Raaj Jyotisha
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राज-ज्योतिष

परिभाषा

प्रजा के चतुर्विध रंजन के साधन को राष्ट्र कहते हैं |
यूरोप में "नेशन" शब्द का जो अर्थ है वह 'राष्ट्र' का पर्याय नहीं है, नेशन का अर्थ है एक ही कूंए में पैदा होने वाले एक ही नस्ल के मानव-सरीखे दिखने वाले मेंढकों का झुण्ड , जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक अवधारणा है जिसकी परिभाषा और लक्षण वेदों में इसपर विस्तृत सूक्तों, यजुओं आदि पर आधारित है |
चतुर्विध रंजन के साधन का अर्थ है चारों पुरुषार्थों की उपलब्धि का अवसर प्रदान करके केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सर्वांगीण रंजन के समस्त उपकरणों का समुच्चय | ऐसा टिकाऊ सनातन राष्ट्र संसार में एक ही होता है जिसे प्रजा का चतुर्विध भरण करने के कारण भारत कहते हैं |
राष्ट्र के ज्योतिषीय अध्ययन को राजज्योतिष कहते हैं | यह राजा के कल्याण का साधन नहीं है, उसके लिए 'जातक' है | वैदिक संस्कृति में मर्यादा की रक्षा करने वाले पुरुषोत्तम राजा भी उसी को मानते हैं जो प्रजा के चतुर्विध कल्याण हेतु व्यक्तिगत सुख-दुःख की परवाह न करे | कलियुग में अनगिनत क्षणिक और छद्म राष्ट्र उत्पन्न हो जाते हैं जो प्रजा के बहुमत को दुःख ही देते हैं, किन्तु सनातन राष्ट्र भारत कलियुग में अशक्त तो होता है किन्तु कभी नष्ट नहीं होता | राष्ट्र के भौगोलिक विस्तार को देश कहते हैं |
तीनों कालों में जिसका अस्तित्व हो और दश दिशाओं में जिसका विस्तार हो वह देश कहलाता है | दश दिशाएँ हैं — चार दिशाएँ, चार विदिशायें, ऊर्ध्व और अधर | दिशाओं के बीच में विदिशा होती है | भारत देश की सभी दिशाओं के मध्य स्थान को भी ऋषियों ने विदिशा की संज्ञा दी जहां से भारत का देशचक्र बनता है | सनातन संस्कृति के अन्धयुग में इसका नाम विकृत होकर भेलसा हो गया था , अब धर्म का पुनरुत्थान-काल आया है तो पुनः विदिशा नाम का जिला-केन्द्र बन गया है |
जैसा की पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था, राष्ट्र एक जीवन्त प्राणी है जो हर कालखण्ड में अपने संरक्षण-संवर्धन हेतु पुरानी संस्थाओं को नवीन परिस्थितियों के अनुरूप स्वतः अनुकूलित कर लेता है अथवा नयी संस्थाएं खड़ी कर लेता है | राष्ट्र तय करता है कि कब कितने पुरुष और कितनी स्त्रियाँ राष्ट्र में होनी चाहिए (सेक्स-अनुपात), राष्ट्र तय करता है कि कब किस चुनाव में किस राजनैतिक दल के पक्ष या विपक्ष में कैसी अदृश्य लहर प्रचारतन्त्र द्वारा झूठे प्रचार के बावजूद और तथाकथित चुनाव-विशेषज्ञों को झुठलाकर विशाल देश के कोने-कोने में जनता में अवचेतन मनों को टेलिपैथी द्वारा जोड़कर अप्रत्याशित परिणाम ला देंगी, राष्ट्र तय करता है कि उसके लोग धर्म का पालन न करें तो कैसे उनका नाश हो और पालन करें तो कैसे उनका संरक्षण हो |
व्यक्ति के पिछले और वर्तमान जीवन के कर्मों के फल कब पककर प्राप्त हो सकते हैं इसका काल-विधान ज्योतिषशास्त्र का जातक विभाग है, सम्पूर्ण राष्ट्र के सभी लोगों के सामूहिक कर्मफल का कालविधान राजज्योतिष है |

राजज्योतिष के विभाग

प्राचीन राजज्योतिष की सारी विधाएं उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु मूल विधि अक्षुण्ण है , और राजज्योतिष की सभी अवशिष्ट तथा लुप्त विधाएं भी इसी मूल विधि के ही अंग हैं |
व्यक्तिगत कुण्डलियाँ बनानी हों या राष्ट्र की कुण्डली, फलादेश की विधि एक ही है जो पराशर ऋषि के होराशास्त्र पर आधारित है जिसका दो तिहाई लुप्त हो चुका है किन्तु एक तिहाई देवचन्द्र झा जी और गणेशदत्त पाठक जी ने प्रकाशित कराया, परन्तु सीताराम झा ने पाण्डुलिपि में ही मनमाने फेरबदल करके भ्रष्ट संस्करण प्रकाशित करा दिया जिसे अब दक्षिण भारतीय ज्योतिषियों का इन्टरनेट पर आधिपत्य होने के कारण सर्वत्र मान्यता मिलती जा रही है (क्योंकि भावचलित को गायब करने से दक्षिण भारत में मुख्य जन्मकुण्डली पर अल्प प्रभाव पड़ता है जबकि विषुवत से दूर के प्रदेशों में अधिकाधिक कुण्डलियाँ गलत बनने लगती हैं) |
व्यक्तिगत कुण्डली और राष्ट्र की कुण्डली एक ही गणित और फलित से बनती हैं, किन्तु कई महत्वपूर्ण बातों में भारी अन्तर होता है |
'राजज्योतिष' का प्रधान अंग है मेदिनी ज्योतिष ( Mundane Astrology ) जो पृथ्वी की सभी प्राकृतिक और कृत्रिम घटनाओं का अध्ययन करता है | इसके छ स्तर हैं :—

  1. पृथ्वीचक्र (पद्मचक्र) ,
  2. देशचक्र,
  3. प्रदेशचक्र (जनपद),
  4. मण्डलचक्र (जिला),
  5. ग्राम वा नगर चक्र, एवं
  6. गृह्य वा क्षेत्र (खेत) चक्र |

राजज्योतिष की अगली विधा है स्थापनाचक्र — किसी ग्राम या नगर या राज्य की स्थापना काल की कुण्डली या राजा/नेता के पदग्रहण काल की कुण्डली, जैसे कि स्वतन्त्र भारत के स्थापना काल की कुण्डली जो भारत के देशचक्र से भिन्न है और जिस सत्ताधारी वर्ग के हाथों में 15 अगस्त 1947 को सत्ता का हस्तान्तरण हुआ था उनका भाग्य दर्शाता है, पूरे देश का नहीं |

राजज्योतिष की तीसरी विधा — इसमें चौरासी प्राचीन (वैदिक तन्त्र के) तान्त्रिक चक्रों का प्रयोग होता है जिनमें से कई का व्यक्तिगत कुण्डली में भी प्रयोग होता है |

चौथी विधा — कई अवशिष्ट और लुप्त विशिष्ट तकनीकें जो फल को स्पष्ट करने में काम देती हैं |

दीर्घकालिक फलादेश का साधन - दिव्यवर्ष

भारतीय (वैदिक) ज्योतिष के समस्त सिद्धान्त ग्रन्थों और पुराणों के अनुसार 360 सौर वर्षों का एक दिव्य वर्ष होता है, अर्थात देवताओं का एक वर्ष | जिस प्रकार मेषारम्भ (निरयण सूर्य के मेष राशि में प्रवेश) सौर वर्ष के आरम्भ काल से मेदिनी ज्योतिष की कुण्डलियाँ मानचित्र पर बनती हैं, उसी प्रकार दिव्य वर्ष और दिव्य मास आदि की भी कुण्डलियाँ बनती हैं जिसकी परम्परा भुलाई जा चुकी है |
अब तो कुछ ऐसे भी डार्विनवादी तथाकथित हिन्दू हैं जो कहते हैं की दिव्य वर्ष ही मानवीय सौर वर्ष भी हैं और समस्त प्राचीन ग्रन्थों में त्रुटि है जिस कारण कुछ लाख वर्षों की आयु वाली मानव जाति को प्राचीन भारतीयों ने कई अरब वर्षों की आयु दे दी | क्या यह सम्भव है कि दूर-दूर बिखरे गाँवों में सुरक्षित समस्त प्राचीन ग्रन्थों में किसी कलियुगी दुष्ट ने गलत बातें जोड़ दीं ? गीता में भी उत्तरायण को देवों का दिन और दक्षिणायन को उनकी रात कहा गया है जो दिव्य वर्ष के ही दिन-रात हैं | यदि देवताओं और ऋषियों के सारे ग्रन्थ झूठे हैं तो ये लोग उन झूठे ग्रन्थों से दूर क्यों नहीं रह सकते, क्यों उनकी जाँच किये बिना उनकी प्रस्थापनाओं को संशोधित करना चाहते हैं ?
इन्टरनेट पर सक्रिय किसी भी आधुनिकतावादी ज्योतिषी ने मानचित्र पर मेदिनी चक्रों के अध्ययन की आवश्यकता भी स्वीकार नहीं की, यद्यपि वराहमिहिर जैसे कलियुग के प्रसिद्ध ज्योतिषियों ने भी विस्तार से इन मानचित्रीय चक्रों की चर्चा बृहत्-संहिता जैसे ग्रन्थों में की |
अतः इन आधुनिकतावादियों की बातों को किनारे करके प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं की जाँच ज्योतिष के सर्वमान्य सिद्धान्तों के आधार पर होनी चाहिए |

प्राचीन युगों की ऐतिहासिक घटनाओं की जाँच अधिक कठिन है, अतः उनकी चर्चा विस्तार से बाद में करेंगे, पहले उन महत्वपूर्ण घटनाओं और दीर्घकालीन प्रक्रियाओं की जाँच होनी चाहिए जिनकी ऐतिहासिकता और काल-निर्धारण विवादास्पद नहीं हैं |

सनातन संस्कृति के उत्थान और पतन का अध्ययन प्रस्तुत प्रबन्ध का मुख्य विषय है जिसके अन्तर्गत महत्वपूर्ण घटनाओं की ज्योतिषीय गवेषणा द्वारा दीर्घकालिक कालचक्रीय गति को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा |
कालचक्र की वार्षिक परिधि को ही धर्मचक्र कहते हैं जिसमें बारह दर्श (अमावस) तथा बारह पूर्णमास के मुहूर्तों में सर्वप्रथम वैदिक यज्ञ 'दर्शपौर्णमास' होते थे, मलमास या अधिकमास की गिनती धार्मिक वर्षकृत्य (वर्ष के धार्मिक कृत्यों या अनुष्ठानों) में नहीं होती जिस कारण उसे 'मल' या 'अधिक' की संज्ञा दी गयी |
चौबीस अरों (spokes) वाले धर्मचक्र का आरम्भ मेषारम्भ के निकट चैत्र मास की अमावस से होता है जब चैत्र शुक्लपक्ष का आरम्भ होता है, क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में सारे ग्रहों के सहित सूर्य तथा चन्द्र मेषारम्भ पर ही स्थित थे | मेषारम्भ से मानवीय सौर वर्ष का आरम्भ होता है जो देवताओं का मध्याह्न है | देवों का सूर्योदय उत्तरायण को होता है और असुरों का 'दिन' दक्षिणायन अर्थात कर्क संक्रान्ति से होता है, जिसके निकटतम चान्द्रमास श्रावण से असुरों के वाममार्गी तान्त्रिक धार्मिक वर्ष का आरम्भ होता था — इसे सिकन्दर से जोड़ने की परम्परा पञ्चांगकारों में प्रचलित है, जैसा की मकरन्द-प्रकाश ग्रन्थ में उल्लेख है, और अकबर से दान लेने वाले ब्राह्मणों में इसी यवन प्रथा को को हिन्दुओं के धार्मिक वर्ष का आरम्भ मानने की प्रथा आज भी प्रचलित है जिसे अकबर के 'फसली साल' से जोड़ने का प्रयास किया गया, यद्यपि हिन्दुओं के धार्मिक वर्ष में अकबर की कोई रूचि नहीं थी, उसने भारत के फसल-चक्र से राजस्व की उगाही को जोड़ने के लिए फसली वर्ष का आरम्भ किया था क्योंकि मुहम्मद साहब के जीवन के अन्तिम वर्ष में उनको इल्हाम हुआ कि अधिकमास को वर्ष से हटा देना चाहिए जिसके बाद 360 तिथियों वाले चान्द्रवर्ष को हिजरी साल माना जाने लगा जो भारतीय मौसम चक्र और फसल चक्र से मेल नहीं खाता था, जिस कारण राजस्व के बहीखाते गड़बड़ाते थे | इन्हीं 360 तिथियों की अधिष्ठात्री देवियों की मूर्तियाँ काबा के चारों ओर थीं जिनको काबा के पुजारी घराने से आने वाले मुहम्मद साहब ने तोड़ा और अपने इष्टदेव को एकमात्र पूज्य घोषित किया | इन्हीं 360 तिथियों की अधिष्ठात्री देवियों के वाममार्गी तान्त्रिक विद्याओं के विशेषज्ञों को यूनान में सोफिस्ट (सूफी या "ज्ञानी") कहते थे जिन्हें सुकरात ने शास्त्रार्थ में पराजित किया तो उन 360 लोगों ने न्यायाधीश बनकर सुकरात को विषपान हेतु विवश किया | किन्तु मुहम्मद साहब के अन्तिम वर्ष से पहले अधिकमास भी अरबों के वर्ष में था | हिजरी वर्ष के अरबी नामों के अर्थ से स्पष्ट है की उसकी उत्पत्ति भारत के मौसम चक्र पर आधारित है, न की अरब के रेगिस्तानी मौसम पर (देखें लेख "हिजरी वर्ष की उत्पत्ति" : Hijri_Origins.pdf)|

