पर) दलसन्धीन् (दल की सन्धियाँ) लाञ्छयेत् (चिह्नित करे)।

अर्थात् कोणों से दिशा-मध्य तक रेखाएँ खींचे और केशर के अग्रभाग पर दल-सन्धियों को चिह्नित करे।

पातयित्वा अथ सूत्राणि (फिर रेखाएँ गिराकर) तत्र पत्राष्टकं (आठ पत्रों वाला रूप) लिखेत्।

अर्थात् उन रेखाओं के आधार पर वहाँ आठ-पत्रों वाला पद्म बनाए।

दलसन्ध्यन्तरालं (दल-सन्धियों के बीच का अन्तर) मानं (माप) मध्ये निधाय (मध्य में रखकर) दलाग्रं (पंखुड़ी का अग्रभाग) भ्रामयेत् (खींचे)। तेन तदग्रं (उससे उसका अग्र) तदनन्तरं (फिर उसके आगे) ।

अर्थात् दल-सन्धियों के अन्तर को माप मानकर बीच से पंखुड़ी का अग्रभाग खींचे, फिर उसी से अगले अग्रभाग निर्धारित करे।

तदन्तरालं (उसका अन्तराल) तत्पार्श्वे (उसके पार्श्व में) कृत्वा (रखकर) वाह्यक्रमेण (बाह्य क्रम से) च, केशरे तु (केशर में) लिखेद् द्वौ द्वौ (दो-दो) दलमध्ये (दल के मध्य में) ततः पुनः (फिर)।

अर्थात् उस अन्तराल को पार्श्व में रखते हुए बाह्य क्रम से रचना करे; और केशर-प्रदेश में, प्रत्येक दल के मध्य, दो-दो चिह्न या रेखाएँ बनाए।

पद्मलक्ष्म एतत् सामान्यं (यह पद्म की सामान्य लक्षण-रूप रचना है), द्विषट्कदलम् (बारह दलों वाला) उच्यते।

अर्थात् यह पद्म की सामान्य रचना है, जिसे द्विषट्कदल अर्थात् बारह-दल वाला पद्म कहते हैं।

कर्णिकार्धेन मानेन (कर्णिका के आधे माप से) प्राक्संस्थं (पूर्व भाग में स्थित) भ्रामयेत् क्रमात्। तत्पार्श्वे भ्रमयोगेन (घूर्णन-युक्ति से) कुण्डल्यः (कुण्डलियाँ, घुमावदार आकृतियाँ) षट् भवन्ति (छः बनती हैं)।

अर्थात् कर्णिका के आधे माप से पूर्व दिशा में क्रमशः घुमाव दे; उससे पार्श्वों में छह कुण्डलियाँ बनेंगी।

एवं द्वादश मत्स्याः (इस प्रकार बारह मत्स्याकार रूप) स्युः, द्विषट्कदलकं च तैः (और उन्हीं से बारह-दल-पद्म भी बनता है)।

अर्थात् इस प्रकार बारह मत्स्याकार रचनाएँ होती हैं और उन्हीं से बारह-दल-पद्म की सिद्धि होती है।

पञ्चपत्राभिसिद्ध्यर्थं (पाँच पत्रों की सिद्धि के लिए) मत्स्यं कृत्वा एवम् अब्जकम् (इस प्रकार मत्स्याकार बनाकर अब्जक, कमलाकार बनाए)।

अर्थात् पाँच पत्रों की सिद्धि के लिए मत्स्याकार-विन्यास के द्वारा कमलाकार रचना करे।

व्योमरेखा-वहिः (बाहरी आकाश-रेखा के बाहर) पीठं (पीठ, आसन-भाग) । तत्र कोष्ठानि (वहाँ के कोष्ठ) मार्जयेत् (मिटाए या रिक्त छोड़े)।

अर्थात् बाहरी परिधि के बाहर पीठ बने, और वहाँ कुछ कोष्ठ रिक्त किए जाएँ।

त्रीणि कोणेषु (कोनों में तीन-तीन) पादार्थं (पाद-भाग के लिए), द्विद्विकानि अपराणि (और अन्य दो-दो) । चतुर्दिक्षु विलिप्तानि गात्रकाणि (चारों दिशाओं में बने हुए गात्र-भाग) भवन्ति।

अर्थात् कोनों में तीन-तीन कोष्ठ पाद-भाग के लिए हों, और अन्य दो-दो कोष्ठ गात्र-भाग के लिए चारों दिशाओं में नियत हों।

ततः पङ्क्तिद्वयं (फिर दो पंक्तियाँ) दिक्षु वीथ्यर्थं (दिशाओं में वीथिका के लिए) विलोपयेत् (हटा दे)। द्वाराणि (द्वार) आशासु (दिशाओं में) कुर्वीत (बनाए), चत्वारि चतसृष्वपि (चारों दिशाओं में चार)।

अर्थात् उसके बाद दिशाओं में वीथिका के लिए दो पंक्तियाँ रिक्त करे, और चारों दिशाओं में द्वार बनाए।

द्वाराणां पार्श्वतः (द्वारों के पार्श्व में) शोभाः (शोभा-भाग, अलंकरण-भाग) अष्टौ (आठ) कुर्यात् विचक्षणः (बुद्धिमान रचयिता)। तत्पार्श्वे उपशोभाः (उनके पार्श्व में उपशोभा) तावत्यः (उतनी ही) परिकीर्तिताः।

अर्थात् द्वारों के पार्श्व में आठ शोभा-भाग बनाए जाएँ, और उनके बगल में उतनी ही उपशोभाएँ हों।

समीपे उपशोभानां (उपशोभाओं के निकट) कोणाः (कोण-स्थान) परिकीर्तिताः। चतुर्दिक्षु ततो द्वे द्वे (फिर चारों दिशाओं में दो-दो) चिन्तयेत् मध्यकोष्ठकैः (मध्य कोष्ठों द्वारा विचार करे, नियत करे)।

अर्थात् उपशोभाओं के निकट कोण-स्थान माने जाएँ; और चारों दिशाओं में मध्य-कोष्ठों से दो-दो भाग नियत किए जाएँ।

चत्वारि वाह्यतः (बाहर की ओर चार) मृज्यात् (मिटाए), एकैकं पार्श्वयोः अपि (और दोनों पार्श्वों पर एक-एक)। शोभार्थं (शोभा के लिए) पार्श्वयोः त्रीणि त्रीणि (दोनों ओर तीन-तीन) लुम्पेत् (लोप करे) दलस्य तु।

अर्थात् बाहर की ओर चार कोष्ठ मिटाए; दोनों पार्श्वों पर एक-एक भी; और शोभा के लिए दोनों ओर तीन-तीन कोष्ठ हटाए।

तद्वत् विपर्यये (उसी प्रकार विपरीत ओर) कुर्यात् उपशोभां (उपशोभा बनाए)। ततः परम् (फिर आगे) कोणस्य अन्तः-वहिः (कोण के भीतर और बाहर) त्रीणि (तीन-तीन) चिन्तयेत् (मान ले, रचे), द्विर्विभेदतः (दो भेदों से)।

अर्थात् विपरीत दिशा में भी वैसी ही उपशोभा बनाए; और फिर कोण के भीतर-बाहर तीन-तीन भाग दो प्रकार से रखे।

एवं षोडशकोष्ठं (इस प्रकार सोलह-कोष्ठ वाला) स्यात्। एवम् अन्यत् तु मण्डलम् (ऐसा ही दूसरा मण्डल भी होता है)।

अर्थात् इस प्रकार सोलह-कोष्ठीय विन्यास सिद्ध होता है; इसी प्रकार अन्य मण्डल भी बनते हैं।

द्विषट्कभागे (बारह-भाग वाले विन्यास में) षट्त्रिंशत्पदं पद्मं (छत्तीस पद वाला पद्म) । वीथिका (वीथिका) एका पङ्क्तिः (एक पंक्ति) । द्वाभ्यां तु द्वार-शोभादि (दो भागों से द्वार, शोभा आदि) पूर्ववत् (पूर्ववत् हों)।

अर्थात् बारह-भाग वाले विन्यास में छत्तीस-पद वाला पद्म हो; वीथिका एक पंक्ति की हो; और द्वार-शोभा आदि पहले जैसी हों।

द्वादशाङ्गुलिभिः (बारह अंगुल के माप से) पद्मम्, एकहस्ते तु मण्डले (एक हस्त के मण्डल में)। द्विहस्ते (दो हस्त के मण्डल में) हस्तमात्रं (एक हस्त का पद्म) स्यात्; वृद्ध्या (वृद्धि होने पर) द्वारेण विचारयेत् (द्वार के अनुसार बढ़ाए)।

अर्थात् एक हस्त के मण्डल में पद्म बारह अंगुल का हो; और दो हस्त के मण्डल में पद्म एक हस्त का हो; फिर शेष वृद्धि द्वारादि के अनुसार सोची जाए।

अपीठं (पीठ भी) चतुरस्रं (चौकोर) स्यात्, विकरं चक्रपङ्कजम् (और चक्र-पद्म रूप भिन्न विन्यास भी हो)। पद्मार्धं (पद्म का अर्धभाग) नवभिः (नौ भागों से) प्रोक्तम्; नाभिः (नाभि, मध्य-बिन्दु) तिसृभिः (तीन से) स्मृता।

अर्थात् पीठ चौकोर हो; चक्र-पद्म का एक भिन्न रूप भी है। पद्म का अर्धभाग नौ भागों में माना गया है और नाभि तीन भाग की मानी गई है।

अष्टाभिः द्वारकान् (आठ से छोटे द्वार) कुर्यात्, नेमिं (नेमि, बाहरी घेरा/परिधि) तु चतुरङ्गुलैः (चार अंगुल का बनाए)।