त्रेतायुग के अन्त तक सूर्यवंश से निकलने वाले इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की 360 रानियाँ होती थीं जिनकी गिनती व्यक्तिगत रानियों में नहीं होती थी | श्रीराम अपवाद थे क्योंकि युगान्त के कारण उनको पृथक काल नहीं मिला, दशरथ के काल में से ही ग्यारह सहस्र वर्ष उनको मिल पाए |
उन युगों की ऐतिहासिक घटनाओं का काल निर्धारण और ज्योतिषीय गवेषणा व्यर्थ है क्योंकि उन संस्कृतियों के अवशेष मिश्र के सूर्यपुर (ग्रीक भाषा में हेलिओपोलिस, जो अब 'काहिरा' है) से लेकर आर्यावर्त के भूगर्भजल में डूबे हैं | बिना भौतिक साक्ष्यों के कोई भौतिकवादी इतिहासकार मानेगा नहीं, भारत के साहित्यिक साक्ष्यों को केवल तभी साक्ष्य माना जाता है जब वे सनातनी परम्परा से बाहर के हों | कलियुग के म्लेच्छ इतिहासकार और उनके अनुचर तो "आहत मुद्राओं" (Punched Marked Coins) पर प्राप्त मगध के प्रागैतिहासिक राजचिह्न को भी गौतम बुद्ध से जोड़कर उसे बौद्धमत का धर्मचक्र कहते हैं और इसी भ्रामक सोच के कारण अशोक की लाट पर मगध राज्य राजचिह्न को आधुनिक भारत का राजचिह्न बना दिया गया, जैसे कि बौद्धमत आधुनिक भारत का राजकीय सम्प्रदाय हो ! मगध के प्रागैतिहासिक राजचिह्न को कई इतिहासकार दबे स्वर में "सूर्य" मानने के लिए तैयार हैं (गूगल search में ' Punched Marked Coins' टाइप करने पर सैकड़ों चित्र और उनसे संलग्न विवरण मिल जायेंगे जिनमें कई स्थलों पर इन सिक्कों पर 24 अरों वाले चिह्न को सूर्या कहा गया है), किन्तु इतना भी नहीं सोचते कि सौरवर्ष में चौबीस खण्ड नहीं होते, केवल बारह सौरमास होते हैं जिनमें शुक्ल और कृष्ण पक्ष नहीं होते | सौरवर्ष में से मलमास वाले भाग को निकालकर "शुद्ध" मासों वाले भागों में 360 तिथियों का शुद्ध वर्ष ही 24 अरों वाला धर्मचक्र है | मेषारम्भ से आरम्भ होने वाले सौरवर्ष को मुख्यमान (जो आजकल शक संवत कहलाता है, यह भी भारतीय ही है) कहते हैं जो गणित का आधार है, तथा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होने वाले धार्मिक वर्ष (जो आजकल विक्रम संवत कहलाता है) को गौणमान कहते हैं क्योंकि गणित समस्त गणना का मुख्य आधार होता है |

मानवीय सौरवर्ष के 360 चक्र पूरे होने पर एक दिव्यवर्ष बनता है जिसमें बारह दिव्यमास होते हैं | बारह सहस्र दिव्यवर्षों का एक महायुग होता है जिसके चारों युगों का वर्णन और गणित अथर्ववेद में वर्णित है | एक सहस्र महायुगों का एक कल्प होता है और 72000 कल्पों की ब्रह्मा जी की परमायु होती है जब नवीन ब्रह्मा जी विष्णुनाभि से निकलते हैं | सभी युगों, दिव्य वर्षों, आदि के आरम्भ काल की कुण्डलियों से उस पूरे युग या दिव्य वर्ष के फलादेश का पता चलता है जी दीर्घकालिक ऐतिहासिक परिघटनाओं का संज्ञान कराता है |

इतिहास के समूचे चक्र को कालचक्र कहते हैं जिसके दो भेद होते हैं, जिनका वर्णन इस लेख में है : कालचक्र| मुख्य सौरपक्षीय भेद है निरयण सूर्यसंचारकाल में बनने वाली कुण्डलियों का अध्ययन, और गौण भेद है 42000 वर्षीय अवसर्पिणी कालचक्र एवं 1200 वर्षीय उत्सर्पिणी कालचक्र को मिलाकर बनने वाला एक दृश्यपक्षीय खण्डकल्प जिसमें मानव की एक उप-प्रजाति पृथ्वी पर आती और जाती है | दृश्यपक्षीय कालचक्र सम गति से प्रवाहित "समय" पर नहीं चलता, यह तो संहारक "काल" का अंश है, और लोगारिथ्मिक पैमाने पर चलता है जिसकी प्रक्रिया गूढ़ है | लोगारिथ्मिक पैमाने पर इसके 6000 विभाग होते हैं जिनका प्राचीन विधान भुला दिए (नष्ट कर दिए ) जाने के कारण ईसाइयों ने मानवीय सृष्टि की आयु ही 6000 वर्षों की मान ली | दृश्यपक्षीय कालचक्र के ज्ञान से मानव जाति की जनसंख्या और प्रमुख सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है, किन्तु इससे कुण्डली नहीं बनती | कुण्डलियाँ सौरपक्ष से ही बनती है | उदाहरणार्थ, एक मानवीय सौरवर्ष का फलादेश निरयन मेषारम्भ कालीन कुण्डली से बनाते हैं, निरयण सूर्य की संक्रान्तियों के काल की कुण्डली से मासफल बनता है, निरयन सूर्य के प्रत्येक अंश से एक सौरदिन का फलादेश बनता है | मेदिनी ज्योतिष के सभी छ स्तरों के फलादेश इन्हीं कालखण्डों की कुण्डलियों से बनाए जाते हैं — पृथ्वीचक्र, देशचक्र, प्रदेशचक्र, मण्डलचक्र, नगर या ग्राम का चक्र, और गृह या क्षेत्र का चक्र |

हर चक्र में सोलह मुख्य कुण्डलियाँ (षोडशवर्ग) और अनेक द्वितीयक (निःसृत, secondary, derived) कुण्डलियाँ होती हैं, जैसे की कारकांश, आरूढ़, आदि | मेदिनी की भाँति जातक (व्यक्तिगत) में भी ये सारी कुण्डलियाँ होती हैं जो अधिकाँश ज्योतिषी समयाभाव के कारण नहीं बनाते जिस कारण अनेक कुण्डलियों की सही प्रक्रियाएं भी अब भुला दी गयीं हैं, केवल मूल श्लोक बचे हैं जिनके गलत अर्थ वे भाष्यकार लगाते हैं जिन्होंने कभी उनकी प्रायोगिक जाँच तक करने की आवश्यकता नहीं समझी | ऋषियों के प्राचीन फलित ग्रन्थों का सारांश द्वापर युग के अन्त में अन्तिम वैदिक ऋषि पराशर जी ने संकलित किया जो पाराशरी होरा के नाम से प्रसिद्ध था, आधुनिक काल में उसके तीन खण्ड कर दिए गए हैं — लघु, मध्य और बृहत् पराशर होराशास्त्र | अन्तिम ऋषि होने के कारण कलियुग के लिए पराशर ऋषि ही अन्तिम प्रमाण हैं |
आज यूरोप तो क्या, भारत का भी कोई ज्योतिषी नहीं जानता कि नोस्त्रादमुस की तरह दीर्घकालीन वैश्विक महत्त्व की घटनाओं की भविष्यवाणी कैसे की जाय | हिन्दू राज्यों के पतन के कारण राजज्योतिष का भी पतन हो गया | अब तो कई धूर्त अपने को राजज्योतिषी कहते हैं किन्तु राजज्योतिष असल में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों का ज्योतिष है जिसकी पद्धति वे सीखना भी नहीं चाहते, केवल व्यक्तिगत कुण्डलियाँ बनाकर धन कमाने में व्यस्त रहते हैं, और यदि कोई जानकार व्यक्ति बताना चाहे तो उसे शत्रु समझ लेते हैं — क्योंकि व्यक्तिगत कुण्डलियाँ बनाने से पैसा झड़ता है जबकि राजज्योतिष से आज भी भारत के शासक वर्ग को कोई सरोकार नहीं है, यद्यपि जब संकट सिर पर आता है तो हमारे शासक भी अपनी व्यक्तिगत कुण्डली दिखाते हैं, किन्तु राष्ट्र के कल्याण हेतु ज्योतिष की सहायता नहीं लेना चाहते | एक तरह से यह भी ठीक ही है, क्योंकि राजसत्ता यदि ज्योतिषियों से सलाह लेकर पञ्चवर्षीय योजनायें बनाने लगे तो धूर्त धन्धेबाजों के गिरोह वहाँ भी कब्जा जमा लेंगे और देश का बेड़ा गर्क करा देंगे |

मेदिनीचक्र बनाने की विधि

इस प्राचीन पद्धति के अनेक उदाहरणों सहित विस्तृत वर्णन प्रस्तुत वेबसाइट पर कई वर्षों से हैं | इन सारे मेदिनी वाले लेखों के उदाहरण मुफ्त Kundalee Software के MEDINI मोड्यूल द्वारा बनाए गए हैं जिसका डाउनलोड वेब-लिंक यहाँ क्लिक करने पर दिख जाएगा |
[ यह Kundalee Software डाउनलोड करने से पहले कई लोग डाउनलोड पेज के निर्देश ठीक से नहीं पढ़ते और फिर शिकायत करते रहते हैं कि सॉफ्टवेयर इन्स्टॉल नहीं होता |]
प्रस्तुत वेबसाइट के मेदिनी टैब में सबसे विस्तृत उदाहरण है आधुनिक युग का इतिहास जो 20-4-2015 को अन्तिम बार सम्पादित किया गया था |

नोस्त्रदामुस की विधि स्थूल और अस्पष्ट थी, किन्तु प्राचीन वैदिक यामल तन्त्रों और ऋषियों के ज्योतिष ग्रन्थों पर आधारित प्रस्तुत वैदिक विधि अत्यधिक सूक्ष्म है, यद्यपि केवल संक्षिप्त महत्वपूर्ण बिन्दुओं का ही इन मेदिनी लेखों में स्पष्टीकरण किया गया है, शेष बिन्दुओं का स्पष्टीकरण इसी वेबसाइट के मेदिनी के सिवा अन्य समस्त लेखों में मिल जाएगा क्योंकि मेदिनी हो या जातक, मूल विधि एक ही है |
तब हज़ारों वर्षों के विश्व इतिहास की ज्योतिषीय झलक आसानी से दिखाना सम्भव हो सकेगा , जो ऋषियों की प्राचीन पद्धति के पुनरुद्धार हेतु आवश्यक है | व्यक्तिगत कुण्डली में जन्मकाल की कुछ अनिश्चितता भी रहती है, किन्तु राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय कुण्डलियों में वर्ष या मास आदि के प्रवेश काल की कुण्डली बनती है जिसमें काल पूर्णतया शुद्ध रहता है जिस कारण ज्योतिषीय विधियों और नियमों को भी समझने में शंका की सम्भावना नहीं रहती |

पहले ईसापूर्व 582 से लेकर ईसा के पश्चात 1579 तक के इतिहास की संक्षिप्त रूपरेखा दिखाना आवश्यक है, तत्पश्चात उसकी पृष्ठभूमि में विशिष्ट घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण उचित होगा, जैसे कि तराइन, चित्तौर, पानीपत, पलासी, वाटरलू, सिकन्दर या चन्द्रगुप्त आदि के युद्ध अथवा विश्वयुद्ध | ऐसी घटनाओं के ज्योतिषीय अध्ययन द्वारा उन छुपी हुई प्रक्रियाओं और कारणों का भी खुलासा हो सकता है जो सामान्यतः इतिहासकारों की दृष्टि में नहीं आते | "ईसापूर्व 582 से लेकर ईसा के पश्चात 1579 तक" जैसे कालखण्ड मेरे मनमाने नहीं है, देवताओं द्वारा निर्धारित "दिव्य वर्ष" पर आधारित हैं, व्यक्तियों के नाम या वंश पर आधारित युगों का नामकरण भारतीय परम्परा नहीं है, जैसे की गुप्तकाल या मुगलकाल|

अब दिव्य वर्षों की कुण्डलियों के फलादेश की प्रक्रिया पर आते हैं जो इतिहास की गूढ़ प्रक्रियाओं को समझने में सहायक है | कल्प के आरम्भ से सृष्टि के आरम्भ तक 47400 दिव्य वर्ष बीतें जब मानवीय सृष्टि का अभाव था | सृष्टि के आरम्भ से कलियुग के आरम्भ तक 5433000 दिव्य वर्ष बीतें | कलियुग का आठवाँ दिव्य वर्ष ईसापूर्व 582 से ईसापूर्व 222 तक था | कलियुग के आठवें दिव्य वर्ष की कुण्डली बनाने के लिए Kundalee Software के डिफ़ॉल्ट सेटिंग में ऊपर दाहिनी ओर के कॉम्बो से "मेदिनी" चुन लें, उसके बाद ऊपर बांयीं ओर के कॉम्बो से संसार के लिए "मेरु" अथवा भारत के लिए "विदिशा" चुन लें | तत्पश्चात बांयी ओर वर्ष वाले खाने में "-582" लिखकर "स्टार्ट" बटन दबा दें, अन्य कोई छेड़छाड़ न करें, 'मेरु' चुनने पर मानचित्र पर "जगत-लग्न" अथवा पृथ्वीचक्र की लग्न-कुण्डली बन जायेगी और 'विदिशा' चुनने पर भारत का देशचक्र बनेगा| अन्य सारे षोडश वर्गों और अन्यान्य कुण्डलियों को भी मानचित्र पर बनाने का प्रावधान इस सॉफ्टवेयर में है |

ईसापूर्व 582 से ईस्वी 1939 तक की सभी दिव्य वर्षों के आरम्भ काल की लग्न-कुण्डलियाँ इस पेज के नीचे FILES बटन दबाने पर दिखेंगी |

विश्व-इतिहास का दीर्घकालीन सारांश

(राज-ज्योतिष की गोपनीय विधि, कुण्डली सॉफ्टवेयर पर आधारित)
संलग्न चित्र में 1939 से 2299 ईस्वी तक के 360-वर्षीय दिव्य वर्ष की वैश्विक कुण्डली है | पहले कालचक्र का दीर्घकालीन फलादेश स्पष्ट कर लें, जो समूची सृष्टि में लागू रहता है |
पूर्वी अफ्रीका के मेरु पर्वत (माउंट केन्या) में सृष्टि का केन्द्र है जहाँ से जगत-लग्न की कुण्डली बनती है | ईसापूर्व 40000 में मानव की वर्तमान प्रजाति (sub-specie) का प्रादुर्भाव हुआ था जिसके बाद दो दिशाओं में इसका विस्तार सर्वाधिक हुआ — बड़े काले अक्षर में "2" संख्या वाली वृष राशि में तथा बड़े काले अक्षर में "5" संख्या वाली सिंह राशि में , क्योंकि वर्ष के आरम्भ में वर्ष-कुण्डलियाँ बनती हैं जब सिंह राशि के स्वामी उच्च में रहते हैं और वृष के स्वामी शुक्र या तो उच्च में रहते हैं या उच्चस्थ सूर्य के साथ रहते हैं या स्वगृह में रहते हैं, जिस कारण पूरे विश्व पर सदैव इन्ही दो राशियों में स्थित देशों का वर्चस्व रहता है |
कालचक्र (अवसर्पिणी) के आरम्भ में सिंह राशि में मेरु से आरम्भ होकर उसके बाद सूडान (मेरु-सभ्यता और कुश सभ्यता) , फिर मिस्र, तत्पश्चात ग्रीस, उसके बाद रोम, फिर स्पेन-फ्रांस-जर्मनी (हैप्सबर्ग) और तब इंग्लैंड एवं अन्ततः अमरीका का वर्चस्व होता है |
कालचक्र के आरम्भ में वृष राशि में मेरु से आरम्भ होकर उसके बाद भारत, फिर चीन, और तब कोरिया एवं जापान का वर्चस्व होता है |
कालचक्र उलटा घूमता है (उत्सर्पिणी, चित्र में मोटे लाल तीर से दिखाया गया है) उपरोक्त देशों का वर्चस्व उलटे क्रम में होता है | उलटे कालचक्र की गति 36 गुनी तेज होती है | अवसर्पिणी 42000 वर्षों का होता है, और उत्सर्पिणी केवल 1200 वर्षों का | उत्सर्पिणी में पुराणी sub-specie का extinction होता है और नयी मानव प्रजाति आती है | उत्सर्पिणी का आरम्भ 2000 ईस्वी की मेष संक्रान्ति को हो चुका है | अमरीका का पतन आरम्भ हो गया , ब्रिटेन में तेल के कूँए खोजे गए, अब जर्मनी उठने वाला है जिस कारण अमरीका और ब्रिटेन मिलकर जर्मनी को रोकने के लिए अरब शरणार्थियों को बलपूर्वक वहां भेज रहे हैं, किन्तु यूरोपियन संघ की नीतियाँ अब मुख्यतः जर्मनी और उसका कनिष्ठ सहयोगी फ्रांस तय करने लगा है, ब्रिटेन तो संघ से भाग खड़ा हुआ है | पूर्व में जापान का वर्चस्व समाप्त हुआ और अब कोरिया एवं चीन आगे आ गए हैं, जिसके बाद भारत की बारी है | कालचक्र की गति मेरु के पास धीमी और मेरु से दूर तीव्र होती है (लोगरिथमिक स्केल होता है) जिस कारण भारत का वर्चस्व लगभग 41 हज़ार वर्षों तक और भारत का पतन केवल एक हज़ार वर्षों तक होता है | सिंह राशि में भी अमरीका-इंग्लैंड का उत्थान अल्पकाल के लिए और सूडान-मिस्र का उत्थान दीर्घकाल के लिए होता है | शुक्र दो राशियों के स्वामी होते हैं, जिनमें चन्द्रमा के उच्चत्व के कारण वृष शुभ है और शनि के उच्चत्व के कारण तुला अशुभ है | अतः वृष के क्षेत्र में शुभ स्वभाव की सभ्यता पनपती है | कुण्डली में शुक्र वृष में अथवा उसके बगल में उच्चत्व को प्राप्त करता है जिस कारण कालचक्र में वृष का वर्चस्व होता है, तुला का नहीं | काम (जनसंख्या), कला, साहित्य, संस्कृति, आदि में वृष का वर्चस्व रहता है | सिंह क्रूर है, अतः सिंह राशि के देश युद्ध आदि क्रूर और पाप कर्मों वाले होते हैं | कालचक्र के आरम्भिक भागों में पाप का बल अल्प होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है | अतः मिस्र या ग्रीस की तुलना में अमरीका पाप की पराकाष्ठा तक पँहुचता है | मिस्र या ग्रीस के सम्प्रदायों की तुलना में रोमन चर्च अपेक्षाकृत अशुभ होता है, और उससे भी अधिक अशुभ प्रोटेस्टेंट है जिसमें वासना को स्वतन्त्रता मिलती है | सूर्य और शुक्र की राशियों के अलावा कभी कभी बुध की मिथुन और कन्या राशि का बल भी बढ़ता है क्योंकि बुध भी 35% समय उच्च के सूर्य के साथ रहते हैं | परन्तु सूर्य और शुक्र वर्ष-कुण्डली में सदैव बलवान होते हैं |

कलियुग का दिव्यवर्ष-8 : ईसापूर्व 582 से ईसापूर्व 222

इस कुण्डली में ग्रीस-रोम आदि क्षेत्र एकादश भाव में हैं | एकादश भाव पूर्णतया सूर्य की सिंह राशि में है, सूर्य सप्तम भाव में उच्चस्थ और राहू सहित हैं | केन्द्र (सप्तम भाव) में सूर्य का बल और भी बढ़ जाता है | एकादशेश सर्वाधिक पापफल देता है | दशमेश होने के कारण चन्द्रमा भी पापग्रह बनकर एकादश में बैठकर उस क्षेत्र को और भी अधिक पापमय बना रहे हैं | धर्म (नवम भाव) और मोक्ष (द्वादश भाव) के स्वामी बुध सूर्य के साथ हैं किन्तु सूर्य उनके शत्रु हैं | विवेक और विद्या के स्वामी शनि लग्न में उच्चस्थ बैठकर पञ्च-महापुरुष योग बना रहे हैं और सूर्य से पूर्ण अतिशत्रू सम्बन्ध बना रहे हैं |
अतः ग्रीस और रोम का उत्थान तो है किन्तु उनके प्रभाव-क्षेत्रों में पाप का साम्राज्य और धर्म, विद्या एवं विवेक का नाश है | सिकन्दरिया में महान पुस्तकालय को जलाया गया, विद्वानों की सर्वत्र हत्या की गयी | ग्रीस और रोम में प्रागैतिहासिक (वैदिक) जनतान्त्रिक परम्पराओं का नाश इसी काल में हुआ, प्राचीन संस्कृति के पुनरुत्थान की मांग करने वाले सुकरात को विष पिलाया गया जो पापियों के आधिपत्य का सूचक है | सप्तम भाव में सूर्य है जो प्रवास का भाव भी है | अतः सूर्य के क्षेत्र एकादश, उसमें स्थित चन्द्रमा के क्षेत्र दशम, और सूर्य के प्रभाव में स्थित बुध के क्षेत्र नवम और द्वादश — इन क्षेत्रों पर ग्रीस और रोम का साम्राज्यवादी प्रभाव बढ़ा और यवन प्रवासियों के उपनिवेश खुले — सिन्धु नदी से अटलाण्टिक तट तक | इन सभी प्रदेशों में सबसे अशुभ फल फारस को मिला जहाँ सूर्य की शत्रु दृष्टि थी |

साम्राज्यवाद बलवान पापग्रह का परिणाम है क्योंकि साम्राज्यवाद के कारण लोकतांत्रिक परम्पराओं और संस्थाओं का नाश होता है और जनहित के बदले उच्च वर्ग के हित में राजसत्ता जुट जाती है |
भारत मृत्यु के अष्टम भाव में है किन्तु वहां स्वगृही शुक्र लग्नेश होकर बैठकर उस भाव को शुभ बना रहे हैं | जिस प्रकार सूर्य और उनके सम्बन्धियों के कारण पश्चिम में यवनों का उत्थान हुआ, उन्हीं ग्रहों - सूर्य, राहू और चन्द्रमा द्वारा सर्वतोभद्र-वेध के कारण भारत में भयंकर मारकाट (मृत्युभाव) के परिणामस्वरूप मगध का उत्थान हुआ | सूर्य की लगभग शून्य दृष्टि भारत पर थी जिस कारण सिकन्दर द्वारा भारत को जीतने की योजना सफल नहीं हो सकी — स्वगृही शुक्र के कारण भारत का ग्रह बलवान था, सूर्य बलवान होते हुए भी भारत पर प्रभावहीन था | अष्टम भाव गुप्त विद्या का भाव होता है, मोक्ष त्रिकोण का अंग है | इसी काल में भारत में 65 सन्यासी सम्प्रदायों का उल्लेख मिलता है, बौद्ध और जैन जैसे संन्यास आश्रम वाले सम्प्रदाय भी उन्हीं में से थे | किन्तु सनातनी संन्यास आश्रम का पतनकाल था क्योंकि अत्यधिक अशुभ (3-6 के स्वामी) होकर बृहस्पति मोक्ष भाव में थे और भारत पर उनकी पूर्ण एवं अतिशत्रु दृष्टि थी | स्वगृही शुक्र के कारण भारत का राजनैतिक एकीकरण हुआ | किन्तु भारत की तुलना में चीन में साम्राज्यवाद का विकास अधिक हुआ क्योंकि चीन पर शुक्र के भाव में होने के अलावा सूर्य का सर्वतोभद्र वेध भी था — इसी काल में "चीन" का एकीकरण हुआ और साम्राज्यवाद ने भौगोलिक विस्तार हेतु विशाल अभियान आरम्भ किया | भारत में खूँखार साम्राज्यवाद का विस्तार शुक्र से विद्ध नाम वाले अशोक ने किया जिसपर साम्राज्यवादी सूर्य से प्रभावित चन्द्रमा और बुध के भी अशुभ वेध थे | इन तीनों ग्रहों का वेध "ब" (बुद्ध) पर भी था, किन्तु उसपर शनि का अतिरिक्त वेध भी था जो केन्द्रेश-त्रिकोणेश होने के कारण शुभ राजयोगकारी तो थे ही, उच्चस्थ होकर लग्न में बैठने के कारण पञ्च-महापुरुष योग भी बना रहे थे | अतः दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में अशोक से भी बहुत अधिक बलवान बुद्ध का राजयोग था और वह योग शनि के कारण धार्मिक और शुभ था — भारत से चीन तक |

राजनीति हेतु दशमांश-वर्ग देखना चाहिए (इसके लिए Kundalee Software में स्विचबोर्ड में MAIN बटन दबाएँ, जो पेज खुलेगा उसमें "षोडशवर्ग दशा" में 10 लिखकर उसके बटन को दबाएँ|) दशमांश-वर्ग में राशि ही भाव होता है | उसमें सूर्य मेष में उच्चस्थ हैं जिस कारण तमिल और केरल अशोक के साम्राज्यवाद से बच गए | शुक्र चतुर्थ (केन्द्र) एवं नवम (त्रिकोण) के स्वामी होने के कारण राजयोगकारक हैं और भूमि के चतुर्थ भाव (केन्द्र) में स्वगृही बैठकर बलवान योग बना रहे हैं जिस कारण लग्न-वर्ग के शुभ फलों की वृद्धि और अशुभ फलों में कमी हुई | दशमांश-वर्ग की शक्ति लग्न-कुण्डली से बहुत अल्प होती है, किन्तु प्रभावी ग्रह बली हो तो महत्वपूर्ण बन जाता है | दशमांश-वर्ग भारत में सर्वाधिक सर्वतोभद्र वेध मगध पर था — सूर्य, शनि, मंगल और राहू — ये चारों पापग्रह थे | भारत से बाहर सर्वाधिक वेध यवन पर था | इन्ही दोनों के विस्तार का युग था | भारत में बुद्ध नहीं होते तो और भी अधिक मारकाट मचती | बुद्ध क्या खाते थे इससे अधिक महत्त्व इस तथ्य का है कि उन्होंने अनावश्यक साम्राज्यविस्तार वाले युद्धों के विरुद्ध वातावरण बनाया |
"च" पर उच्च सूर्य का वेध प्रथम एवं दशम दोनों वर्गों में था जिस कारण चीन को बल मिला तो भारत में चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने देश को बचाया और एकताबद्ध किया - सूर्य के कारण युद्ध द्वारा न कि प्रवचन द्वारा |
इसी प्रकार अन्य वर्गों के फल पाराशरी होरा के अनुसार बनाएं | तब स्पष्ट हो जाएगा की जिन साम्राज्यवादी आक्रान्ताओं को उनके प्रशंसक इतिहासकार शुभ बताकर पढ़ाते हैं वे असल में खून-खराबा करने वाले अशुभ और पापी हमलावर थे जिन्होंने अनेक संस्कृतियों को नष्ट किया |

इसी दिव्यवर्ष की विदिशा-कुण्डली (भारत का देशचक्र) बनाने पर जो फल मिलेगा वह लोकतान्त्रिक जनपदों के महासंघ कलिंग के बारे में मेगास्थानीस के वर्णन को सत्यापित करता है और साम्राजवादी इतिहासकारों को झुठलाता है, किन्तु यह अत्यधिक विस्तृत विषय है | कलिंग-युद्ध का मुख्य क्षेत्र ओड़िसा नहीं था, यद्यपि वह भी पूरी तरह से युद्ध में सम्मिलित था, वहां तो मौर्यों के पतन होते ही खारवेल का महान साम्राज्य स्थापित हुआ | कलिंग-युद्ध से सर्वाधिक क्षति मगध के चारों ओर उन गणराज्यों को हुई जो चाणक्य के महासंघ में सम्मिलित थे | गुप्त साम्राज्य वैशाली की राजकुमारी कुमारदेवी से वैवाहिक सम्बन्ध के कारण बढ़ा तो मौर्यों के काल में वैशाली लुप्त कैसे हो सकता था ? आजतक हमारे इतिहासकार अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए साम्राज्यवादी भ्रमजाल से निकल नहीं पाए हैं | अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारतीयों को यह पता चले कि जिस युग में अंग्रेजों के पूर्वज जंगली थे उस युग में भी भारत में लोकतन्त्र की परम्पराएं विश्व में सर्वाधिक विकसित थीं | अंग्रेज तो पढ़ाते थे कि भारतीय स्वराज्य के योग्य ही नहीं हैं, सदैव आक्रान्ताओं द्वारा ही शासित रहे हैं और रहेंगे | उनके 'मूलनिवासी' चेले आजतक यही उपनिवेशवादी हल्ला मचाते हैं , जिन्हें पता ही नहीं है कि इन्हीं तथाकथित मूलनिवासियों के दलित और पिछड़े वर्गों के नेता प्राचीन भारतीय गणराज्यों के नियन्ता थे - लोरिक, सलहेस (शैलेश), दीनाभद्री, आदि इन महावीरों की लोकगाथाएं आज भी असम से गुजरात तक दलितों और पिछड़े समुदायों में प्रचलित हैं |