अर्थात् छोटे द्वार आठ भाग के हों और नेमि चार अंगुल की हो।

त्रिधा विभज्य (तीन भाग करके) च क्षेत्रम्, अन्तर्द्वाभ्याम् अथाङ्कयेत् (भीतर दो भागों से चिन्हित करे)। पञ्चान्तस्वर-सिद्ध्यर्थं (पाठ-संशय; नियत सिद्धि हेतु) तेषु अस्फाल्य (उनमें उभारकर/फैलाकर) लिखेद् अरान् (अर, आरे/चक्र की तिल्लियाँ)।

अर्थात् क्षेत्र को तीन भाग करे; भीतर के लिए दो भागों से अंकन करे; फिर नियत सिद्धि के लिए उनमें अर (चक्र-तिल्लियाँ) खींचे।

इन्दीवर-दलाकारान् (नीलकमल की पंखुड़ी के आकार जैसे), अथवा मातुलाङ्गवत् (मातुलुङ्ग-फल जैसे), पद्मपत्रायतान् वा (या कमलपत्र के दीर्घ आकार जैसे), लिखेत् इच्छानुरूपतः (इच्छा के अनुसार)।

अर्थात् वे अर या पंखुड़ियाँ नीलकमल-पत्र के आकार की, या मातुलुङ्ग-फल के आकार की, अथवा लम्बे कमलपत्र के आकार की बनाई जा सकती हैं।

भ्रामयित्वा (घुमाकर) वहिर्नेमौ (बाहरी नेमि पर) अरसन्ध्यन्तरे स्थितः (अर-सन्धियों के बीच स्थित भाग), भ्रामयेद् अरमूलं (अर का मूल भी घुमाए), सन्धिमध्ये व्यवस्थितः (सन्धि-मध्य में स्थित होकर)।

अर्थात् बाहरी नेमि पर अर-सन्धियों के बीच घूर्णित रेखा बनाए; और सन्धि-मध्य में स्थित होकर अर के मूलभाग को भी उसी प्रकार बनाए।

अरमध्ये स्थितः मध्यम् अरणिं भ्रामयेत् समम्। एवं सिद्ध्यन्तराः (इस प्रकार बने अन्तराल) सम्यक् मातुलाङ्गनिभाः (मातुलुङ्ग जैसे) समाः (समान) हों।

अर्थात् अर के मध्य स्थित भाग को भी समान रीति से बनाए; तब सब अन्तराल मातुलुङ्ग-सदृश समान होंगे।

विभज्य सप्तधा (सात भाग करके) क्षेत्रं, चतुर्दशकरं समम् (चौदह-कर/चौदह-हस्त वाले सम क्षेत्र में)। द्विधा कृते (फिर उसे दो में करने पर) शतं हि अत्र षण्णवत्यधिकानि (यहाँ एक सौ छियानबे) कोष्ठकानि (कोष्ठ) भवन्ति।

अर्थात् चौदह-मान वाले सम क्षेत्र को सात भाग करने और फिर द्विभाग करने से कुल एक सौ छियानबे कोष्ठ होते हैं।

चतुर्भिः तैः मध्ये भद्रं (चार कोष्ठों से बीच में भद्र-भाग) समालिखेत्। परितः विसृजेद् वीथ्यै (चारों ओर वीथिका के लिए स्थान छोड़े) तथा दिक्षु समालिखेत् (और दिशाओं में भी वैसा ही अंकन करे)।

अर्थात् बीच में चार कोष्ठों का भद्र बनाए; चारों ओर वीथिका के लिए स्थान छोड़े; और दिशाओं में भी ऐसा ही करे।

कमलानि पुनः वीथ्यै परितः परिमृज्य तु (वीथिका के लिए चारों ओर कमल-स्थान भी रिक्त करे)। द्वे द्वे मध्यमकोष्ठे तु ग्रीवार्थं (ग्रीवा, कण्ठ-जैसे भाग के लिए) दिक्षु लोपयेत्।

अर्थात् वीथिका के लिए चारों ओर कमल-स्थान रिक्त करे, और दिशाओं के मध्य-कोष्ठों में दो-दो कोष्ठ ग्रीवा-भाग हेतु हटाए।

चत्वारि वाह्यतः (बाहर की ओर चार) पश्चात् (फिर), त्रीणि त्रीणि तु लोपयेत् (फिर तीन-तीन लोप करे)। ग्रीवापार्श्वे वहिः तु एका शोभा (ग्रीवा के पार्श्व में बाहर एक शोभा) सा परिकीर्तिता।

अर्थात् पहले बाहर की ओर चार, फिर तीन-तीन कोष्ठ हटाए जाएँ; ग्रीवा के पार्श्व में बाहर एक शोभा मानी गई है।

विमृज्य वाह्यकोणेषु (बाहरी कोणों में मिटाकर) सप्तान्तः त्रीणि मार्जयेत् (सात के भीतर तीन कोष्ठ मिटाए)। मण्डलं नवभागं स्यात् (इस प्रकार मण्डल नौ-भाग वाला हो)। नवव्यूहं हरिं यजेत् (उसमें नवव्यूह रूप हरि की पूजा करे)।

अर्थात् बाहरी कोनों में नियत रीति से कोष्ठ मिटाकर यह मण्डल नौ-भाग वाला बनता है; इसमें नवव्यूह रूप हरि की पूजा करनी चाहिए।

पञ्चविंशतिक-व्यूहं मण्डलं विश्वरूपगं (पच्चीस-व्यूह वाला मण्डल विश्वरूपमय होता है)।

अर्थात् पच्चीस-व्यूह वाला मण्डल विश्वरूप का द्योतक है।

द्वात्रिंशद्धस्तकं क्षेत्रं (बत्तीस-हस्त का क्षेत्र) भक्तं द्वात्रिंशता समं (बत्तीस सम भागों में विभक्त हो)। एवं कृते (ऐसा करने पर) चतुर्विंशत्यधिकं सहस्रकं (एक सहस्र चौबीस) कोष्ठकानां (कोष्ठों की संख्या) समुद्दिष्टं (कही गई है)।

अर्थात् बत्तीस-हस्त के क्षेत्र को बत्तीस समान भागों में बाँटने पर कुल १०२४ कोष्ठ होते हैं।

मध्ये शोडशकोष्ठकैः भद्रकं परिलिख्य (बीच में सोलह कोष्ठों का भद्र बनाकर), अथ पार्श्वे पङ्क्तिं विमृज्य तु (फिर पार्श्व की पंक्ति मिटाकर), ततः षोडशभिः कोष्ठैः दिक्षु भद्राष्टकं लिखेत् (फिर दिशाओं में सोलह-सोलह कोष्ठों से आठ भद्र बनाए)।

अर्थात् पहले बीच में सोलह-कोष्ठीय भद्र बनाए; फिर पार्श्व की पंक्ति रिक्त करे; फिर दिशाओं में सोलह-सोलह कोष्ठों के आठ भद्र बनाए।

ततोऽपि पङ्क्तिं सम्मृज्य (फिर एक और पंक्ति मिटाकर), तद्वत् षोडशभद्रकं लिखित्वा (उसी प्रकार सोलह-भद्र रचकर), परितः पङ्क्तिं विमृज्य अथ प्रकल्पयेत् (फिर चारों ओर पंक्तियाँ मिटाकर आगे की रचना करे)।

अर्थात् फिर पंक्ति मिटाकर उसी प्रकार और सोलह-भद्र बनाए जाएँ; फिर चारों ओर पंक्तियाँ रिक्त कर आगे का विन्यास रचा जाए।

द्वारद्वादशकं दिक्षु (दिशाओं में बारह द्वार), त्रीणि त्रीणि यथाक्रमं (तीन-तीन करके) । षड्भिः परिलुप्य अन्तर्मध्ये (छः से भीतर के मध्य भागों को लोप कर), चत्वारि पार्श्वयोः (चार-चार पार्श्वों में)।

अर्थात् दिशाओं में तीन-तीन कर कुल बारह द्वार हों; और छः-छः कोष्ठों के लोप से भीतर के मध्य भाग तथा चार-चार पार्श्व-भाग रचे जाएँ।

चत्वारि अन्तः, वहिः द्वे तु (भीतर चार और बाहर दो) शोभार्थं परिमृज्य (शोभा के लिए मिटाकर)। उपद्वार-सिद्ध्यर्थं (उपद्वार की सिद्धि के लिए) त्रीणि अन्तः, पञ्च वाह्यतः (भीतर तीन, बाहर पाँच) परिमृज्य। तथा शोभां पूर्ववत् परिकल्पयेत् (और शोभा पहले की भाँति बनाए)।

अर्थात् शोभा-रचना के लिए भीतर चार और बाहर दो कोष्ठ रिक्त करे; उपद्वार के लिए भीतर तीन और बाहर पाँच कोष्ठ हटाए; फिर पहले के समान शोभा रचे।

वहिः कोणेषु (बाहरी कोणों में) सप्तान्तः त्रीणि कोष्ठानि मार्जयेत् (सात के भीतर तीन कोष्ठ मिटाए)। पञ्चविंशतिकव्यूहे (पच्चीस-व्यूह वाले मण्डल में) परं ब्रह्म यजेत् (परब्रह्म की पूजा करे)।

अर्थात् बाहरी कोणों में नियत रीति से कोष्ठ मिटाकर पच्चीस-व्यूह वाले मण्डल में परब्रह्म का यजन करे।

मध्ये पूर्वादितः पद्मे (मध्य और पूर्वादि पद्मों में) वासुदेवादयः क्रमात् (वासुदेव आदि को क्रम से) । वराहं पूजयित्वा च पूर्वपद्मे (पूर्व पद्म में वराह का पूजन करके), ततः क्रमात् व्यूहान् सम्पूजयेत्, यावत् षड्विंशमः भवेत् (फिर क्रम से छब्बीसवें तक व्यूहों की पूजा करे)।

अर्थात् मध्य और पूर्वादि पद्मों में वासुदेव आदि देवताओं को क्रम से स्थापित करे; पूर्व पद्म में वराह की पूजा करके, क्रमशः व्यूहों का पूजन करे, जब तक छब्बीसवाँ रूप पूरा न हो।