केवल लोरिक महाकाव्य में मैंने 26 स्थलों को चुना और उन सभी स्थानों की पुरातात्विक जाँच की, उन सबके ऊपरी स्तर लगभग ईस्वी 600 के थे और नीचे भूगर्भजल तक के स्तर लगभग ईसापूर्व 600 के थे — रोमन साम्राज्य के पतन और इस्लाम के उदय के कारण भारत के व्यापार का नाश हुआ जिस कारण यहाँ के कारीगर और वणिक वर्गों का पतन हुआ और वे "पिछड़े" बन गए | ईस्वी 600 से पहले इन तथाकथित पिछड़े और दलित वर्गों के घर पक्की ईंटों के बनते थे जिनके प्रमाण मिलते हैं, और ब्राह्मण झोपड़ियों में रहते थे जिनके कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं बचे, केवल ग्रन्थ बचे हैं जिनमें भारत के अन्धयुग में प्रक्षिप्त अंश जोड़े गए और जो सही अंश बचे हैं उनकी जानबूझकर झूठी व्याख्याएं पढाई जाती हैं |
जिस वर्ष सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया उस वर्ष का वर्षफल (दिव्य नहीं, सामान्य वर्ष) बनाएं, तब पता चलेगा कि सिकन्दर भारत में घुसने के मुख्य मार्ग — पंजाब — द्वारा क्यों नहीं घुस सका और क्यों उत्तर झेलम की ओर से भारत में घुसने का प्रयास कर रहा था, बाद में दक्षिण पंजाब के मुल्तानी मालव वीरों (जो उज्जैन में मालवों की ही शाखा थे) से उसका संघर्ष हुआ जिनके भालों से घायल होकर वह भागा और उसी चोट से रास्ते में ही मर गया, फिर भी मक्कारों द्वारा उस हत्यारे गुण्डे को विश्व-विजेता कहा जाता है जिसके लिए झेलम और मालव जैसे एक-एक जिले भी पर्याप्त थे !!

फारस का पतन

ऊपर मैंने एक बात का उल्लेख किया था — "भारत में खूँखार साम्राज्यवाद का विस्तार शुक्र से विद्ध नाम वाले अशोक ने किया जिसपर साम्राज्यवादी सूर्य से प्रभावित चन्द्रमा और बुध के भी अशुभ वेध थे |"
किन्तु "अ" का वेध केवल अशोक के नाम पर ही नहीं था, उस युग में साम्राज्यवाद आरम्भ करने वाले अजातशत्रु और अलेक्सान्दर (अल-केशिन-तृ : मिश्री हीएरोग्लिफ में ग्रीककाल का उच्चारण) के नाम भी अशोक की तरह ही विद्ध थे |
फारस को सबसे अधिक क्षति पँहुची यह तो मैंने लिखा किन्तु उसकी विस्तृत व्याख्या नहीं की | एक लेख में सारी घटनाओं का विवरण सम्भव नहीं है | किन्तु उन तथ्यों का उल्लेख आवश्यक है जो इतिहासकार जानबूझकर छुपाते हैं | फारस में वेद-विरोधी असुरों का राज था जो पारसियों के धर्मग्रन्थ 'जेंड-अवेस्ता' के काल से ही असुर-महत (मोहेंजोदड़ो का महिषासुर) के भक्त थे, उसे "अहुर-मज्द" कहते थे और सप्तसिन्धु को हप्त-हिन्दू कहते थे ("हिन्दू" शब्द की उत्पत्ति वहीं से हुई)| सिकन्दर ने उनके अन्तिम साम्राज्य को नष्ट कर दिया जो हख्मनी वंश का था |
उस वंश में अन्तिम शक्तिशाली सम्राट था क्षयार्ष जिसके नाम का अर्थ है "ऋषियों के आर्ष धर्म का क्षय करने वाला असुर-पूजक"| "आर्ष" का अर्थ ही है "ऋषियों के आर्ष धर्म या मत" | यूरोपियन इतिहासकारों ने जानबूझकर इतिहास की पुस्तकों में नाम बिगाड़कर क्षयार्ष को Xerxes लिखा और जेर्क्सीज कहा जो ग्रीक अपभ्रंश था, प्राचीन फारसी नहीं | प्राचीन फारसी नाम "क्षयार्ष" पढ़ाते तो भारतीय छात्र रहस्य जान लेते कि जिस "आर्य" शब्द पर ईरान का नामकरण हुआ था उस वैदिक "आर्यान" का पतन बहुत पहले ही हो चुका था और असुरों का कब्जा ईसापूर्व दूसरी-तीसरी सहस्राब्दी में ही ईरान में हो चुका था, अतः वैदिक काल उससे बहुत पहले मानना पड़ता ! (वेदों का गलत काल पढ़ाने के लिए तथ्यों का विकृतीकरण हर स्तर पर किया गया जिसपर राष्ट्रवादी इतिहासकार भी ध्यान नहीं देते, क्योंकि उनकी संख्या अल्प है और संघ परिवार को इन बातों में रूचि नहीं है ; शिक्षा-प्रणाली से वामपन्थी कचड़े को निकालने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है !!)
अतः सिकन्दर का फारस से युद्ध या उससे पहले क्षयार्ष का यूनान पर आक्रमण असुरों का आपसी युद्ध था |
क्षयार्ष बहुत शक्तिशाली साम्राज्य का स्वामी था, किन्तु यूनान का उत्थान और फारस का पतन उसके असफल यूनान-आक्रमण से ही आरम्भ हुआ | इसका कारण है उस दिव्यवर्ष के सर्वतोभद्रचक्र में "क्ष" (अर्थात "क", क्योंकि क्ष = क् + ष) पर चन्द्रमा और बुध के वेध थे | चन्द्रमा अत्यधिक अशुभ थे - केन्द्रेश-दोष (दशमेश) से ग्रस्त होकर एकादश में स्थित थे, ये दोनों लक्षण अशुभ हैं | बुध उच्चस्थ और अशुभ सूर्य के साथ थे और सूर्य उनके शत्रु थे | अतः क्षयार्ष से ही फारस का पतन आरम्भ हुआ जिसका पूरा साम्राज्य सिकन्दर के हाथ लग गया, इसे यूरोप के धूर्तों ने विश्व-विजय की संज्ञा दी, यद्यपि वह केवल फारस के साम्राज्य का विजय था | विश्व उतना ही बड़ा तो नहीं था |
फारस का अन्तिम हख्मनी राजा था "द" ("दारा", जिसे यूरोप के मूर्ख "डेरियस" कहते हैं) जिसे सिकन्दर ने हराया था जिसपर बृहस्पति का सम्मुख वेध था | बृहस्पति पूरी कुण्डली में सबसे अशुभ ग्रह थे, तीसरे और छठे भावों के स्वामी होकर हानि के बारहवें भाव में थे, अतिशत्रू बुध की राशि में थे जिस कारण अशुभता बढ़ गयी, और वक्री भी थे | वक्री ग्रह शुभ हो तो शुभत्व बढ़ता है और अशुभ हो तो अशुभत्व बढ़ता है |
सर्वतोभद्रचक्र को त्रैलोक्यदीपक और चक्रराज कहा जाता है | वेदतुल्य माने जाने वाले यामल तन्त्र के चौरासी ज्योतिषीय चक्रों में यह सबसे प्रमुख है | इसका जो व्यक्ति गलत उद्देश्यों से प्रयोग करता है उसे यह चक्र नष्ट कर डालता है |

विभिन्न स्तरों वाले कालचक्र

राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय भविष्यवाणी के आधार मेदिनी ज्योतिष के सप्तपदी दिक्चक्र हैं — (१) मेरुकेन्द्रित पृथ्वीचक्र जिसे नरपतिजयचर्या में पद्मचक्र कहा गया,(२) उससे निचले स्तर पर देशचक्र जैसे कि भौगोलिक भारतदेश के केन्द्र विदिशा से बनने वाला देशचक्र,(३) फिर उससे नीचे प्रदेशचक्र,(४) फिर उससे नीचे मण्डलचक्र,(५) फिर उससे नीचे नगरचक्र वा ग्रामचक्र,(६) और अन्त में सबसे नीचे गृहचक्र वा क्षेत्रचक्र जैसे कि फसल वाले खेत का चक्र ।

सातवाँ स्तर है जीवचक्र जिसे मेदिनी ज्योतिष से पृथक “जातक” स्कन्ध में रखा जाता है किन्तु जीव का जन्मस्थान भी भूगोल का अचल बिन्दु ही है । जीवचक्र को जन्मकुण्डली कहते हैं ।

इन दिक्चक्रों के अलावा विविध कालचक्र होते हैं जिनके द्वारा घटनाओं का काल निर्धारित होता है । विंशोत्तरी आदि दशाचक्रों का प्रयोग केवल जीवचक्र में ही होता है,किन्तु वर्षचक्र का प्रयोग सप्तपदी के समस्त पदों में होता है । वर्षचक्र के कई स्तर हैं । नीचे दो स्तर हैं — मासचक्र और विदशाचक्र,जो क्रमशः बारह गुणे छोटे च्रक्र हैं,जैसे कि वर्षचक्र है सौरवर्ष का सम्पूर्ण ३६० अंश तो मासचक्र है एक संक्रान्ति अर्थात् ३० सौरदिन और विदशाचक्र है ढाई सौरांश पर बनने वाला चक्र । पराशर होराशास्त्र के सुदर्शनचक्र अध्याय में इनका उल्लेख है । वर्षचक्र के ऊपर वाले चक्रों का प्रयोग जातक में नहीं होता जिस कारण जातकग्रन्थों में उनका उल्लेख नहीं मिलता,वे मेदिनी ज्योतिष के अन्तर्गत हैं किन्तु हिन्दू राज्यों के पतनकाल में उनकी आर्ष पद्धतियों को लोग भूलते गये और धन्धेबाज ज्योतिषियों का इस दिव्य विद्या पर आधिपत्य हो गया । लोग भी वैसे ही हैं जिनको ज्योतिषी भी ऐसे ही पसन्द हैं जिनको मनुस्मृति में चाण्डाल कहा गया । अतः राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय भविष्यवाणी हेतु मनगढ़न्त पद्धतियों का प्रयोग होने लगा है ।

कलनात्मक कालचक्र

काल के दो प्रकार होते हैं — कलनात्मक काल जिसे समगति के कारण समय कहते हैं; तथा संहारात्मक काल जिसकी पद्धति गोपनीय है । (संहारात्मक काल के वर्तमान कालचक्र पर भी निकट भविष्य में लिखना है ।)

इस क्षेत्र में दीर्घकालीन भविष्यवाणी के साधन निम्न चक्र हैं —

(१) कल्पचक्र :
ब्रह्माजी का एक दिनरात दो कल्पों का होता है जिसके दिन वाले भाग में सृष्टि का अस्तित्व होता है और रात में सृष्टि नहीं होता । आधुनिक विज्ञान में इसे बिग−बैंग और स्टेडी−स्टेट प्राकल्पनाओं के समायोजन द्वारा समझा जा सकता है । तीस प्रकार के कल्प होते हैं जिनके आरम्भकालिक ग्रहस्पष्ट पृथक होते हैं,उन सबके नाम पृथक होते हैं । कल्पारम्भकालिक कुण्डलियों का फलादेश और ब्रह्माजी की पूर्णायु का गणित ब्रह्मसिद्धान्त में रहता है जो मानवजाति को केवल सृष्टि के आरम्भ में ही दिया जाता है । सभी कल्पों की सारी बातें समान होती हैं,केवल कल्पारम्भकालिक कुण्डलियों के तीस प्रभेद होते हैं जिसका कारण है बीजसंस्कार का पूर्णाङ्क बनने का काल । जैसा कि वराहमिहिर ने लिखा,यह “रहस्य” है जिसका स्पष्ट वर्णन नहीं किया जाता । किन्तु ईस्वी १४७८ तक बीजसंस्कार का गणित बचा हुआ था जिसके आधार पर भारत के सभी भागों और तिब्बत,स्यामदेश,यवद्वीप,प्राचीन यवनदेश,आदि में पञ्चाङ्ग बनते थे,ईस्वी १४७८ के पश्चात बीजसंस्कार का गणित संसार के सारे पञ्चाङ्गकार भूल गये और अब बताने पर भी नहीं मानेंगे — अहङ्कार के कारण ।

(२) मन्वन्तरचक्र :
एक कल्प का गणित ब्रह्मसिद्धान्त में नहीं रहता,वह सूर्यसिद्धान्त में रहता है जो ब्रह्मसिद्धान्त का ही कल्पगणित है । ईस्वी १४७८ के पश्चात सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थ से भी बीजसंस्कार वाले “बीजोपनय” अध्याय को नष्ट करके हटा दिया गया । हर कल्प में १४ मन्वन्तर होते हैं जिनके आरम्भ काल की कुण्डली द्वारा प्रत्येक मन्वन्तर का फलादेश किया जाता है । एक मन्वन्तर ३०७२ लाख वर्षों का होता है । सृष्टिकेन्द्र मेरु से अनभिज्ञ होने के कारण आधुनिक विज्ञान में आकाशगंगा के घूर्णनकाल को २३ करोड़ वर्षों का माना जाता है । इन विषयों पर पृथक लेख में चर्चा करेंगे । अभी वैवस्वत मनु का काल है जिनके उपरान्त सात सावर्णि मनुओं के मन्वन्तर आयेंगे,ऋग्वेद में उनकी स्तुति है । ‘मनुस्मृति’ मनु के आदेशों की स्मृति है जिसका प्रभाव ३०७२ लाख वर्षों तक रहता है । कलियुग के दौरान ऐसे ग्रन्थों में भ्रष्ट अंश जोड़ दिये जाते हैं । वर्तमान ‘मनुस्मृति’ का आधा मन्वन्तर भी नहीं बीता है । एक मन्वन्तर में ७१ महायुग होते हैं ।