यथोक्तं व्यूहमखिलं एकस्मिन् पङ्कजे क्रमात् यष्टव्यम् (जैसा कहा गया है, समस्त व्यूहों की पूजा एक ही पद्म में क्रम से की जा सकती है) इति प्रचेता मन्यते।

अर्थात् प्रचेता का मत है कि उपर्युक्त सभी व्यूहों का क्रमशः एक ही पद्म में भी यजन किया जा सकता है।

सत्पन्थाः तु मूर्तिभेदेन विभक्तं मन्यते अच्युतम् (सज्जनों का मत है कि अच्युत एक ही हैं, केवल मूर्ति-भेद से विभक्त माने जाते हैं)।

अर्थात् अच्युत वास्तव में एक ही हैं; रूप-भेद के कारण अनेक माने जाते हैं।

चत्वारिंशत्करं क्षेत्रं (चालीस-मान वाला क्षेत्र) उत्तरं विभजेत् क्रमात् (अगले प्रकार में क्रम से विभाजित करे)। एकैकं सप्तधा भूयः (हर एक को फिर सात भाग करे), तथैव एकं द्विधा पुनः (और एक को फिर दो भाग करे)।

अर्थात् अब चालीस-मान के क्षेत्र को अगले प्रकार से विभाजित करे; प्रत्येक भाग को फिर सात भागों में, और फिर एक को दो भागों में बाँटे।

चतुःषष्ट्युत्तरं सप्तशतान्येकं सहस्रकं (एक सहस्र सात सौ चौंसठ) कोष्ठकानां (कोष्ठों की संख्या) । मध्ये षोडशकोष्ठकैः भद्रकं (बीच में सोलह कोष्ठों का भद्र) ।

अर्थात् इस प्रकार कुल १७६४ कोष्ठ होते हैं; उनके मध्य सोलह-कोष्ठीय भद्र बनाया जाता है।

पार्श्वे वीथीं (पार्श्व में वीथिका), ततः चाष्टभद्राणि (फिर आठ भद्र), अथ च वीथिका। षोडशाब्जानि (फिर सोलह अब्ज, कमल), अथो वीथी, चतुर्विंशति-पङ्कजं (फिर चौबीस पङ्कज)।

अर्थात् पार्श्व में वीथिका हो; फिर आठ भद्र; फिर वीथिका; फिर सोलह कमल; फिर वीथिका; फिर चौबीस कमल हों।

वीथी-पद्मानि द्वात्रिंशत् (फिर वीथिका में बत्तीस पद्म), पङ्क्तिवीथिकजाः अथ (और पंक्ति-वीथिका से उत्पन्न विन्यास) । चत्वारिंशत् ततः वीथी (फिर चालीस का वीथि-विन्यास), शेषपङ्क्तित्रयेण च (और शेष तीन पंक्तियों सहित)।

अर्थात् आगे वीथिका में बत्तीस पद्म हों; फिर अन्य पंक्ति-वीथिका-विन्यास हों; फिर चालीस का वीथि-विन्यास और शेष तीन पंक्तियाँ रहें।

द्वार-शोभा-उपशोभाः (द्वार, शोभा, उपशोभा) स्युः, दिक्षु मध्ये विलोप्य च (दिशा-मध्य के लोप द्वारा)। द्वि-चतुः-षट्-द्वार-सिद्ध्यै (दो, चार और छह-द्वार की सिद्धि के लिए) चतुर्दिक्षु विलोपयेत् (चारों दिशाओं में लोप करे)।

अर्थात् दिशाओं के मध्य कोष्ठ हटाने से द्वार, शोभा, उपशोभा बनते हैं; और दो, चार, या छह-द्वार-विन्यास की सिद्धि के लिए चारों दिशाओं में लोप किया जाता है।

पञ्च, त्रीणि, एककं वाह्ये (बाहर पाँच, तीन, एक-एक) शोभा-उपद्वार-सिद्धये (शोभा और उपद्वार की सिद्धि के लिए) । द्वाराणां पार्श्वयोः अन्तः षट् वा चत्वारि मध्यतः (द्वारों के पार्श्व के भीतर छह या बीच में चार) । द्वे द्वे लुम्पेत् (दो-दो हटाए) । एवं एव षट् भवन्ति उपशोभिकाः (इस प्रकार छह उपशोभाएँ होती हैं)।

अर्थात् बाहर पाँच, तीन, एक के लोप से शोभा और उपद्वार बनते हैं; द्वार के पार्श्वों में भीतर की ओर छह या मध्य में चार भाग रखे जाते हैं; दो-दो कोष्ठ हटाने से छह उपशोभाएँ बनती हैं।

एकस्यां दिशि सङ्ख्याः स्युः चतस्रः (एक दिशा में उनकी संख्या चार होती है)। एकैकस्यां दिशि त्रीणि द्वाराणि अपि भवन्ति (और प्रत्येक दिशा में तीन द्वार भी होते हैं)।

अर्थात् एक दिशा में चार ऐसे विन्यास होते हैं, और प्रत्येक दिशा में तीन-तीन द्वार भी हो सकते हैं।

पञ्च पञ्च तु कोणेषु (कोनों में पाँच-पाँच), पङ्क्तौ पङ्क्तौ क्रमात् मृजेत् कोष्ठकानि (पंक्ति-पंक्ति में क्रम से कोष्ठ मिटाए)। एवं भवेत् मर्त्येष्ट्यं मण्डलं शुभम् (इस प्रकार मनुष्यों के यजन के योग्य शुभ मण्डल बनता है)।

अर्थात् कोनों में पाँच-पाँच कोष्ठ, पंक्ति-पंक्ति में क्रम से मिटाए जाएँ; इस प्रकार मनुष्य-यजन के योग्य शुभ मण्डल सिद्ध होता है।


परिशिष्ट-ख : अग्निपुराणोक्त सर्वतोभद्रमण्डल अध्याय २९ का सरल हिन्दी अर्थ

नारद कहते हैं कि साधक शुद्धभूमि, गृह, अथवा देवतायतन में हरि-ईश्वर की पूजा करके सर्वतोभद्रमण्डल रचे। इससे स्पष्ट है कि यह केवल गणितीय योजना नहीं, संस्कारित क्षेत्र है।

फिर चतुरस्र क्षेत्र बनाया जाता है और उसमें सर्वतोभद्र का अंकन किया जाता है। छत्तीस कोष्ठों से पद्मरचना होती है। पद्म के बाहर पंक्ति, फिर पीठ, फिर वीथी, फिर दिशाओं में द्वार होते हैं। यह बहुस्तरीय रचना सूचित करती है कि मण्डल का बाह्य, मध्य, और आभ्यन्तर क्रम है।

इसके बाद वृत्त, पद्मक्षेत्र, कर्णिका, केशर, दल, दलसन्धि, दलाग्र, कोणसूत्र, तथा दिक्सूत्र का विधान है। इससे ज्ञात होता है कि सर्वतोभद्र के भीतर केन्द्र और विस्तार का जीवित सम्बन्ध प्रतिष्ठित किया जाता है। अष्टपत्र, द्वादशदल, मत्स्याकार, पञ्चपत्र-सिद्धि आदि रूपों का विधान यह दिखाता है कि एक ही मूल पद्म-तत्त्व से अनेक रचनाएँ निकलती हैं।

फिर पीठ, पाद, गात्र, वीथी, द्वार, शोभा, उपशोभा, कोण, तथा कोष्ठ-लोप द्वारा विविध विन्यासों का विधान है। सोलह-कोष्ठीय रूप, नवभागीय रूप, नवव्यूह, पञ्चविंशतिव्यूह, भद्र, भद्राष्टक, द्वार-द्वादशक, तथा अधिक विस्तीर्ण क्षेत्र-विन्यास—ये सब उसी सामान्य मण्डल की रूप-बहुलता के प्रमाण हैं।

आगे परमब्रह्म-पूजा, वासुदेवादि-व्यूह, वराह-पूजन, तथा एक ही पद्म में अनेक व्यूहों की पूजा का विधान है। इसके साथ यह सिद्धान्त दिया गया है कि अच्युत एक है, विभेद केवल मूर्ति-भेद से माना जाता है। यही बताता है कि सर्वतोभद्र का तत्त्व एक है, किन्तु उसके प्रयुक्त रूप अनेक हो सकते हैं।

अन्तिम भागों में और भी विस्तृत क्षेत्र-विभाग, वीथियाँ, पद्म, द्वार, शोभा, उपशोभा, तथा कोण-लोप के द्वारा बड़े मण्डल-विन्यासों का विधान किया गया है। अतः अग्निपुराण का सर्वतोभद्र किसी एक जड़ आकृति का नाम नहीं, बल्कि एक सामान्य मण्डल-शास्त्र है, जिसके भीतर विशेष प्रयोजनानुसार विभिन्न कार्यरूप विकसित किए जा सकते हैं।


परिशिष्ट-ग : नरपतिजयचर्या के विवरण का “कुण्डली सॉफ्टवेयर” में अनुवाद

सांघातिक
तीनों नक्षत्रों का वेध हो तो मृत्युभय होता है। जो तिथि, राशि, अंश, नक्षत्र क्रूरग्रह से विद्ध हो उसे विवाहादि शुभकर्मों में त्याग दें। ऐसे अवसर पर यात्रा करने पर लौटने की सम्भावना नष्ट होती है तथा रोगारम्भ हो रोग से मुक्ति नहीं मिलती। रोगारम्भ काल में वेधकारक ग्रह क्रूर और वक्री हो तो मृत्यु होती है। रोगारम्भ काल में वेधकारक ग्रह शुभ और वक्री हो तो दीर्घकाल तक रोग रहता है।

शत्रु का जो स्थान क्रूरविद्ध हो वहाँ आक्रमण करने पर विजय मिलती है। दुर्ग के विद्ध स्थल पर धावा करें तो दुर्ग भंग होता है। योद्धा के नक्षत्र से जिस अंग में वेध पड़ता हो उस अंग में घात करने से विजय होती है।