(३) युगचक्र :
हर महायुग के चार खण्ड होते हैं — सत् वा कृत,त्रेता,द्वापर और कलि,जिसका उल्लेख ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण में है । वेद के विधिभाग को ब्राह्मण−ग्रन्थ कहते हैं,संहिता और उसके ब्राह्मण−ग्रन्थ को मिलाकर “वेद” कहलाता है । सभी युगों के आरम्भकाल की कुण्डली द्वारा उस युग का फलादेश बनता है । वर्तमान कलियुग ईसापूर्व ३१०२ की मेष−संक्रान्ति के समय आरम्भ हुआ,इसके कुल ४३२००० वर्षों में से केवल ५१२० वर्ष बीते हैं,५१२१ वाँ चल रहा है ।

(४) दिव्यवर्षचक्र :
प्रत्येक ३६० सौर वर्षों का एक दिव्य वर्ष होता है जब मेरु के चतुर्दिक देवलोक का एक घूर्णन पूरा होता है । देवलोक की दूरी भचक्र से छ गुणी अधिक होती है किन्तु देवलोक को देखने के लिये दिव्यदृष्टि अपेक्षित है । दिव्यवर्षचक्र की कुण्डली द्वारा ३६० वर्ष तक के दीर्घकालिक फलादेश कर सकते हैं,जैसे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत पर वर्चस्व ।

(५) सौरवर्षचक्र :
प्रत्येक सौरवर्ष के आरम्भकाल की कुण्डली द्वारा वर्षफल बनता है । उपरोक्त समस्त चक्रों की भाँति सूर्यसिद्धान्तीय स्पष्टसूर्य के गणित द्वारा सौरवर्ष और उसकी कुण्डली का गणित बनता है,भौतिक सूर्य द्वारा नहीं ।

उपरोक्त पाँचों स्तरों के कालचक्रों के मासचक्र और विदशाचक्र भी होते हैं । इनका भी बड़ा महत्व है,खासकर कुछ सहस्र वर्ष के फलादेश का अन्य कोई साधन है भी नहीं । कलियुग के ४३२००० वर्षों में हरेक मासचक्र ३६ सहस्र वर्षों के होते हैं और हरेक विदशाचक्र ३००० वर्षों का होता है । अतः ३६० वर्ष से अधिक काल का फलादेश विदशाचक्र द्वारा ही बनाना पड़ेगा । द्वापरयुग का विदशाचक्र ६००० वर्षों का होता है और त्रेता का ९००० का ।

जबतक इन चक्रों का फलादेश जाँचा न जाय तबतक ये सारी बातें काल्पनिक प्रतीत होंगी । कलियुग में लोग बिना जाँचे वैदिक विद्याओं का तिरस्कार करने लगते हैं जिस कारण इन दिव्य विद्याओं में प्रवेश का अधिकार ही खो बैठते हैं । कलियुग का ऐसा लक्षण कलियुग के आरम्भ कालीन कुण्डली में ही है जब सात ग्रह एक साथ अशुभ भावों में थे!आधे से अधिक ग्रह एक साथ हों तो अच्छे भाव में रहने पर भी अशुभ फल होता है क्योंकि वे आपस में शत्रु बन जाते हैं । अधिकांश ग्रह आपस में वैर रखेंगे तो कुण्डली अशुभ होगी ही । और ऐसा अशुभयोग यदि अशुभभाव में हो तो फल भयानक होगा । वर्तमान कलियुग के पृथ्वीचक्र में सात ग्रह कामभाव में थे,मङ्गल मृत्युभाव में,और राहु अशुभ होकर लग्न में,अर्थात् सारे ग्रह अशुभ थे!इनमें से चार ग्रह स्वगृही अथवा उच्च के थे किन्तु वे सारे भी अशुभ ही थे — सूर्य १२ के स्वामी थे,बृहस्पति ४ और ७ के स्वामी होकर केन्देशदोष से ग्रस्त थे,मङ्गल मूलत्रिकोणस्थ थे किन्तु मृत्युभाव में ऐसा योग और भी अशुभ हो जाता है,तथा शुक्र उच्च के थे एवं २ तथा ९ के स्वामी थे परन्तु शुक्र के सबसे पास थे नीच के बुध जो शुक्र के उच्चत्व को भङ्ग कर रहे थे । फिर भी शुक्र के कारण कलियुग के दौरान धर्म का कुछ अंश शुक्र के क्षेत्र में बचा रहेगा — जिसमें भारत,चीन,कोरिया,जापान आदि हैं,किन्तु इन सबपर अशुभ वेध भारत से अधिक है जिस कारण केवल भारत में ही वास्तविक धर्म कुछ सीमा तक बचा रहेगा,चीन और जापान में कुछ−कुछ बचा तो रहेगा किन्तु अन्य नामों के नीचे दबकर छुपा रहेगा,शेष विश्व में ढूँढ−ढूँढ कर सनातनियों को मिटाया जायगा । नीच के बुध वाले क्षेत्रों से ही सनातन परम्पराओं पर सर्वाधिक उग्र और नीचता वाला प्रहार होगा — जिसमें मक्का से कश्मीर तक का प्रदेश है । बुधप्रदेश में त्रिपुरासुर के विभिन्न अवतार विभिन्न नामों से अवतरित होकर ४३२००० वर्षों तक सनातन धर्म पर राजनैतिक प्रहार करेंगे क्योंकि यह क्षेत्र राजसत्ता वाले भाव में है । बुध के दूसरे भाव में न्यूयॉर्क से टेक्सस तक का प्रदेश है जो कलिकुण्डली के लग्न में है,अतः जब−जब उस क्षेत्र का प्रभाव बढ़ेगा तब−तब अधर्म का प्रसार पूरो विश्व में वहाँ से होगा,जहाँ आज डेमोक्रेट पार्टी का वर्चस्व है ।

त्रिपुरासुर के वर्तमान अवतार १४ शताब्दी पहले पधारे थे — महामदासुर । १४ शताब्दियों के फल न तो ४३२००० वर्षीय कलिकुण्डली में देखना सम्भव है और न ही ३६० वर्षीय दिव्यवर्षचक्र में । उसका एकमात्र उपाय है कलिचक्र का विदशाचक्र जो ३००० वर्षों का होता है । ईसापूर्व १०२ में कलि की दूसरी विदशा आरम्भ हुई थी जो ईस्वी २८९९ तक चलेगी ।

कलियुग फलादेश

कलियुग की दूसरी विदशाचक्र का फलादेश करने से पहले यह ध्यान रखें कि इस चक्र पर इससे ऊपर के दो चक्रों का आधिपत्य रहता है — सम्पूर्ण कलियुग का चक्र,तथा कलियुग का प्रथम मासचक्र । कलियुग के प्रथम मासचक्र की अवधि ३६००० वर्षों तक है,किन्तु इसकी कुण्डली बिल्कुल वही होती है जो सम्पूर्ण कलियुग की है क्योंकि ये दोनों कुण्डलियाँ कलियुगारम्भ से बनती हैं । फिर भी इन दोनों कुण्डलियों के फल में अन्तर होता है,क्योंकि कलियुग के प्रथम मासचक्र के कुण्डली−फल में सम्पूर्ण कलियुग के चक्र की प्रथम राशि मेष का फल भी जुड़ जाता है । यही बात सामान्य वर्षफल के प्रथम मासफल पर भी लागू होती है ।

कलियुग फलादेश : सम्पूर्ण चक्र

अतः पहले सम्पूर्ण कलियुग के फलादेश पर दृष्टिपात करें — केवल भारत के सन्दर्भ में फलादेश का संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत है ।

कुण्डली सॉफ्टवेयर (पुराना) चलाकर उसमें Medini फोल्डर के अन्तर्गत MeruWorldChart चुनें और बाँयी ओर वर्ष में -3102 (अर्थात् ईसापूर्व ३१०२) टाइप करें,और तब बिना अन्य कोई छेड़छाड़ किये START बटन दबा दें,सम्पूर्ण कलियुग की कुण्डली बन जायगी जिसका कार्यकाल ४३२००० सहस्र सौर वर्षों का है ।

मेरु से बनने वाली पृथ्वीचक्र में लग्न−कुण्डली में सात ग्रह सप्तम भावस्थ हैं,षष्ठेश अशुभ राहु लग्नस्थ हैं और मङ्गल मृत्यु के अष्टम भाव में हैं — अतः पूरी कुण्डली अत्यधिक अशुभ है और पूरी कुण्डली पर धर्मविरोधी काम−वासना का नियन्त्रण है क्योंकि बारहों भावों पर जिन ग्रहों का प्रभुत्व है वे सब के सब सप्तम में हैं । किसी भाव में चार या अधिक ग्रह हों तो वह भाव अशुभ हो जाता है क्योंकि एक ही भाव में रहने पर ग्रहों का परस्पर वैर हो जाता है । मङ्गल अस्त होने के कारण सूर्य के अधीन हैं । पूरी कुण्डली में सबसे बलवान दो ग्रह हैं — उच्च के सूर्य और शुक्र । सूर्य बारहवें के स्वामी होकर सप्तम में हैं,अतः अशुभ हैं । शुक्र द्वितीय और नवम के स्वामी हैं अतः मारकेश की मारकाट वाली अशुभता के बावजूद शुभत्व का आधिक्य है,हालाँकि सप्तम में रहने की अशुभता तो है ही । पूरी कुण्डली में केवल शुक्र ही शुभ हैं और यह शुभत्व मुख्यतः धर्म के कारण है और धन का भी आधिक्य है । अतः कलियुग में धर्म का जो एक पाद बचेगा वह भी मुख्यतः केवल शुक्र के ही क्षेत्र में बचेगा । शुक्र के वृषक्षेत्र में भारत,चीन,जापान,कोरिया आदि हैं तथा तुलाक्षेत्र में ब्राजील,कोलम्बिया आदि हैं । तुला में काम की प्रधानता होती है तथा वृष में धर्म की । सर्वतोभद्रचक्र में भारत और चीन पर शुक्र का वेध है,कोरिया या जापान या ब्राजील या कोलम्बिया या पेरु पर नहीं । अतः सम्पूर्ण कलियुग में केवल भारत और चीन में ही धर्म बचा रहेगा ।

परन्तु कलियुग के नवांशचक्र के सर्वतोभद्र में शुक्र का सभी स्वरों पर वेध है,अर्थात् भारत तथा चीन पर भी,किन्तु चीन पर दो अशुभ वेध भी हैं — एकादशेश राहु का,और पञ्मेश सूर्य का अतिशत्रु वेध । पञ्मेश के कारण चीन में विद्या का विकास,किन्तु अतिशत्रु के कारण विद्या द्वारा धर्म की क्षति,अर्थात् कलियुग के दौरान चीन में केवल धर्मविरोधी विद्या का ही विकास होगा । अन्तिम फल यह है कि कलियुग में पूरे संसार में धर्म का जो कुछ भी अंश बचा रहेगा वह भारत में ही रहेगा । परन्तु शुक्र के साथ जितने भी ग्रह हैं उनका अशुभ फल भी मिलता ही रहेगा ।

नवांश में भारत को सर्वाधिक अशुभ फल सूर्य और चन्द्र के देशों द्वारा मिलेगा — सूर्य की राशि वाले देश हैं ब्रिटेन,अमरीका,आदि,तथा चन्द्र की राशि में हैं पूर्वी यूरोप से मध्यपूर्व तक के देश जैसे कि अरब । परन्तु रूस सर्वतोभद्र की चित्रा में हैं जिसका भारत से सम्बन्ध अल्प है जबकि अरब,ब्रिटेन और अमरीका सर्वतोभद्र की रोहिणी और मृगशिरा में हैं जो भारत की वृष राशि में हैं — अतः समपूर्ण कलियुग में भारत को सर्वाधिक खतरा इन्हीं देशों से है ।

कलियुग की कुण्डली में सूर्य मेषारम्भ में हैं तथा मङ्गल ५⋅४ अंश पर जो बली तो हैं किन्तु उच्च सूर्य में अस्त हैं जिस कारण मङ्गल का फल भी सूर्य ने ले लिया । परिणामस्वरूप सूर्य का प्रभाव मङ्गल के काल पर भी रहेगा । मङ्गल का काल है ६४७९⋅३३ वर्ष क्योंकि एक अंश १२०० वर्षों के तुल्य है । ६४७९⋅३३ वर्ष का अर्थ है ईस्वी ३३७८ । कलियुग की कुण्डली में अन्य सारे ग्रह अन्तिम राशि मीन में हैं,केवल छायाग्रह राहु कन्या में हैं । छायाग्रह का प्रभाव तभी पड़ता है जब पूर्ण ग्रह सबल न हों । अतः कलियुग पर सूर्य तथा मीनस्थ ग्रहों की ही प्रभाव बारहों राशियों पर रहेगा,राहु का प्रभाव केवल कन्या के कुछ अंशों पर ही पड़ेगा । कलियुग के आरम्भ से लेकर कन्या के पूर्वाध तक सूर्य का प्राबल्य रहेगा जो १२वें भाव के स्वामी हैं तथा मङ्गल के तीसरे और अष्टम भावों के स्वामित्व का भी फल दे रहे हैं,अतः पराक्रम,नरसंहार,हानि,लूटपाट, आदि का फल दे रहे हैं । सूर्य की राशियों के देश ग्रीस,रोम,ब्रिटेन,अमरीका आदि पूरे संसार को ये अशुभ फल देंगे । सिंह राशि के इन देशों में कब किसका काल आयगा यह संहार−कालचक्र की गोपनीय पद्धति द्वारा देखा जाता है जिसका वर्णन बाद में करेंगे ।

शुक्र का मुख्य काल है कलियुग समाप्त होने से ४३५१ वर्ष पहले,अर्थात् कलियुग के ९९% बीतने पर । उसके बाद बृहस्पति,शनि और केतु हैं,ये तीनों अशुभ हैं,किन्तु शुक्र उच्चस्थ होने के कारण मीन में सर्वाधिक बली है जिस कारण कलियुग के अन्त तक शुक्र का शुभ प्रभाव बना रहेगा ।

सुदर्शन चक्र में यदि सूर्य और चन्द्र एक ही राशि में हों तो लग्नकुण्डली का फल दब जाता है । भाष्यकारों ने भाव के अनुसार सुदर्शन चक्र बनाया है जिस कारण कुण्डली सॉफ्टवेयर में भी वैसा ही दिया गया है,किन्तु मेरा अनुभव है कि समस्त गणना राशि के आधार पर ही करना चाहिये और केवल भावफल ही भाव कुण्डली द्वारा देखना चाहिये । अतः सुदर्शन चक्र का गणित भी राशिचक्र द्वारा ही करना चाहिये । कलियुग की कुण्डली में सूर्य और चन्द्र पृथक राशियों में हैं अतः लग्न कुण्डली की प्रधानता है ।

मीन राशि के आरम्भ में चन्द्रमा हैं जब अरब देशों द्वारा ग़जवा-ए-हिन्द का प्रयास किया जायगा,किन्तु उसके पश्चात शुक्र का काल है जब सारे ग़जवाइयों के लिये क़यामत आयेगी । यह कलियुग के अन्त में भी होगा,और प्रथम मास के अन्त में भी । हदीस में भी ऐसा ही कथन है —— ग़जवा-ए-हिन्द करने पर क़यामत आयेगी,केवल विष्णु के कल्कि अवतार जिनको धार्मिक मानेंगे वही लोग बचेंगे ।

हर गुप्त संहार−कालचक्र के अन्त में भी ऐसा ही होगा जो आरम्भ हो चुका है ।

कलियुग : वर्तमान अंश का फलादेश

सम्पूर्ण कलियुग की कुण्डली में सर्वाधिक प्रबल ग्रह हैं सूर्य जो स्वयं तो उच्च के हैं ही,मूलत्रिकोणस्थ मङ्गल के अस्त होने के कारण मङ्गल के बल का भी अपहरण करके बैठे हैं । सूर्य और मङ्गल का सम्मिलित प्रभाव राहु के काल से कुछ पहले तक है । राहु का काल है कन्या का २८⁰३५′१९″ अर्थात् आज से २०९१८६ वर्ष बाद तक । राहु छायाग्रह है और कलियुग की कुण्डली में अशक्त भी है,अतः सूर्य−मङ्गल का प्रभाव बना रहेगा । फलस्वरूप आजकल भी सूर्य−मङ्गल का प्रभाव सर्वाधिक प्रबल है । सूर्य द्वादशेश होकर सप्तम में हैं,अतः सूर्यफल है कामवासना द्वारा हानि और विनाश । मङ्गल का फल है युद्ध में पराक्रम द्वारा मृत्यु । मङ्गल का मुख्यकाल है ईस्वी ३३७८ जबतक समूची मानव प्रजाति की मृत्यु हो जायगी और नयी प्रजाति पाँव जमा लेगी — जिसका विस्तृत फलादेश संहारकालचक्र द्वारा ही देखा जा सकता है । संहार की वह लीला आरम्भ हो चुकी है क्योंकि आजकल सूर्य−मङ्गल के सम्मिलित फल का मुख्य काल चल रहा है । अभी कलियुग की कुण्डली में पाँचवे अंश का काल है,हर अंश १२०० वर्षों का होता है । मङ्गल का मुख्यफल अर्थात् संहार छठे अंश में है ।

कलियुग की कुण्डली में आरम्भिक ४८६१ वर्ष सप्तम भाव में हैं,अर्थात् कामवासना का प्रचण्ड वेग ईस्वी १७५९ तक बना रहेगा,जिसके पश्चात अष्टम मृत्युभाव का काल है । अर्थात् पलाशी के युद्ध से औद्योगिक क्रान्ति का काल आरम्भ है जिस कारण उपनिवेशवाद एवं वैश्विक युद्धों का खूँखार काल आरम्भ होता है । अष्टमेश तीसरे भाव के स्वामी भी हैं अतः अशुभ और पापमय हैं । तीसरा भाव राजज्योतिष में संचार यान्त्रिकी आदि का भाव है और अष्टत रन्ध्र है अर्थात् कमजोरी का भाव । अतः यान्त्रिक विकास द्वारा मानवजाति स्वयं को खोखला करेगी एवं मङ्गल के मुख्यकाल ईस्वी ३३७८ तक विनष्ट होगी,केवल ३६ लाख २८ सहस्र ८०० लोग बचेंगे ।

कलियुग फलादेश : प्रथम मास

कलियुग के प्रथम मास में कन्या में स्थित राहु तथा मीनस्थ ग्रहों का प्रभाव नगण्य होगा और केवल सूर्य के फल की ही प्रधानता रहेगी जिसका वर्णन ऊपर किया जा चुका है । शुक्र के अन्तर्गत भारत में भी धर्म दबा रहेगा,जिसका अभ्युत्थान कलियुग के अन्त में मीन राशिस्थ शुक्र का काल आने पर कल्कि अवतार करेंगे ।

कलियुग प्रथम मास : वर्तमान अंश का फलादेश

कलियुग के प्रथम मासफल का काल ३६००० वर्षों का होता है जो कलियुग की सन्धि का भी काल है । इसके चक्र में ५१२० वर्ष बीतने का अर्थ है ५१⋅२ अंश जब चन्द्र गुरु और केतु की शत्रुदृष्टि भी है । अतः सूर्य−मङ्गल के अशुभ फल में इन ग्रहों के फल भी जुड़ गये । चन्द्रमा एकादशेश होने के कारण अत्यधिक अशुभ हैं,गुरु ४ और ७ के स्वामी होने के कारण अत्यधिक केन्देशदोष से ग्रस्त हैं,और केतु भी तृतीयेश होने के कारण अशुभ और पापमय हैं अगले सहस्र वर्षों तक तीनों का भयङ्कर फल मिलता रहेगा ।

कलियुग की द्वितीय विदशाचक्र का फलादेश

कुण्डली सॉफ्टवेयर (पुराना) चलाकर उसमें Medini फोल्डर के अन्तर्गत MeruWorldChart चुनें और बाँयी ओर वर्ष में -102 अर्थात् ईसापूर्व १०२ टाइप करें,और तब बिना अन्य कोई छेड़छाड़ किये START बटन दबा दें,कलियुग की दूसरी विदशाचक्र बन जायगी जिसका कार्यकाल ईसापूर्व १०२ से लेकर ईस्वी २८९९ की मेषसंक्रान्ति तक है ।
(बाँयी ओर वर्ष में -102 की बजाय यदि 2899 भरें तो कलियुग की तीसरी विदशाचक्र बनेगी ।)

पूरे कलियुग में कुल १२ युगमास तथा प्रत्येक युगमास में कुल बारह युग−विदशा होते हैं,प्रत्येक युग−विदशा का कार्यकाल ३००० वर्षों का होता है जिससे उतने काल का फलादेश प्राप्त होता है ।

जिन लोगों ने कुण्डली सॉफ्टवेयर (पुराना) चलाकर कलियुग की दूसरी विदशाचक्र बना लिया है,उनको “भावचलितकुण्डली” वाले फॉर्म पर “चक्र” बटन क्लिक करके चक्र बनाना चाहिये जिसकी बारहों राशियों में माउस को टहलाकर अंश के अनुसार कालनिर्धारण कर सकते हैं । मानचित्र पर भी माउस टहलाकर यह कार्य कर सकते हैं । कलियुग विदशाचक्र में चक्र का पूरा ३६० अंश ३००० वर्षों के तुल्य है,एक राशि २५० वर्षों के तुल्य है,और एक अंश ८ वर्ष ४ मास के तुल्य है । इस विधि द्वारा कुण्डली में कब किस भाव या ग्रह का काल है उसका पता लगा सकते हैं । यह चक्रविधि सभी कुण्डलियों पर लागू होती है किन्तु लोग इसका प्रयोग नहीं करते ।

कलियुग द्वितीय विदशा : कुल फलादेश

ईसापूर्व १०२ से लेकर ईस्वी २८९९ तक

द्वितीय विदशा की कुण्डली में सूर्य सबसे प्रबल हैं जो चतुर्थभाव में उच्चस्थ हैं तथा वहीं ५ एवं १२ के स्वामी मूलत्रिकोणस्थ मङ्गल अस्त हैं जिनका प्रभाव सूर्य के अधीन है । भाग्येश सूर्य का फल शुभ है किन्तु बुध पर शत्रुदृष्टि है । मङ्गल की भी बुध पर अतिशत्रुदृष्टि है एवं लग्नस्थ प्रबल मूलत्रिकोणस्थ केतु की भी ।

बृहस्पति शुभ राजयोगकारक हैं किन्तु तीसरे में शुक्र के साथ हैं जो ६ और ११ के स्वामी होने के कारण सर्वाधिक अशुभ हैं । परन्तु बुहस्पति का बल शुक्र से अधिक है । पूरी कुण्डली में सबसें अशुभ हैं शुक्र और बुध । बुध ७ और १० के स्वामी होकर केन्द्रेशदोष से गंस्त हैं तथा शत्रु मङ्गल की राशि में हैं । शुक्र का एकमात्र शत्रु है चन्द्रमा । चन्द्रमा की राशि में अरब ईराक आदि हैं जो काम के सप्तम भाव में हैं तथा चन्द्रमा मृत्यु के भी स्वामी हैं । चन्द्रमा से सर्वाधिक विद्ध अक्षर है “मु” । चन्द्रराशि में ही मक्का है और वहीं मुहःमद अवतरित हुए थे — काम के भाव में मृत्यु के स्वामी होकर भारत पर सर्वाधिक शत्रुदृष्टि के साथ । भारत पर राहु−केतु के भी वेध हैं जो क्रमशः ३ और १२ के स्वामी होकर अशुभ हैं । भारत का अधिकांश शत्रुभावस्थ है,विशेषतया उत्तरी भारत से अफ़गान तक । अतः सम्पूर्ण विदशा में सर्वाधिक जनहानि और अन्यान्य क्षति भारत को ही होगी । जनसंख्या−विशेषज्ञों के अनुसार ईसापूर्व १०२ के आसपास अविभाजित भारत की जनसंख्या चीन से दोगुनी और यूरोप से सवा तीन गुणी अधिक थी किन्तु ईस्वी १९०० में घटकर चीन की केवल ६४% और प्रवासियों सहित यूरोप की केवल ५१% रह गयी थी । केवल बृहस्पति के कारण भारत बचा रह सका । षष्ठ भाव का सबसे अशुभ प्रदेश है मिथुन राशि वाला जिसपर प्रबल सूर्य,प्रबल मङ्गल तथा प्रबल केतु की शत्रुदृष्टियाँ हैं — यह क्षेत्र है पाकिस्तान और अफ़गान से मंगोलिया तक । चन्द्रमा धर्मभाव में अष्टमेश हैं,अतः चन्द्रमा की राशि वाले लोग,विशेषतया “मु” नाम वाले व्यक्ति,धर्म को नष्ट करेंगे । शनि प्रबल मारकेश और तृतीयेश हैं और शनि की सबसे बुरी दृष्टि चन्दमा पर ही है । दक्षिण भारत पञ्चम भाव में है किन्तु पापग्रह बुध वहाँ बैठा है,अतः वहाँ विद्या कला आदि का विकास तो होगा किन्तु सनातन विरोधी ।

नवांश कुण्डली में भी शुक्र ६ और ११ के स्वामी होने के कारण सर्वाधिक अशुभ हैं तथा दक्षिण सहित सम्पूर्ण भारत षष्ठ भावस्थ है । भारत पर शत्रुदृष्टि केवल मङ्गल की है जो अष्टम में नीच के होकर विपरीत राजयोग बना रहे हैं और मक्का के क्षेत्र में बैठे हैं — भारत में धर्म का नाश होगा जो मुख्यतः चन्द्रमा और मङ्गल के कारण से होगा;चन्द्रमा भी अष्टमेश होकर एकादश में हैं जिनकी राशि में इस्लाम का उदय है । नवांश में सर्वाधिक पापमय चन्द्रमा हैं । बुध भी प्रबल पाप से आक्रान्त हैं — ७ और १० के स्वामी होकर केन्द्रेशदोष से पीड़ित होकर उच्चस्थ तथा द्वादशेश केतुयुत् । बुध की दो राशियों में से कन्या के न्यूयॉर्क वाले क्षेत्र पर बुध का सर्वाधिक प्रभाव है और मिथुन पर कन्या जैसा बल तो नहीं है किन्तु मिथुन में सबसें अधिक प्रभाव पाकिस्तान पर है । अतः जहाँ तक भारत का प्रश्न है,सम्पूर्ण विदशा के दौरान धर्म का सर्वाधिक पतन पाकिस्तान वाले क्षेत्र में होगा जिसके प पर पर बुध और केतु दोनों का वेध है । पाकिस्तान में भी पंजाब ।

इसी प्रकार सभी वर्गों के विस्तृत फल बनाने चाहिये ।

उदाहरणार्थ बलाबल को २७वें वर्ग से देखते हैं जिसमें भारत आदि वाले क्षेत्र के स्वामी शुक्र नीच के होकर निर्बल हैं और सूर्य की शत्रुदृष्टि भी शुक्र पर पूर्ण है । सूर्य उच्चस्थ होकर १२ में हैं — प्रबल कन्तु अत्यधिक अशुभ । अतः सूर्य के क्षेत्र यूरोप के समक्ष भारत अशक्त है । सर्वतोभद्र में सर्वाधिक वेध यूरोप पर है,अतः इस विदशा में यूरोप का बल सर्वाधिक रहेगा — शनि बुध गुरु चन्द्र सूर्य के वेध हैं और ये पाँचों ग्रह अशुभ हैं । अतः यूरोप का बल विश्व के लिये घातक है,सबसे अधिक भारत के लिये ।

राजनैतिक सत्ता को दशमवर्ग द्वारा देखते हैं । इस विदशा के दशमवर्ग में सबसे प्रबल हैं सूर्य जो उच्चस्थ होने के साथ ही विपरीत राजयोग का लाभ ले रहे हैं द्वादशेश होकर अष्टम में । अतः दोहरे उच्च का बल है । अतः सूर्यराशि वाले यूरोप का वर्चस्व रहेगा । यूरोप पर सूर्य का वेध भी है । बुध को भी पञमहापुरुष योग है किन्तु सूर्य का बल ढाई गुणा अधिक है और सूर्य बुध के वैरी भी हैं । अमरीका का आधा सूर्यक्षेत्र में है और आधा बुधक्षेत्र में । भारत धर्मभावस्थ हैं,स्वामी शुक्र अतिमित्रगृही हैं किन्तु वैरी और अशुभ केतु युक्त हैं । अतः भारत की राजनैतिक शक्ति बची रहेगी ।