अस्त दिशा
चक्र में प्रत्येक दिशा में तीन-तीन राशियाँ लिखी हुई है। जिस राशि में सूर्य रहे उधर की दिशा अस्त मानी जाती है तथा शेष तीन दिशायें उदित रहती हैं। जैसे वृष मिथुन कर्क में सूर्य रहे तो ज्येष्ठ आषाढ श्रावण सौरमासों में पूर्वदिशा अस्त होती है। ईशान कोण में स्थित स्वरों अ-उ-लृ-ओ को पूर्वदिशा में समझें। अग्निकोण के स्वरों को दक्षिण दिशा में, नैर्ऋत्य के स्वरों को पश्चिम में, तथा वायव्य के स्वरों को उत्तर में समझें। जिस दिशा में त्रैमासिक सूर्य हों उस दिशा के नक्षर, स्वर, वर्ण, राशि, तिथि और दिशा अस्त होते हैं।

नक्षत्र अस्त हो तो रोग, वर्ण अस्त हो तो हानि, स्वर अस्त हो तो शोक, राशि अस्त हो तो विघ्न, तिथि अस्त हो तो भय, और पाँचों अस्त हो तो मृत्यु होती है।
अस्त दिशा के सम्मुख यात्रा, युद्ध, विवाद, भवनद्वार न करें, तथा मारणादि अशुभ कर्म न करें। जिस व्यक्ति के नाम का आदि अक्षर अस्त दिशा में हो वह हर कार्य में दैवहत होता है। नक्षत्र, स्वर, वर्ण और राशि अस्त हो तो विजय की ईच्छा नहीं करनी चाहिए। नक्षत्र उदित हो तो पुष्टि, वर्ण उदित हो तो सुख, राशि उदित हो तो विजय, तिथि उदित हो तो श्री,और पाँचों उदित हो तो पदलाभ होता है।

नाड़ीसंज्ञक नक्षत्र
सूर्यनक्षत्र से ५,८,१४,१८,२१,२२,२३,२४ वाँ नक्षत्र (उपग्रह) पापविद्ध हो तो महाविघ्न करते हैं।
जन्मनक्षत्र(संख्या १), कर्म(जन्मनक्षत्र से १० वाँ), आधान (१९ वाँ), विनाश(२३), सामुदायिक(१८), सांघातिक (१६), ये ६ नक्षत्र नाड़ीसंज्ञक हैं तथा सब के लिए हैं।
राजाओं (राजनेताओं)के लिए तीन अतिरिक्त नाड़ी नक्षत्र हैं : जाति (स्वजातीय नक्षत्र), देश (देश का नक्षत्र,देंखे बृहत्संहिता), राज्याभिषेक(जन्मनक्षत्र से २६ वाँ)। जन्मनक्षत्र क्रूरविद्ध हो तो मृत्यु, कर्मनक्षत्र विद्ध हो तो क्लेश, विनाश में बन्धु से विग्रह, सामुदायिक में अनिष्ट, सांघातिक में हानि, जातिनक्षत्र में कुलनाश , अभिषेक-नक्षत्र में वेध से बन्धन, और देश-नक्षत्र में वेध होने से देश का नाश होता है। शुभग्रह के वेध से शुभ होता है। प्रश्नलग्न क्रूरविद्ध हो प्रश्नोक्त कार्य की सिद्धि नहीं होती है। शुभग्रह से वेध का शुभफल होता है। शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के ग्रहों से वेध हो तो मिश्रित फल होता है।

प्रश्नकालिक लग्नराशि के चरादि स्वभावानुसार फल होता है।

अज्ञात जन्मकाल वाले व्यक्ति के प्रचलित नाम के अनुसार ही सर्वतोभद्रचक्र का फल होता है।

भारतवर्ष के जिस प्रदेश में अधिक क्रूरग्रहों का वेध और दृष्टि हो उस प्रदेश में प्रजा को पीड़ा, देशनाश, राजा का वध, दुर्भिक्ष, भूकम्प आदि दुष्टफल होते हैं। शुभग्रह से विद्ध प्रदेश का कल्याण होता है। कूर्मचक्र में कृत्तिका सर्वतोभद्र द्वारा पापविद्ध हो तो ब्राह्मण, पुष्य से क्षत्रिय, रेवती से वैश्य, पुनर्वसु से शूद्र विद्ध होते हैं।

अर्घ्य प्रकरण :

सर्वतोभद्रचक्र द्वारा पदार्थों की तेजी-मन्दी का ज्ञान होता है। देश,काल और पण्यवस्तु, इन तीनों के वेध को देखकर फल कहना चाहिए। देश तीन प्रकार का होता है : देश(कोसल,मिथिला,आदि), मण्डल(ग्रामसमूह या जिला), और स्थान। काल के भी तीन भेद हैं : वर्ष,मास,दिन। पण्यपदार्थ के भी तीन भेद हैं : धातु, मूल(चन्दनादि), जीव। राहु, शनि, गुरु देश के स्वामी हैं। देशाधिपतियों में जो ग्रह वक्री हो, उदित हो, स्वनवांश में हो, वही ग्रह देशाधिपति होता है। केतु, सूर्य, शुक्र मण्डलेश हैं। चन्द्रमा, मंगल, बुध स्थान के स्वामी हैं। राहु, केतु, शनि, गुरु वर्ष के स्वामी हैं।

मंगल, सूर्य, बुध, शुक्र मास के स्वामी हैं। चन्द्रमा दिन का स्वामी है। शनि, राहु, मंगल धातु के स्वामी हैं। बुध, चन्द्रमा, गुरु जीव के स्वामी हैं। केतु, शुक्र, सूर्य मूलरूपी पण्य के स्वामी हैं। राहु, केतु, सूर्य, गुरु, मंगल पुरुषग्रह हैं। शुक्र, चन्द्रमा स्त्रीग्रह हैं। शनि, बुध नपुसंक ग्रह हैं। शुक्र चन्द्रमा श्वेत वस्तु के, मंगल सूर्य रक्तवर्ण के, बुध गुरु पीले वर्ण के, राहु केतु शनि कृष्णवर्ण के स्वामी हैं। सर्वतोभद्र द्वारा जो पदार्थ पापविद्ध है, वह पदार्थ अपने नाम के नक्षत्र वाले कूर्मचक्रोक्त प्रदेश में मँहगी होती है।

सर्वतोभद्र चक्र में ग्रह का बल :

स्वराशिस्थ ग्रह सर्वतोभद्र में पूर्णबली होता है। वक्रीग्रह उच्चराशि में या स्वगृह में हो तब पूर्णबली होता है। नीचराशि में बल आधा होता है। उच्च एवं नीच के बीच में अनुपात से बल जानना चाहिए। मित्रगृह में ३/४ बल, समगृह में आधा, शत्रुगृह में १/४ बल होता है। क्रूरग्रह में विलोम क्रम है : शत्रुगृही क्रूरग्रह का बल पूर्ण होता है(अर्थात् अशुभ फल पूर्ण प्राप्त होता है), समगृही क्रूरग्रह का बल ३/४ होता है,मित्रराशिस्थ में आधा, एवं स्वराशिस्थ हो तो १/४ बली होता है।क्रूरग्रह वक्री हो तो फल दूना अशुभ होता है।क्रूरग्रह उच्चस्थ हो तो फल नगण्य किन्तु शुभग्रह उच्च में हो तो फल तिगुना होता है।शीघ्रगति ग्रह का फल स्वभाव के अनुसार, एवं शुभग्रह नीच में हो तो ग्रह का फल आधा होता है।
वेधचक्र में ग्रहदृष्टि द्वारा जिस देश के वर्णादि पाँचों का वेध होता हो तो यह देखना चाहिए कि वेधकर्ता ग्रह देशाधिप का मित्र-सम-शत्रु में से क्या है; तदनुसार उस देश में वस्तुओं का शुभाशुभ फल कहना चाहिए। देश, मण्डल, ग्राम में स्वगृही-मित्र-सम-शत्रु से वेध हो तो क्रमश: पूर्ण, चतुर्थांशोन(३/४), आधा, चतुर्थांश फल होता है।

शुभग्रह के वेध से शुभफल होता है। वेधकर्ता ग्रह अपनी दृष्टि के अनुसार फल का उतना ही भाग देने में समर्थ होता है जितना कि देशाधिपति से वेधकर्ता के मित्र-सम-शत्रु सम्बन्ध द्वारा निर्धारित होता है। शुक्लपक्ष में तिथि विद्ध हो तो उसका पूर्ण शुभ या अशुभ फल मिलता है। किन्तु कृष्णपक्ष में तिथि विद्ध होने पर आधा फल ही मिलता है। ग्रह स्वराशि और अपने अंश में हो तो पूर्णफल देता है। दृष्टिहीन वेध का कोई फल नहीं होता है। यदि शुभग्रह पूर्णदृष्टि से वर्णादि पाँचों का वेध करें तो विंशोपक ५, और क्रूरग्रह वेध करे तो विंशोपक ४ होता है। वर्णादि के स्थानवेध में जितनी दृष्टि हो उसी के अनुपात से विंशोपक निकालें। शुभ तथा अशुभ ग्रहों के विंशोपक अलग अलग रखकर दोनों के अन्तर से शुभ तथा अशुभ फल कहें। धान्यादि पदार्थों के नाम से विंशोपक लेकर उनकी तेजी-मन्दी इसी पद्धति से कहें।


परिशिष्ट-घ : समाहार-सूत्र

सामान्य तत्त्व : सर्वतोभद्र एक सामान्य मण्डल-व्याकरण है।
प्रयुक्त तत्त्व : नरपति उसी व्याकरण का ज्योतिषगत रूप है।
वेध-द्वय : (१) जन्मकालिक ग्रहवेध, (२) वर्तमान ग्रहवेध।
पूरक तत्त्व : वर्तमान आकाशगत नक्षत्र-परस्पर-वेध।
संरक्षित कार्यरूप : Kundalee Software इस प्रयुक्त परम्परा का गणनात्मक रूप प्रस्तुत करता है।
शोध-पथ : अग्निपुराण, नरपति, परम्परा, और फलसिद्धि—इन सबके समन्वय से सर्वतोभद्र का पुनर्निर्माण करना चाहिए।