विदशाफल को विस्तार से समझने के लिये तीन चक्रों का सम्मिलित प्रयोग करना चाहिये — विदशाचक्र,संहारकालचक्र,तथा विदशा के अन्तर्गत आने वाले दिव्य वर्षों के चक्र । दिव्यवर्ष का फल कैसे बनायें यह “दीर्घकालिक फलादेश का साधन - दिव्यवर्ष” शीर्षक में ऊपर है । विदशाचक्र अगले अनुच्छेद में है ।

कलियुग द्वितीय विदशा : अभी तक बीते काल का चक्र−फलादेश

ईसापूर्व १०२ से लेकर ईस्वी २०२० तक

आरम्भिक खण्ड

प्रस्तुत सम्पूर्ण आलेख का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंश है जिसके द्वारा ३६० अंश के चक्र द्वारा फलादेश की पद्धति को स्पष्ट किया जा सकता है और इस प्रक्रिया में यह भी स्पष्ट होगा कि मैकॉलेवादी इतिहासकारों ने किस प्रकार भारत के वास्तविक इतिहास को सुनियोजित तरीके से विकृत किया है ।

विदशाचक्र का आरम्भ सूर्य के काल से है जो मेषारम्भ में हैं जिस कारण सूर्य के मुख्यफल का काल है १०२ ईसापूर्व । तत्पश्चात मङ्गल का काल है मेष में १०⁰३८′३६″ अर्थात् विदशारम्भ के ८८⋅७ वर्ष उपरान्त ईसापूर्व १३ में । सूर्य उच्चस्थ हैं और मङ्गल मूलत्रिकोणस्थ — मङ्गल अस्त हैं जिस कारण सूर्य के अधीन हैं । अतः सूर्य और मङ्गल के सम्मिलित प्रभाव के कारण सम्पूर्ण विदशा में मङ्गल का काल सर्वाधिक प्रबल है । तभी ईसा मसीह का जन्म हुआ था । धर्मेश सूर्य चतुर्थ में शुभ फल दायक हैं । मङ्गल पञ्चम और द्वादश के स्वामी होकर शुभ है किन्तु सांसारिक हानि भी कराते हैं । प्रथम विदशा के अत्यधिक अशुभ और पापमय काल के पश्चात ईसा मसीह शुभ धर्म का सन्देश लेकर आये । रोमनों और यहूदियों के हिंसक आसुरी सम्प्रदायों के विरुद्ध बालब्रह्मचारी ईसा मसीह ने वैदिक “पवित्र ट्रिनिटी” का प्रचार किया — गॉड द्यु−पितृ सबके पिता,गॉड पुत्र अर्थात् आत्मा,और गॉड पुरोहित (जैसे सिन्धु में स का ह अपभ्रंश हुआ वैसे ही “पुरोहित” में हुआ और “priest” बना) । वैदिक धर्म में बच्चे पर शारीरिक पिता का नहीं बल्कि ऊपर वाले पालक पिता और नीचे गुरु का वर्चस्व रहता है । वैदिक धर्म में द्विरागमन की प्रथा नहीं होती,बच्चे का जन्म उसके मातृक में होता है जिसका अवशेष आज है प्रथम पुत्र का जन्म मातृक में होने की परम्परा । पाँच वर्ष का होते ही बच्चे को गुरुकुल भेज देते थे और लौटने पर शारीरिक पिता का वानप्रस्थ । अतः शारीरिक कामवासना से बच्चे का जन्म होता है यह कुशिक्षा नहीं मिल पाती थी । गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि असुरों को भ्रम रहता है कि शारीरिक कामवासना से बच्चे का जन्म होता है । अतः बच्चे के लिये महत्व है पवित्र माता का और पवित्र ट्रिनिटी का,जिसके बिना सारे यज्ञ कर्मकाण्ड अनुष्ठान व्रत−पर्व केवल ढकोसला बनकर रह जाते हैं । ब्रह्मचर्य बिना ब्रह्म केवल भ्रम ।

किन्तु ३६० अंश के चक्र में १४९ ईस्वी के पश्चात वृष राशि का काल आरम्भ है जिसके स्वामी शुक्र सर्वाधिक पापमय हैं । वृष पर सूर्य और मङ्गल की शत्रुदृष्टि भी है । अतः मेषस्थ उपरोक्त शुभफल का अन्त हुआ । ईस्वी २५१ से षष्ठभाव का काल भी आरम्भ हुआ — ईस्वी ५०७⋅५२ तक । ईसाई मत की विकृति आरम्भ हुई,असुरों ने छद्म वेश में apostle बननो की नीति अपनायी और नकली बाइबिल बनी जिसमें ईसा मसीह के हत्यारों ने यहूदियों के धर्मग्रन्थ को कुछ फेरबदल करके ओल्ड टेस्टामेण्ट के नाम से घुसाया । न्यू टेस्टामेण्ट में भी ईसा के दर्शन का लेशमात्र भी नहीं रहने दिया गया,केवल पानी को शराब बनाने और ईसा को ईशपुत्र मानने पर वेश्यागामियों को बिना वेश्यावृति त्यागे स्वर्ग जाने जैसी बकवासें डाली गयीं । भूतप्रेत के पूजकों ने वैदिक द्यु−पितृ को भी “पवित्र प्रेत” बना डाला जो आजतक अपवित्र प्रेत शैतान को हरा नहीं पाया,केवल लड़कर अपने हवाई नगर से निकालता रहता है । मनुष्य को अपने कर्मों का फल नहीं मिलता,उसके पापों का उत्तरदायित्व काल्पनिक शैतान के बहकावे पर डाल दिया गया जिससे मुक्ति कामार्ग था पादरी की गुलामी । ईस्वी २५१ से षष्ठभाव का काल आरम्भ हुआ तो ईस्वी ३०० में रोमन सम्राट ने रोमन चर्च और पोप की स्थापना की ताकि ईसा के हत्यारे ही उस मत के ठेकेदार बन जायें । तबतक ढूँढ−ढूँढ कर असली ईसाइयों की हत्या हो चुकी थी । इन तथ्यों के अनेक साक्ष्य वैटिकन के अभिलेखागार में आज भी बचे हैं जो केवल उच्च पदस्थ पोप और निकटतम पदाधिकारी ही देख सकते हैं किन्तु कई पादरियों को भनक लग जाती है । षष्ठभाव के काल में ही सर्वाधिक अनाचार व्यभिचार अत्याचार फैला जिस कारण अन्तताेगत्वा राेमन साम्राज्य का पतन हुआ और चर्च ने दीर्घ अन्धयुग में यूरोप और मध्यपूर्व को धकेल दिया ।

वृषराशि का काल किसी भी पृथ्वीचक्र में भारत चीन आदि का काल होता है । चीन पर तो सूर्य और मङ्गल के शुभ वेध भी थे,भारत पर केवल राहु और केतु के अशुभ वेध ही थे । अतः संसार में सर्वाधिक पाप भारत में व्याप्त हुआ । पापमय तृतीयेश और प्रबल राहु का काल ईस्वी ५५८ में आरम्भ हुआ तो आसुरी वाममार्ग खुलकर सार्वजनिक होने लगा । वृषराशि में षष्ठभाव का आरम्भ ईस्वी २५१ में हुआ और षष्ठभाव में वृषराशि का अन्त ईस्वी ३९९ में,जो आसुरी नाम वाले घटोत्कच से लेकर उनके वंशज चन्द्रगुप्त द्वितीय तक का काल है ।

रमेशचन्द्र मजूमदार ने भी लिखा कि गुप्तवंश का आरम्भ घटोत्कच की सन्तान ने किया जो काशी के पास कुषाण के सामन्त थे । सनातनियों में घटोत्कच जैसे नाम नहीं रखे जाते । महाभारत में श्रीकुष्ण ने कहा कि घटोत्कच को कर्ण से उन्होंने ही मरवाया वरना श्रीकृष्ण को ही यह कार्य करना पड़ता,क्योंकि पाण्डवों से सम्बद्ध होने के बावजूद घटोत्कच राक्षस था । गुप्तवंश का पहला सम्राट चन्द्रगुप्त प्रथम घटोत्कच सामन्त का पौत्र था जिसने राक्षसी आस्पद को “गुप्त” रखने की परिपाटी आरम्भ की ।

अशोक मौर्य के त्रि−कलिङ्ग महासंग्राम से जो वैदिक जनपद बच गये थे उनको गुप्तों ने साम्राज्यवादी लिप्सा में नष्ट कर दिया जिस कारण भारत में अन्धयुग का आरम्भ हुआ । अंग्रेजों ने सच्चाई को छुपाकर अपने साम्राज्यवाद को सही ठहराने के लिये अलेक्सान्द्र,अशोक और गुप्तों जैसे साम्राज्यवादियों को बढ़ा−चढ़ाकर प्रस्तुत किया । यहाँ एक महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत है जिसपर अंग्रेजों ने पर्दा डाला — त्रि-कलिङ्ग महाजनपद

“INDIKA” का सबसे प्रामाणिक संस्करण इस लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं — मेगास्थनीज की इण्डिका
अथवा
मेगास्थनीज की इण्डिका

इतिहासकारों ने इस ग्रन्थ के अनावश्यक अंशों पर बहुत माथा खपाया किन्तु आवश्यक अंशों की जानबूझकर उपेक्षा की । सबसे अधिक उपेक्षा तो इस तथ्य की हुई कि ग्रीक राजदूत की दृष्टि में हिमालय से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र को ग्रीस के लोग “इण्डिया” कहते थे,न कि केवल पश्चिमी भारत के सिन्धु प्रदेश को;यद्यपि हिमालय से कन्याकुमारी तक का क्षेत्र मौर्य या किसी के अधीन एक साम्राज्य नहीं था । इसका सीधा अर्थ यह है कि हिमालय से कन्याकुमारी तक का क्षेत्र एक राजनैतिक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक ईकाई था जिसे ग्रीस के लोग इण्डिया कहते थे और यहाँ के लोग “भारत” । भारत एक राजनैतिक अथवा नस्लीय अथवा भाषाई नहीं बल्कि एक “सांस्कृतिक राष्ट्र” था इसका चश्मदीद गवाह था यह ग्रीक राजदूत । इस सत्य को आज से सौ वर्ष पहले प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार ने खुलकर लिखा — “इंग्लैण्ड जैसे राष्ट्र तलवार के बलपर स्थापित हुए जबकि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है” ।

मेगास्थनीज की इण्डिका ध्यान से पढ़ेंगे तो यह बात स्पष्ट हो जायगी कि वे सम्पूर्ण भारत को एक विशिष्ट ईकाई मानते थे जो किसी एक राजनैतिक शक्ति के अधीन नहीं था । पुराणों को सत्य मानकर मेगास्थनीज ने यह भी लिखा कि भारत में १५३ राजा हो चुके हैं,अर्थात् मेगास्थनीज से सहस्रों वर्ष पहले से यह राष्ट्र था । मैकॉलेपुत्रों का कथन है कि पुराणों की रचना गौतम बुद्ध के बाद हुई जबकि मेगास्थनीज को मानें तो पुराणों और महाकाव्यों में वर्णित इतिहास मेगास्थनीज के काल में पहले से ही भारत की स्थापित मान्यता थी । मेगास्थनीज ने अनेक कपोरकल्पित जनश्रुतियों का भी समावेश कर लिया और विदेशी होने के कारण भारत की अनेक विशेषताओं को वे नहीं समझ सकें,किन्तु यहाँ केवल एक बिन्दु का स्पष्टीकरण करना है जिसमें मेगास्थनीज द्वारा भ्रान्ति की कोई सम्भावना नहीं है — त्रि-कलिङ्ग

मेगास्थनीज की “इण्डिका” और मैकॉलेवादी इतिहास

मेगास्थनीज (महास्थानी) का मूल ग्रन्थ बहुत पहले ही नष्ट हो चुका है किन्तु लगभग दो सहस्र वर्ष पहले के अनेक यूरोपियन लेखकों ने मूल “इण्डिका” से उद्धरण दिये हैं जिनमें लगभग पूरा साम्य हैं,अतः वे विश्वसनीय हैं । किन्तु मेगास्थनीज एक विदेशी था जिसे भारतीय समाज की सतही जानकारी थी । दन्तकथाओं और वास्तविकता में वह अन्तर नहीं कर सका,जैसा सुना वैसा लिख दिया । दूसरी समस्या है संस्कृत तथा ग्रीक जैसी आर्य भाषाओं के लिये सेमेटिक लिपि का प्रयोग,जिस कारण मूल संस्कृत शब्द का अनुमान लगाना कई बार कठिन हो जाता है । इससे भी बड़ी समस्या है आधुनिक यूरोपियन ‘विद्वानों’ द्वारा भारतीय घटनाओं और शब्दों को केवल बौद्ध सन्दर्भ में देखने की जिद ताकि वैदिक−पौराणिक प्रमाणों को या तो अनदेखा किया जा सके या काल्पनिक घोषित किया जा सके । इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ही “इण्डिका” पढ़नी चाहिये । इन समस्याओं के बावजूद “इण्डिका” ध्यान से पढ़ेंगे तो अनेक ऐसे तथ्य अकाट्य रूप से प्रकट होंगे जिसपर आधुनिक इतिहासकारों ने जानबूझकर पर्दा डाल रखा है । उनमें से कुछ निम्न हैं ।

मेगास्थनीज की “इण्डिका” का फ्रैगमेण्ट−५६ ( LVI ) पूरा पढें “List of the Indian Races” । पृष्ठ ६४ प्लिनी का फ्रैगमेण्ट भी पढ़ें ।