सर्वतोभद्रचक्र के सफल प्रयोग हेतु चक्रपूजन की विधि : अग्निपुराण अध्याय−३०

अथ त्रिंशो ऽध्यायः

मण्डलविधिः

नारद उवाच
मध्ये पद्मे यजेद्ब्रह्म साङ्गं पूर्वेब्जनाभकं
आग्नेयेब्जे च प्रकृतिं याम्येब्जे पुरुषं यजेत् /
पुरुषाद्दक्षिणे च वह्निं नैरृते वारुणेनिलं
आदित्यमैन्दवे पद्मे ऋग्यजुश् चैशपद्मके /
इन्द्रादींश् च द्वितीयायां पद्मे षोडशके तथा
सामाथर्वाणमाकाशं वायुं तेजस् तथा जलं /
पृठिवीञ्च मनश् चैव श्रोत्रं त्वक् चक्षुरर्चयेत्
रसनाञ्च तथा घ्राणं भूर्भुवश् चैव षोडशं /
महर्जनस्तपः सत्यं तथाग्निष्टोममेव च
अत्यग्निष्टोमकं(१) चोक्थं षोडशीं वाजपेयकं /
अतिरात्रञ्च सम्पूज्य तथाप्तोर्याममर्चयेत्
मनो बुद्धिमहङ्कारं शब्दं स्पर्शञ्च रूपकं /
रसं गन्धञ्च पद्मेषु चतुर्विंशतिषु क्रमात्
जीवं मनोधिपञ्चाहं प्रकृतिं शब्दमात्रकं /
वासुदेवादिमूर्तीञ्च तथा चैव दशत्मकं
मनः श्रोत्रं त्वचं प्रार्च्य चक्षुश् च रसनं तथा /
घ्राणं वाक्पाणिपादञ्च द्वात्रिंशद्वारिजेष्विमान्
चतुर्थावरणे पूज्याः साङ्गाः सपरिवारकाः /
पायूपस्थौ च सम्पूज्य मासानां द्वादशाधिपान्
पुरुषोत्तमादिषड्विंशान् वाह्यावरणके यजेत् /
चक्राब्जे तेषु सम्पूज्या मासानां पतयः क्रमात्
अष्टौ प्रकृतयः षड्वा पञ्चाथ चतुरो ऽपरे /
रजः पातं ततः कुर्याल्लिखिते मण्डले शृणु
कर्णिका पीतवर्णा स्याद्रेखाः सर्वाः सिताः समाः /
द्विहस्ते ऽङ्गुष्टमात्राः स्युर्हस्ते चार्धसमाः सिताः
पद्मं शुक्लेन सन्धींस्तु कृष्णेन श्यामतोथवा /
केशरा रक्तपीताः स्युः कोणान् रक्तेन पूरयेत्
भूषयेद्योगपीठन्तु यथेष्टं सार्ववर्णिकैः /
लतावितानपत्राद्यैर् वीथिकामुपशोभयेत्
पीठद्वारे तु शुक्लेन शोभारक्तेन पीततः /
उपशोभाञ्च नीलेन कोणशङ्ख्यांश् च वै सितान्
भद्रके पूरणं प्रोक्तमेवमन्येषु पूरणं /
त्रिकोणं सितरक्तेन कृष्णेन च विभूषयेत्
द्विकोणं रक्तपीताभ्यां नाभिं कृष्णेन चक्रके /
अरकान् पीतरक्ताभिः श्यामान् नेमिन्तु रक्ततः
सितश्यामारुणाः कृष्णाः पीता रेखास्तु वाह्यतः /
शालिपिष्टादि शुक्लं स्याद्रक्तं कौसुम्भकादिकम्
हरिद्रया च हारिद्रं कृष्णं स्याद्दग्धधान्यतः /
शमीपत्रादिकैः श्यामं वीजानां लक्षजाप्यतः
चतुर्लक्षैस्तु मन्त्राणां विद्यानां लक्षसाधनम् /
अयुतं बुद्धिविद्यानां स्तोत्राणाञ्च सहस्रकम्
पूर्वमेवाथ लक्षेण मन्त्रशुद्धिस् तथात्मनः /
तथापरेण लक्षेण मन्त्रः क्षेत्रीकृतो भवेत्
पूर्वमेवासमो होमो वीजानां सम्प्रकीर्तितः /
पूर्वसेवा दशांशेन मन्त्रादीनां प्रकीर्तिता
परश् चर्ये तु मन्त्रे तु मासिकं व्रतमाचरेत् /
भुवि न्यसेद्वामपादं न गृह्णीयात् प्रतिग्रहम्
एवं द्वित्रिगुणेनैव मध्यमोत्तमसिद्धयः /
मन्त्रध्यानं प्रवक्ष्यामि येन स्यान्मन्त्रजं फलम्
स्थूलं शब्दमयं रूपं विग्रहं वाह्यमिष्यते /
सुक्ष्मां ज्योतिर्मयं रूपं हार्दं चिन्तामयं भवेत्
चिन्तया रहितं यत्तु तत् परं प्रकीर्तितम् /
वराहसिंहशक्तीनां स्थूलरूपं प्रधानतः
चिन्तया रहितं रूपं वासुदेवस्य कीर्तितम् /
इतरेषां स्मृतं रूपं हार्दं चिन्तामयं सदा
स्थूलं वैराजमाख्यातं सूक्ष्मं वै लिङ्गितं भवेत् /
चिन्तया रहितं रूपमैश्वरं परिकीर्तितम्
हृत्पुण्डरीकनिलयञ्चैतन्यं ज्योतिरव्ययम् /
वीजं वीजात्मकं ध्यायेत् कदम्बकुसुमाकृतिं
कुम्भान्तरगतो दीपो निरुद्धप्रसवो यथा /
संहतः केवलस्तिष्ठेदेवं मन्त्रेश्वरो हृदि
अनेकशुषिरे कुम्भे तावन्मात्रा गभस्तयः /
प्रसरन्ति वहिस्तद्वन्नाडीभिर्वीजरश्मयः
अथावभासतो दैवीमात्मीकृत्य तनुं स्थिताः /
हृदयात् प्रस्थिता नाड्यो दर्शनेन्द्रियगोचराः
अग्नीषोमात्मके तासां नाड्यौ नासाग्रसंस्थिते /
सम्यग्गुह्येन योगेन जित्वा देहसमीरणम्
जपध्यानरतो मन्त्री मन्त्रलक्षणमश्नुते(१) /
संशुद्धभूततन्मात्रः सकामो योगमभ्यसन्
अणिमादिमवाप्नोति विरक्तः प्रविलङ्घ्य च
देवात्मके भूतमात्रान्मुच्यते चेन्द्रियग्रहात् /

इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये मण्डलादिवर्णनं नाम त्रिंशो ऽध्यायः

त्रिंश अध्याय : मण्डल-विधि (पद्यक्रमानुसार शुद्ध हिन्दी अर्थ)

अथ त्रिंशोऽध्यायः
अब तीसवाँ अध्याय।

मण्डलविधिः
मण्डल की विधि।

नारद उवाच
नारद बोले —

मध्ये पद्मे यजेद्ब्रह्म साङ्गं पूर्वेब्जनाभकं
मध्य के पद्म में ब्रह्मा को उनके समस्त अङ्गों सहित पूजे, और पूर्व के पद्म में अब्जनाभ (कमलनाभ) को पूजे।

आग्नेयेब्जे च प्रकृतिं याम्येब्जे पुरुषं यजेत्
आग्नेय-पद्म में प्रकृति को, और याम्य (दक्षिण) पद्म में पुरुष को पूजे।

पुरुषाद्दक्षिणे च वह्निं नैरृते वारुणेनिलं
पुरुष-पद्म के दक्षिण भाग में वह्नि (अग्नि) को, और नैरृत भाग में वारुण-अनिल को पूजे।

आदित्यमैन्दवे पद्मे ऋग्यजुश् चैशपद्मके
ऐन्दव-पद्म में आदित्य को, और ईश-पद्म में ऋग्वेद तथा यजुर्वेद को पूजे।

इन्द्रादींश् च द्वितीयायां पद्मे षोडशके तथा
दूसरे, षोडश-पद्म वाले आवरण में इन्द्रादि देवताओं का भी पूजन करे।

सामाथर्वाणमाकाशं वायुं तेजस् तथा जलं
सामवेद, अथर्ववेद, आकाश, वायु, तेजस् और जल का पूजन करे।

पृठिवीञ्च मनश् चैव श्रोत्रं त्वक् चक्षुरर्चयेत्
पृथिवी, मन, श्रोत्र, त्वचा और चक्षु का भी अर्चन करे।

रसनाञ्च तथा घ्राणं भूर्भुवश् चैव षोडशं
रसना, घ्राण, तथा भूः और भुवः — इस प्रकार षोडश रूपों का पूजन करे।

महर्जनस्तपः सत्यं तथाग्निष्टोममेव च
महर्, जनः, तपः, सत्य — इनका, और अग्निष्टोम का भी पूजन करे।

अत्यग्निष्टोमकं चोक्थं षोडशीं वाजपेयकं
अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, और वाजपेय का भी पूजन करे।

अतिरात्रञ्च सम्पूज्य तथाप्तोर्याममर्चयेत्
अतिरात्र का पूजन करके, आप्तोर्याम का भी अर्चन करे।

मनो बुद्धिमहङ्कारं शब्दं स्पर्शञ्च रूपकं
मन, बुद्धि, अहंकार, शब्द, स्पर्श और रूप का पूजन करे।

रसं गन्धञ्च पद्मेषु चतुर्विंशतिषु क्रमात्
रस और गन्ध का भी चतुर्विंशति-पद्मों में क्रम से पूजन करे।

जीवं मनोधिपञ्चाहं प्रकृतिं शब्दमात्रकं
जीव, मन के अधिपति, अहं, प्रकृति, और शब्दमात्र का पूजन करे।

वासुदेवादिमूर्तीञ्च तथा चैव दशत्मकं
वासुदेव आदि मूर्तियों का, और दशात्मक रूप का भी पूजन करे।

मनः श्रोत्रं त्वचं प्रार्च्य चक्षुश् च रसनं तथा
मन, श्रोत्र, त्वचा, चक्षु और रसना का अर्चन करे।

घ्राणं वाक्पाणिपादञ्च द्वात्रिंशद्वारिजेष्विमान्
घ्राण, वाक्, पाणि, और पाद — इनका द्वात्रिंशत् पद्मों में पूजन करे।

चतुर्थावरणे पूज्याः साङ्गाः सपरिवारकाः
ये सब चतुर्थ आवरण में, अपने अङ्गों और परिवार सहित, पूजनीय हैं।

पायूपस्थौ च सम्पूज्य मासानां द्वादशाधिपान्
पायु और उपस्थ का पूजन करके, बारह मासों के अधिपतियों का भी पूजन करे।

पुरुषोत्तमादिषड्विंशान् वाह्यावरणके यजेत्
और बाह्य आवरण में पुरुषोत्तम आदि षड्विंशति रूपों का यजन करे।

चक्राब्जे तेषु सम्पूज्या मासानां पतयः क्रमात्
उस चक्र-पद्म में मासों के अधिपति क्रम से पूजनीय हैं।

अष्टौ प्रकृतयः षड्वा पञ्चाथ चतुरोऽपरे
अन्य विन्यासों में प्रकृतियाँ आठ, या छः, या पाँच, अथवा चार भी मानी जाती हैं।

रजः पातं ततः कुर्याल्लिखिते मण्डले शृणु
अब लिखे हुए मण्डल पर रजः-पात (रंग-चूर्ण का आरोपण) करे — सुनो, उसकी विधि यह है।

कर्णिका पीतवर्णा स्याद्रेखाः सर्वाः सिताः समाः
कर्णिका पीतवर्ण की हो; और सब रेखाएँ श्वेत तथा समान हों।

द्विहस्तेऽङ्गुष्टमात्राः स्युर्हस्ते चार्धसमाः सिताः
दो-हस्त के मण्डल में श्वेत रेखाएँ अँगुष्ठ-प्रमाण हों; एक-हस्त के मण्डल में उनकी आधी हों।

पद्मं शुक्लेन सन्धींस्तु कृष्णेन श्यामतोथवा
पद्म को श्वेत वर्ण से बनाए; और सन्धियों को कृष्ण या श्याम वर्ण से भरे।

केशरा रक्तपीताः स्युः कोणान् रक्तेन पूरयेत्
केशर रक्त-पीत वर्ण के हों; और कोणों को रक्त वर्ण से भरे।

भूषयेद्योगपीठन्तु यथेष्टं सार्ववर्णिकैः
योगपीठ को इच्छा के अनुसार अनेक वर्णों से भूषित करे।

लतावितानपत्राद्यैर् वीथिकामुपशोभयेत्
वीथिका को लता, वितान, पत्तों आदि से सुशोभित करे।

पीठद्वारे तु शुक्लेन शोभारक्तेन पीततः
पीठ के द्वार को श्वेत से, और शोभा को रक्त तथा पीत वर्ण से रँगे।

उपशोभाञ्च नीलेन कोणशङ्ख्यांश् च वै सितान्
उपशोभा को नील वर्ण से, और कोणगत शङ्ख्य भागों को श्वेत वर्ण से रँगे।

भद्रके पूरणं प्रोक्तमेवमन्येषु पूरणं
भद्रक में पूरण (रंग-भरना) इसी प्रकार कहा गया है; और अन्य विन्यासों में भी ऐसा ही पूरण हो।

त्रिकोणं सितरक्तेन कृष्णेन च विभूषयेत्
त्रिकोण को श्वेत, रक्त और कृष्ण वर्णों से विभूषित करे।

द्विकोणं रक्तपीताभ्यां नाभिं कृष्णेन चक्रके
द्विकोण को रक्त और पीत से, और चक्र की नाभि को कृष्ण वर्ण से रँगे।

अरकान् पीतरक्ताभिः श्यामान् नेमिन्तु रक्ततः
आरों को पीत-रक्त वर्ण से रँगे, श्याम भागों को यथास्थान रखे, और नेमि को रक्त वर्ण से भरे।

सितश्यामारुणाः कृष्णाः पीता रेखास्तु वाह्यतः
बाहरी रेखाएँ श्वेत, श्याम, अरुण, कृष्ण और पीत वर्ण की हों।

शालिपिष्टादि शुक्लं स्याद्रक्तं कौसुम्भकादिकम्
शालि-पिष्ट आदि से श्वेत वर्ण बने; और कौसुम्भ आदि से रक्त वर्ण बने।

हरिद्रया च हारिद्रं कृष्णं स्याद्दग्धधान्यतः
हरिद्रा से हारिद्र (पीत) वर्ण बने; और दग्ध धान्य से कृष्ण वर्ण बने।

शमीपत्रादिकैः श्यामं वीजानां लक्षजाप्यतः
शमी-पत्र आदि से श्याम वर्ण बने; बीज-मन्त्रों के लिए एक लक्ष जप कहा गया है।

चतुर्लक्षैस्तु मन्त्राणां विद्यानां लक्षसाधनम्
मन्त्रों के लिए चार लक्ष जप, और विद्याओं के लिए एक लक्ष जप से साधन होता है।

अयुतं बुद्धिविद्यानां स्तोत्राणाञ्च सहस्रकम्
बुद्धि-विद्याओं के लिए दस सहस्र, और स्तोत्रों के लिए एक सहस्र जप कहा गया है।

पूर्वमेवाथ लक्षेण मन्त्रशुद्धिस् तथात्मनः
पहले एक लक्ष जप से मन्त्र-शुद्धि और आत्म-शुद्धि करे।

तथापरेण लक्षेण मन्त्रः क्षेत्रीकृतो भवेत्
फिर दूसरे एक लक्ष से मन्त्र क्षेत्रीकृत (स्थापित, प्रतिष्ठित) होता है।

पूर्वमेवासमो होमो वीजानां सम्प्रकीर्तितः
बीज-मन्त्रों के लिए होम पहले कहे गये जप के समकक्ष कहा गया है।
(यहाँ “असमो/समो” में पाठ-संशय जान पड़ता है; भाव यही है कि होम की मात्रा पहले के जप से सम्बद्ध है।)

पूर्वसेवा दशांशेन मन्त्रादीनां प्रकीर्तिता
मन्त्र आदि के लिए पूर्वसेवा दशांश से कही गयी है।

परश् चर्ये तु मन्त्रे तु मासिकं व्रतमाचरेत्
मन्त्र की पुरश्चर्या में एक मास का व्रत करे।

भुवि न्यसेद्वामपादं न गृह्णीयात् प्रतिग्रहम्
भूमि पर वामपाद रखे, और प्रतिग्रह न ले।

एवं द्वित्रिगुणेनैव मध्यमोत्तमसिद्धयः
इस प्रकार द्विगुण और त्रिगुण से मध्यम तथा उत्तम सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

मन्त्रध्यानं प्रवक्ष्यामि येन स्यान्मन्त्रजं फलम्
अब मैं मन्त्र-ध्यान कहता हूँ, जिससे मन्त्र से उत्पन्न फल प्राप्त होता है।

स्थूलं शब्दमयं रूपं विग्रहं वाह्यमिष्यते
स्थूल रूप शब्दमय होता है; उसे बाह्य विग्रह माना जाता है।

सुक्ष्मां ज्योतिर्मयं रूपं हार्दं चिन्तामयं भवेत्
सूक्ष्म रूप ज्योतिर्मय होता है; वह हृदयगत और चिन्तामय होता है।

चिन्तया रहितं यत्तु तत् परं प्रकीर्तितम्
और जो चिन्ता से रहित है, वही पररूप कहा गया है।

वराहसिंहशक्तीनां स्थूलरूपं प्रधानतः
वराह, सिंह और शक्तियों का स्थूल रूप ही प्रधान माना गया है।

चिन्तया रहितं रूपं वासुदेवस्य कीर्तितम्
वासुदेव का रूप चिन्ता से रहित कहा गया है।

इतरेषां स्मृतं रूपं हार्दं चिन्तामयं सदा
अन्य देवताओं का रूप सदा हृदयगत और चिन्तामय माना गया है।

स्थूलं वैराजमाख्यातं सूक्ष्मं वै लिङ्गितं भवेत्
स्थूल रूप को वैराज कहा गया है; और सूक्ष्म रूप को लिङ्गित कहा गया है।

चिन्तया रहितं रूपमैश्वरं परिकीर्तितम्
चिन्ता से रहित रूप को ऐश्वर कहा गया है।

हृत्पुण्डरीकनिलयञ्चैतन्यं ज्योतिरव्ययम्
हृदय-पुण्डरीक में स्थित, चैतन्यमय, अव्यय ज्योति का ध्यान करे।

वीजं वीजात्मकं ध्यायेत् कदम्बकुसुमाकृतिं
बीज को बीजात्मक रूप में, कदम्ब-पुष्प के आकार का ध्यान करे।

कुम्भान्तरगतो दीपो निरुद्धप्रसवो यथा
जैसे घड़े के भीतर रखा दीप अपने प्रसार को रोके हुए रहता है,

संहतः केवलस्तिष्ठेदेवं मन्त्रेश्वरो हृदि
वैसे ही मन्त्रेश्वर हृदय में संहत और एकाग्र स्थित रहता है।

अनेकशुषिरे कुम्भे तावन्मात्रा गभस्तयः
और जब उसी घड़े में अनेक छिद्र हों, तब उतनी ही किरणें बाहर फैलती हैं।

प्रसरन्ति वहिस्तद्वन्नाडीभिर्वीजरश्मयः
उसी प्रकार नाड़ियों के द्वारा बीज की रश्मियाँ बाहर फैलती हैं।

अथावभासतो दैवीमात्मीकृत्य तनुं स्थिताः
फिर प्रकाशमान होकर वे दैवी तनु को आत्मीकृत करके स्थित होती हैं।

हृदयात् प्रस्थिता नाड्यो दर्शनेन्द्रियगोचराः
हृदय से निकली हुई नाड़ियाँ इन्द्रियों के अनुभव-गोचर बनती हैं।

अग्नीषोमात्मके तासां नाड्यौ नासाग्रसंस्थिते
उनमें अग्नि और सोमस्वरूप दो नाड़ियाँ नासाग्र में स्थित हैं।

सम्यग्गुह्येन योगेन जित्वा देहसमीरणम्
गूढ़ योग से देह के समीरण (प्राण-वायु) को जीतकर,

जपध्यानरतो मन्त्री मन्त्रलक्षणमश्नुते
जप और ध्यान में रत मन्त्रधारी, मन्त्र के लक्षण को प्राप्त होता है।

संशुद्धभूततन्मात्रः सकामो योगमभ्यसन्
भूत और तन्मात्राओं को शुद्ध करके, यदि कोई सकाम भाव से योग का अभ्यास करे,

अणिमादिमवाप्नोति विरक्तः प्रविलङ्घ्य च
तो वह अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त करता है; और विरक्त पुरुष इन्हें लाँघकर आगे बढ़ जाता है।

देवात्मके भूतमात्रान्मुच्यते चेन्द्रियग्रहात्
और देवात्मक भूतमात्राओं तथा इन्द्रियों की ग्रहण-शक्ति से मुक्त हो जाता है।

इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये मण्डलादिवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः
इस प्रकार आदिमहापुराण के आग्नेय-खण्ड में “मण्डल आदि का वर्णन” नामक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।

सर्वतोभद्रचक्रे नामनिर्णयः, चक्रराजत्वम्, तथा क्षेत्रनामप्रधानता

शास्त्रीय निबन्ध

निबन्ध-प्रकृति
अयं निबन्धः सर्वतोभद्रचक्रस्य तत्त्वम्, तस्य चक्रराजत्वम्, ग्राह्य-नामनिर्णयः, बहुनामधेयेषु मुख्यनाम-लक्षणम्, क्षेत्रनामस्य प्राधान्यम्, तथा वर्षा-बाढ-फलनिर्णये भूमिखण्डस्वभावस्य नाममूलक-प्रतीतिकरणम्—एतान् विषयान् व्यवस्थित्या निरूपयति।


१. प्रस्तावना

सर्वतोभद्रचक्र भारतीय ज्योतिष-तन्त्र-परम्परा में एक अत्यन्त व्यापक क्षेत्र-यन्त्र है। यह किसी एक ही प्रयोजन तक सीमित नहीं है। इसमें नक्षत्र, स्वर, वर्ण, तिथि, राशि, दिशा, वेध, नाड़ी, देश, मण्डल, ग्राम, स्थान, पण्य, तथा नाम—इन सबका संयुक्त विचार सम्भव है। इसी कारण इसे केवल अक्षरचक्र या केवल प्रश्नचक्र कहना यथेष्ट नहीं।

यदि यामल-परम्परा इसे चक्रराज कहती है, तो उसका अभिप्राय यही है कि यह अन्य चक्रों का केवल समान-श्रेणी सदस्य नहीं, बल्कि उनके ऊपर एक समन्वयकारी अधिष्ठान है। यदि यह त्रैलोक्यदीपक कहा जाता है, तो इसका अर्थ यह है कि यह केवल स्थूल भौतिक दृश्य-फल ही नहीं, बल्कि शुभाशुभ, उन्नति-पतन, सौख्य-दुःख, अनुग्रह-प्रतिघात, तथा पुण्य-पापजन्य फल-परम्परा तक प्रकाश डाल सकता है।

अतः सर्वतोभद्रचक्र के प्रयोग में एक प्रधान प्रश्न यह उठता है—चक्र का मूल नामाक्षर किसका ग्रहण किया जाए? व्यक्ति का? ग्राम का? क्षेत्र का? स्वामी का? पद का? प्रतिष्ठान का? यही इस निबन्ध का मुख्य विषय है।


२. चक्रराजत्वम्

सूत्रम् १
सर्वतोभद्रचक्रं चक्रराजः, अतः सर्वचक्राणां समाहार-नियामकत्वेन द्रष्टव्यम्।

“चक्रराज” पद का अर्थ यह नहीं कि सर्वतोभद्र मात्र “श्रेष्ठ” है। इसका गूढ अर्थ यह है कि अन्य विशिष्ट चक्र आंशिक, विभागगत, अथवा विशेषार्थक हो सकते हैं, किन्तु सर्वतोभद्र उनका समन्वय करता है। यदि किसी चक्र में केवल नक्षत्र देखे जाते हों, किसी में केवल अक्षर, किसी में केवल दिशा, किसी में केवल प्रश्न, तो सर्वतोभद्र उन सबको एक ही क्षेत्र में ग्रहण कर सकता है।

इस प्रकार चक्रराजत्व का अभिप्राय है —

  • समाहार-शक्ति,
  • व्यापकता,
  • बहुविषयक उपयोगिता,
  • अन्य चक्रों के फल का परिशीलन करने की सामर्थ्य।

यही कारण है कि किसी विशिष्ट फलनिर्णय में सर्वतोभद्र का निर्णय प्रायः अधिक व्यापक माना जाना चाहिए।


३. त्रैलोक्यदीपकत्वम्

सूत्रम् २
त्रैलोक्यदीपकत्वात् सर्वतोभद्रं केवलं भौतिक-फलनिर्णायकं न, किन्तु शुभाशुभ-सम्पूर्ण-फलप्रकाशकम्।

“त्रैलोक्यदीपक” का अर्थ यह नहीं कि चक्र में स्थूल रूप से स्वर्ग, पृथिवी और नरक के अलग-अलग भूमानचित्र बने हुए हैं। इसका भाव यह है कि इस चक्र के द्वारा ऐसे फल भी कहे जा सकते हैं जिनकी कारण-परम्परा केवल दृश्य भौतिक घटना तक सीमित नहीं है। किसी एक ही वर्षा का परिणाम एक स्थान पर उन्नति, दूसरे पर हानि, और तीसरे पर विपत्ति क्यों हो—इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर केवल जल-परिमाण से नहीं मिलता; वहाँ पुण्य, पात्रता, स्वभाव, भूमि-धर्म, तथा ग्रह-वेध भी सम्मिलित होते हैं।

अतः त्रैलोक्यदीपकत्व का अर्थ है—फल का क्षेत्र स्थूल से सूक्ष्म तक विस्तीर्ण है।


४. ग्राह्य-नामनिर्णयः

सूत्रम् ३
यस्य विषयस्य फलनिर्णयः क्रियते, तस्यैव नामाक्षरं चक्रनिर्माणे ग्राह्यम्।

यह सर्वतोभद्र-प्रयोग का प्रधान नियम है। यदि व्यक्ति-फल कहा जा रहा है, तो व्यक्ति का नामाक्षर ग्राह्य होगा। यदि ग्राम-फल कहा जा रहा है, तो ग्रामनाम ग्राह्य होगा। यदि मण्डल-फल कहा जा रहा है, तो मण्डलनाम। यदि देश-फल, तो देशनाम। यदि किसी खेत के उत्पादन, जलसंचय, बाढ-हानि, अथवा उपज-विपाक का विचार हो, तो उस क्षेत्र का नामाक्षर मुख्य होगा।

अर्थात् ग्राह्य-नाम का निर्णय “स्वामित्व” से नहीं, “विषय” से होगा।

इसी सिद्धान्त से व्यक्ति-नाम, ग्राम-नाम, क्षेत्र-नाम, तथा पण्य-नाम के भेद सुगमता से समझे जा सकते हैं।


५. बहुनामधेयेषु मुख्यनाम

सूत्रम् ४
बहुनामधेयेषु तदेव नाम ग्राह्यम्, यन्मृदूच्चारितमपि सुप्तं व्यक्तिं बोधयति।

एक व्यक्ति के अनेक नाम हो सकते हैं—गृह-नाम, व्यवहार-नाम, शैक्षिक-नाम, संस्कार-नाम, दीक्षा-नाम, पद-नाम, राजनाम, उपाधि-नाम इत्यादि। तब प्रश्न उठता है कि सर्वतोभद्र के लिए कौन-सा नाम लिया जाए।

इसका शास्त्रीय समाधान यह है कि वही नाम मुख्य माना जाए जो उस व्यक्ति के चैतन्य से सर्वाधिक निकट जुड़ा हो। इसका प्रमाण यह है कि यदि वह नाम मृदु उच्चारण से भी सोये हुए व्यक्ति को जगा दे, तो वही उसका वास्तविक आह्वान-नाम है। यही नामाक्षर चक्रनिर्माण के लिए ग्राह्य होना चाहिए।

इससे दो बातें सिद्ध होती हैं —

  • नाम केवल व्यवहार-चिह्न नहीं, चैतन्य-आह्वान-बिन्दु है।
  • सर्वतोभद्र में ग्राह्य नाम वही है जो जीवित प्रत्युत्तर उत्पन्न करे।

६. संदर्भानुसार नामभेद

सूत्रम् ५
व्यवहारभेदे नामभेदः स्यात्, किन्तु मुख्यफलनिर्णये चैतन्य-संबद्धं नाम प्रधानम्।

कभी-कभी एक ही व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न क्षेत्र में भिन्न नाम चलते हैं। गृह में एक, राजकर्म में दूसरा, मठ या दीक्षा में तीसरा, तथा सार्वजनिक जीवन में चौथा। ऐसी दशा में गौण-चक्र भी बन सकते हैं, किन्तु मुख्य चक्र वही होगा जो उसके जीवित व्यवहार और आन्तरिक प्रत्युत्तर से सम्बन्ध रखता है।

अतः नामभेद सर्वथा अमान्य नहीं; किन्तु उनमें एक क्रम है—

  • मुख्य-नाम
  • व्यवहारिक गौण-नाम
  • अवसरविशेष-नाम

सर्वतोभद्र में मुख्य फलनिर्णय के लिए मुख्य-नाम ही ग्राह्य होगा।


७. क्षेत्रनामस्य प्राधान्यम्

सूत्रम् ६
वर्षा-बाढ-उपज-भूमिधर्मविषये क्षेत्रस्यैव नाम मुख्यं, स्वामिनाम तु गौणम्।

यदि प्रश्न यह हो कि किसी विशिष्ट खेत में वर्षा से लाभ होगा या हानि, बाढ से उपकार होगा या विनाश, उपज बढ़ेगी या घटेगी, लवणता, जलधारण, दाने की गुणवत्ता, अथवा भूमि की प्रकृति क्या फल देगी—तो वहाँ खेत का अपना नाम ही मुख्य होगा।

स्वामी का नाम मुख्य क्यों नहीं?
क्योंकि स्वामी बदल सकता है, विक्रय हो सकता है, उत्तराधिकार बदल सकता है, अधिकारी अभिलेख बदल सकते हैं; किन्तु भूमि का स्वभाव प्रायः बना रहता है, जब तक कोई बड़ा भौगोलिक परिवर्तन न हो। अतः क्षेत्र-फल में स्वामी-नाम आकस्मिक है, क्षेत्रनाम तात्त्विक।

इसलिए वर्षा यदि दो समीपवर्ती खेतों पर समान रूप से पड़े, तब भी फल भिन्न हो सकता है; क्योंकि वर्षा समान है, पर भूमिखण्ड-स्वभाव भिन्न है। सर्वतोभद्र उस भिन्नता को क्षेत्रनाम द्वारा पकड सकता है।


८. क्षेत्रनाम और लोकस्मृति

सूत्रम् ७
लोकप्रयुक्तं क्षेत्रनाम स्वभावसंकेतकं भवति, न केवलम् अभिलेखचिह्नम्।

भारतीय ग्रामों में अनेक खेतों के ऐसे पारम्परिक नाम होते हैं जो सरकारी अभिलेखों में प्रायः नहीं मिलते, किन्तु ग्रामवासियों में सर्वविदित रहते हैं। प्रथमदृष्ट्या वे नाम अनर्थक, अपरिचित, अथवा विकृत प्रतीत हो सकते हैं। परन्तु गहरे निरीक्षण से ज्ञात होता है कि वे प्रायः भूमि की उपज, जलस्वभाव, मिट्टी की प्रकृति, अथवा विशिष्ट दोष-गुण से जुड़े हुए होते हैं।

अतः लोकप्रयुक्त क्षेत्रनाम एक प्रकार की कृषि-स्मृति है। वह केवल पहचान नहीं, बल्कि भूमिस्वभाव का संक्षिप्त संकेत है। ऐसे नामों का सर्वतोभद्र में उपयोग अधिक यथार्थ होगा बनिस्बत किसी शुष्क अधिकारी-संख्या या नवीन कागजी नाम के।


९. समीपवर्ती क्षेत्रेषु भिन्नफलता

सूत्रम् ८
समीपवर्तीभूमिखण्डयोः समानवृष्टावपि भिन्नं फलम् स्यात्, स्वभावभेदात् नामभेदाच्च।

यह अनुभवसिद्ध तथ्य है कि एक ही वर्षा, एक ही बाढ, या एक ही मौसम दो सटे हुए खेतों में समान फल नहीं देती। एक में भरपूर लाभ, दूसरे में मध्यम फल, तीसरे में नाश भी सम्भव है। यदि केवल आकाशीय योग ही निर्णायक होते, तो ऐसे समीपवर्ती भूमिखण्डों में फलभेद कम होता। किन्तु ऐसा नहीं है।

इससे सिद्ध होता है कि आकाशीय घटना के साथ-साथ प्राप्तकर्ता-क्षेत्र का पृथक् स्वभाव भी निर्णायक है। सर्वतोभद्र में यह पृथक् स्वभाव क्षेत्रनाम द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। यही कारण है कि नामाक्षराधारित क्षेत्र-निर्णय छोटे भूभागों के लिए अधिक कारगर हो सकता है।


१०. मेषारम्भ-आधारित समीप-क्षेत्र-चक्रों की सीमा

सूत्रम् ९
अतिसमीपभूमिभागेषु केवल-खगोलारम्भक-चक्राः प्रायः साम्यं यान्ति; नामनक्षत्रमूलक-चक्रं तु सूक्ष्मभेदं गृह्णाति।

यदि छोटे भूभागों के लिए केवल वार्षिक खगोलचक्र या मेषारम्भ से निर्मित क्षेत्र-चक्रों पर निर्भर रहा जाए, तो निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रायः अत्यधिक साम्य उत्पन्न होता है। इससे सूक्ष्म फलभेद पकड़ना कठिन हो जाता है। परन्तु यदि क्षेत्र का मूल नामाक्षर लेकर उसके नक्षत्र-मध्य से चक्र का आधार लिया जाए, तो समीपवर्ती भूमिखण्ड भी पृथक् रूप से उभरते हैं।

अतः छोटे प्रादेशिक एककों में नामनक्षत्राधारित चक्र अधिक सूक्ष्म और उपयोगी सिद्ध हो सकता है।


११. जन्मकालिक वेध, वर्तमान ग्रहवेध, तथा नक्षत्र-परस्पर-वेध

सूत्रम् १०
सर्वतोभद्रे वेधत्रयं विवेच्यम् — जन्मकालिकग्रहवेधः, वर्तमानग्रहवेधः, वर्तमाननक्षत्र-परस्परवेधश्च।

सर्वतोभद्र के प्रयोग में केवल एक प्रकार का वेध न मानना चाहिए। तीन स्तर सम्भव हैं —

  • जन्मकालिक ग्रहवेध — जातक, नाम, जन्मनक्षत्र, जन्माधारित बिन्दुओं पर ग्रह-प्रभाव।
  • वर्तमान ग्रहवेध — रोगारम्भ, यात्रा, प्रश्न, युद्ध, देश, पण्य, वर्षा, बाढ आदि के समय वर्तमान ग्रह-स्थिति से उत्पन्न वेध।
  • वर्तमान नक्षत्र-परस्पर-वेध — वर्तमान आकाश में नक्षत्रों की पारस्परिक स्थिति से उत्पन्न सूक्ष्म प्रभाव।

इन तीनों का संयुक्त विचार करने पर सर्वतोभद्र अधिक परिपक्व रूप से कार्य करता है।


१२. विषयानुसार चक्रनिर्माण-क्रम

सूत्रम् ११
विषयानुसार चक्रनिर्माणे पूर्वं विषय-नाम, ततः तद्नक्षत्रम्, अनन्तरं वेध-विचारः।

चक्रनिर्माण का युक्तिसंगत क्रम यह होना चाहिए —

  • पहले यह निश्चित हो कि विचार किस विषय का है।
  • उस विषय का जीवित, व्यवहारिक, मुख्य नाम लिया जाए।
  • उसके नामाक्षर से नक्षत्राधार ग्रहण किया जाए।
  • फिर जन्मकालिक, वर्तमान ग्रहवेध, तथा आवश्यक हो तो नक्षत्र-परस्पर-वेध का विचार किया जाए।
  • विषय यदि क्षेत्र या ग्राम हो, तो स्वामी-नाम गौण रखा जाए।
  • विषय यदि व्यक्ति हो, तो चैतन्य-आह्वानकारी मुख्य नाम ग्रहण किया जाए।

१३. समाहार

सर्वतोभद्रचक्र की यथार्थ समझ के लिए निम्न बातें स्मरणीय हैं —

  • यह चक्रराज है, अतः व्यापक समन्वयकारी है।
  • यह त्रैलोक्यदीपक है, अतः केवल स्थूल घटना तक सीमित नहीं।
  • चक्र का नामाक्षर उसी विषय का होगा जिसका फल कहा जा रहा है।
  • बहुनामधेयेषु वही नाम ग्राह्य है जो मृदु उच्चारण से भी सुप्त व्यक्ति को जगा दे।
  • क्षेत्र, ग्राम, मण्डल, देश — इनके फल में उन्हीं के नाम मुख्य होंगे।
  • वर्षा, बाढ, उपज, और भूमिधर्म-विचार में क्षेत्रनाम स्वामिनाम से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • लोकप्रयुक्त प्राचीन क्षेत्रनाम भूमिस्वभाव के संकेतक हो सकते हैं।
  • समीपवर्ती भूभागों में सूक्ष्म फलभेद के लिए नामनक्षत्राधारित चक्र अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
  • सर्वतोभद्र में वेधत्रय का विचार अपेक्षित है।

१४. उपसंहार

अतः सर्वतोभद्रचक्र का सही उपयोग तभी सम्भव है जब इसे केवल खगोल-तालिका या केवल नाम-यन्त्र न समझा जाए, बल्कि एक ऐसे समग्र क्षेत्र-तन्त्र के रूप में देखा जाए जिसमें ध्वनि, दिशा, काल, नक्षत्र, भूमि, तथा फल—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

इस दृष्टि से नाम केवल संज्ञा नहीं, स्वभाव-सूचक है। क्षेत्र केवल भूभाग नहीं, फल-ग्राही सत्ता है। दिशा केवल स्थान नहीं, काल-संयुक्त प्रभावक्षेत्र है। और सर्वतोभद्र केवल चक्र नहीं, फलप्रवर्तक महाक्षेत्र है।

निष्कर्ष-सूत्रम्
नामाक्षरं न केवलं संज्ञा, किन्तु स्वभाव-प्रवेशद्वारम्।
सर्वतोभद्रं न केवलं चक्रम्, किन्तु विषय-स्वरूप-फल-समन्वयक्षेत्रम्।
अतः यस्य फलनिर्णयः, तस्यैव नाम ग्राह्यम्।

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