(१):
आधुनिक पाश्चात्य तथा कुछ भारतीय लेखकों का पूर्वाग्रह है कि “भारत” कभी एक राष्ट्र था ही नहीं,आधुनिक युग में अंग्रेजों ने इसे राजनैतिक एकता दी तो एक राष्ट्र की भावना भी उत्पन्न हो गयी । भारतीय स्रोतों को वे अप्रामाणिक कहते हैं तो प्राचीन ग्रीक लेखक मेगास्थनीज को ही देखें जिसे ग्रीक सम्राट ने विद्वान समझकर भारत में राजदूत के तौर पर भेजा था ताकि भारत के बारे में प्रामाणिक जानकारी यवनों को दे सके । “इण्डिका” पढ़ेंगे तो स्वतः स्पष्ट होगा कि हिमालय से कन्याकुमारी के पाण्ड्य राज्य तक के क्षेत्र को मेगास्थनीज ने “इण्डिया” माना और उसका यथासम्भव वर्णन किया । तो “इण्डिया” की डिस्कवरी वास्को द गामा अथवा मैकॉले ने की,या “इण्डिया” मेगास्थनीज से पहले से ही एक ईकाई के रूप में मान्यताप्राप्त था?मेगास्थनीज से पहले से ही जिस “इण्डिया” को ग्रीस तक के लोग जानते थे वह “इण्डिया” निश्चित तौर पर एक राजनैतिक ईकाई नहीं था,मौर्यों के अधीन नहीं रहने वाले भी ऐसे अनेक राज्य थे जिन्हें मेगास्थनीज ने “इण्डिया” के अन्तर्गत माना । तब प्रश्न उठता है कि वह प्राचीन भारत यदि एक राजनैतिक ईकाई नहीं था तो अवश्य ही एक भाषाई या एक नस्लीय या एक साम्प्रदायिक राष्ट्र भी नहीं था जैसा कि पश्चिम के सारे राष्ट्र हैं,क्योंकि भारत में अनेक भाषायें,अनेक नस्लें और अनेक सम्प्रदाय थे । अतः जिसे मेगास्थनीज ने “इण्डिया” कहा और “ता इन्दिका” ग्रन्थ में जिसका वर्णन किया वह एक सांस्कृतिक राष्ट्र था जहाँ अनेक सम्प्रदायों,अनेक भाषाओं और अनेक नस्लों के बावजूद एक ही भारतीय राष्ट्र की भावना लोगों में थी । चाणक्य ने लोगों में व्याप्त इसी भावना का राजनैतिक उपयोग किया,जबकि घनानन्द जैसे मूर्ख ने राज्य को प्रजा और राष्ट्र के कल्याण का साधन न मानकर व्यक्तिगत सम्पत्ति समझने की भूल की ।

(२):
आधुनिक काल के मैकॉलेवादी इतिहासकारों का प्रचार है कि मेगास्थनीज के काल में तमिलनाडु और केरल तथा पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों के सिवा सम्पूर्ण भारत एवं नेपाल की तराई और पूर्वी ईरान तक का विशाल क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के अन्तर्गत था । इस झूठी बकवास के पीछे एकमात्र “प्रमाण” यह है कि इस विशाल प्रदेश में अशोक के शिलालेख मिले हैं । मेगास्थनीज ने साफ लिखा कि सिन्धु से लेकर मूल मगध तक ही चन्द्रगुप्त के अधीन था,बंगाल ही नहीं बल्कि बिहार के भी अनेक राज्य स्वतन्त्र थे और दक्षिण के सारे राज्य भी स्वतन्त्र थे । मेगास्थनीज ने सबका विस्तार से वर्णन किया और अनेक राज्यों की सेनाओं की संख्या भी बताई,जिनमें से केवल मौर्य सेना की संख्या को आज के इतिहासकार उद्धृत करते हैं । चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा यवनों के विरुद्ध युद्ध के पश्चात केवल अशोक मौर्य ने कलिङ्ग के विरुद्ध युद्ध किया,कभी किसी मौर्य ने अन्य कोई युद्ध लड़ा ही नहीं तो आन्ध्र आदि राज्यों पर मौर्यों का आधिपत्य कैसे हो गया?मेगास्थनीज तो मगध की सेना की संख्या भी बतलाते हैं और आन्ध्र राज्य की भी,जबकि आधुनिक इतिहासकारों को तो उस काल में आन्ध्र राज्य का अस्तित्व ही नहीं दिखता!“मौर्य साम्राज्य” अथवा “मगध साम्राज्य” जैसी शब्दावली का प्रयोग न तो मेगास्थनीज ने किया और न ही किसी अन्य प्राचीन भारतीय या विदेशी लेखक ने,ऐसी साम्राज्यवादी शब्दावली आधुनिक काल में अंग्रेजों का आविष्कार है । मेगास्थनीज ने मौर्य राज्य को “प्राची” कहा,हालाँकि प्राची का अर्थ होता है पूर्व जबकि वह राज्य सिन्धु नद तक फैला था । परन्तु चन्द्रगुप्त मौर्य ने प्राची राज्य का विस्तार सिन्धु तक किया,नन्दयुग में वह यमुना तक ही था । बुद्ध के काल में मगध अपनी प्राचीन सीमाओं में ही सिमटा था — पश्चिम में सोनभद्र तक । अजातशत्रु ने मगध का साम्राज्यवादी विस्तार आरम्भ किया जो बुद्ध को भी पसन्द नहीं था । अंग्रेजों को पढ़ाना था कि आर्य यूरोप से पहले पश्चिमोत्तर भारत में आये,अतः आन्ध्र जैसे क्षेत्रों में सभ्यता का उल्लेख उनको रास नहीं आता था । महाभारत में दक्षिण भारतीय राज्यों का उल्लेख है तो महाभारत को काल्पनिक कह दिया गया । किन्तु मेगास्थनीज ने आन्ध्र से लेकर धुर दक्षिण तक के सारे राज्यों का वर्णन किया तो उसे क्यों अनदेखा करते हैं?क्योंकि वे केवल मौर्यों को ही बौद्ध “सिद्ध” कर पाते हैं,अन्य किसी राज्य को बौद्ध सिद्ध करने का कोई प्रमाण उनको नहीं मिल पाता ।

(३):
मौर्यों को ही बौद्ध “सिद्ध” करने का प्रमाण भी काल्पनिक है । प्राचीन भारत के राजाओं द्वारा सभी अच्छे धार्मिक सम्प्रदायों को दान आदि दिया जाता था,तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि वे राजा उन सम्प्रदायों के सदस्य हो जाते थे । अशोक ने कभी बौ़द्ध सम्प्रदाय में दीक्षा ली ऐसा कोई प्रमाण नहीं है,बहुत बाद के एक बौद्ध ग्रन्थ में यह बकवास है । प्राचीन काल में कभी किसी गृहस्थ ने बौद्ध या जैन होने की दीक्षा नहीं ली क्योंकि इन सम्प्रदायों में दीक्षा का अर्थ था भिक्षुक (संन्यासी) बनना । अम्बेडकर जैसे गृहस्थ केवल नेहरू−राज में ही बौद्ध बन सकते थे,अशोक मौर्य के काल में यह सम्भव ही नहीं था । अशोक मौर्य के किसी भी शिलालेख में उसके बौद्ध बनने का उल्लेख नहीं है और न ही बौद्ध अथवा बुद्ध की ही कोई चर्चा है,केवल लुम्बिनी ग्राम वाले minor pillar edict में ऐसा उल्लेख है जिसमें लुम्बिनी ग्राम का टैक्स १०% से घटाकर ८% करने का उल्लेख है । भारत का कोई भी राजा लुम्बिनी के आसपास जाता तो लुम्बिनी अवश्य जाता और यदि वह राजा बौद्ध होता तो उस छोटे से गाँव का पूरा टैक्स माफ करता । अशोक के सभी शिलालेखों में शिलालेखों में “ब्राह्मणों तथा श्रमणों” को विशेष आदर एवं छूट देने का आदेश है । मैकॉलेवादी इतिहासकारों द्वारा श्रमणों का अर्थ बौद्ध लगाया जाता है (जबकि श्रमण का अर्थ है तपस्वी और ब्राह्मण का अर्थ उस युग में था ब्रह्मप्राप्त ज्ञानी) और उन शिलालेखों में श्रमणों से भी पहले ब्राह्मणों के उल्लेख को सुनियोतिज तरीके से अनदेखा कर दिया जाता है । किसी भी तरह से वैदिक संस्कृति को दबाना है और वेदविरोध को उभारना है । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि गौतम बुद्ध के मूल वचनों को देखेंगे तो पायेंगे कि वे भी सनातनी ही थे,किसी नये धर्म के प्रवर्तक नहीं थे । मेगास्थनीज ने भी ब्राह्मणों का बारम्बार उल्लेख किया और समाज के सभी वर्गों में सबसे ऊपर उनको रखा,बौद्धों का कोई महत्व मेगास्थनीज को नहीं दिखा!

(४):
सनातन−विरोध के मैकॉलेवादी चश्मे से इतिहास को देखने की आदत बन्द करें । मूल प्रमाणों को निष्पक्ष दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे तो सत्य स्वतः प्रकट होने लगेगा । मेगास्थनीज की “इण्डिका” में वर्णित भारत के सभी राज्यों की सूची बनायेंगे तो पायेंगे कि पाटलिपुत्र राजधानी वाले प्राची राज्य के बाद सबसे विस्तृत कलिङ्ग को कहा गया,किन्तु तीन कलिङ्ग मेगास्थनीज ने बताये । “इण्डिका” के अंग्रेज सम्पादक ने पादटिप्पणी में लिखा कि १९वीं शती के सबसे प्रसिद्ध अभिलेखशास्त्री कनिङ्घम ने लिखा कि अनेक प्राचीन अभिलेखों में भी “त्रि−कलिङ्ग” का उल्लेख है । उनमें से एक मगध से पूर्व गंगारिदइ राज्य में था जिसका मुख्य भाग बंगाल में था किन्तु तिरहुत से भी सम्बन्ध था । दूसरा कलिङ्ग था “मध्य−कलिङ्ग” और तीसरा दक्षिण में था जिसकी राजधानी का नाम भी बाद में कलिङ्ग हो गया,कोरिङ्ग । इनमें कहीं भी वंशानुगत राजतन्त्र का साक्ष्य नहीं मिलता । तिरहुत में गणराज्य की स्वतन्त्रता अजातशत्रु ने ही छीन ली थी किन्तु वैशाली गणतान्त्रिक सङ्घ के आन्तरिक मामलों में मगध ने हस्तक्षेप नहीं किया,जिस कारण बाद में गुप्तवंश भी लिच्छवियों से वैवाहिक सम्बन्ध करने पर ही राज्य का विस्तार कर सका ।

प्राचीन भारतीय गणराज्यों में प्रधान की पदवी राजा थी किन्तु वंशानुगत पद नहीं मिलता था । वैशाली के गणसङ्घ में ७७०७ राजा थे,अर्थात् हर पञ्चायत के प्रधान को राजा कहते थे!महावीर स्वामी जिस ज्ञातृक जनपद के राजकुमार थे उसकी राजधानी आधुनिक मुजफ्फरपुर जिले के कटरा में थी और ज्ञातृक जनपद वैशाली गणसङ्घ के आठ गणराज्यों में से एक था । अर्थात् महावीर स्वामी के पिता गणराज्य के चुने हुए प्रधान थे जिनके बाद महावीर स्वामी को प्रधान बनाया जाता ऐसा कोई नियम नहीं था । गौतम बुद्ध भी इसी तरह के राजकुमार थे । अजातशत्रु ने ही इस परिपाटी को तोड़ा और तथाकथित ऐतिहासिक युग में भारत में साम्राज्यवाद का श्रीगणेश किया,हालाँकि तथाकथित प्रागैतिहासिक युग से ही मगध की परम्परा आसुरी राजतन्त्र की थी जिस कारण सांस्कृतिक दृष्टि से मगध को अनार्य माना जाता था । आर्य और अनार्य की नस्लवादी परिभाषायें अंग्रेजों का आविष्कार है । वैदिक परम्परा यही है कि प्रजा की भावना के अनुसार राजा को निर्णय लेने चाहिये,यही श्रीराम की भी मर्यादा थी । राजा द्वारा मनमानापन असुरों में चलता था,आर्यों में नहीं । अजातशत्रु से पहले ऐसा प्रसिद्ध असुर था महिष्मती नगरी का महिषासुर,जिसकी राजधानी को आजकल मुआँ-जो-दड़ो कहा जाता है । महाराष्ट्र तथा मिथिला में भी महिष्मती नाम की नगरियाँ थीं । मिथिला की महिष्मती अब महिषी कहलाती है जहाँ मण्डन मिश्र हुए थे ।

कुषाणों के एक असुर सामन्त थे “घटोत्कच” जिनका राज्य था काशी के पास । मिथिला की लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी से घटोत्कच के पौत्र का विवाह हुआ और इन दो राज्यों के सम्मिलित बल से राज्य का विस्तार हुआ जिसे गुप्त साम्राज्य कहा जाता है । वेद−विरोधी घटोत्कच जैसे आसुरी नाम को गुप्त रखकर नकली वैदिक नाम,जैसे कि चन्द्र और समुद्र,रखकर साम्राज्यवाद का रक्तरञ्जित विस्तार हुआ,दक्षिण भारत से लेकर पंजाब के यौधेय गणराज्यों तक बचे−खुचे जनतन्त्रों को नष्ट किया गया । जिन शकों को परास्त कर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की झूठी उपाधि अपनायी (विक्रम संवत् वाले असली विक्रमादित्य ने कभी साम्राज्यवादी विस्तार नहीं किया,दूसरों को कुचला नहीं,फिर भी पूरे देश ने उनके संवत् को स्वीकारा ) उन्हीं शकों ने भारत में संस्कृत शिलालेखों का श्रीगणेश किया था — गुजरात के शक रुद्रदामन ने । १९०९ ईस्वी में सिद्ध हो गया कि मंगोलिया के पास सिंकियांग के कुष जातियों की भाषा भी आर्य परिवार की ही थी,किन्तु आज भी भारतीयों को पढ़ाया जाता है कि शक और कुषाण अनार्य थे । वेदविरोधी वाममार्गी लोगों में आज भी असली नाम गुप्त रखने की परम्परा है जिसका असली कारण अब भूल चुके हैं — असुरत्व को छुपाना । गुप्त राजाओं ने वैदिक जनपदों की सनातनी राजनैतिक व्यवस्था को अन्तिम रूप से नष्ट करके भारत के पतन का मार्ग खोल दिया,जिसके उपरान्त आजतक भारत का केवल पतन ही होता आया है ।

अजातशत्रु द्वारा वैशाली गणसङ्घ की पराजय ने जिस विनाशलीला का आरम्भ किया उसे अशोक के कलिङ्ग−युद्ध ने देशव्यापी बनाया और गुप्त राजाओं ने पूर्णाहुति दी । उस वैदिक “राष्ट्र” का पतन हुआ जिसकी स्तुति में ऋग्वेद में राजपुरोहित गोतम रहूगण ने कहा — हे इन्द्र,जहाँ तक आपका रञ्जन हो वहाँ तक हमारा स्वराज्य है!कलियुग में भाड़े के टट्टू चारणों ने राजा का अर्थ ही बिगाड़ दिया — जो प्रजा का रञ्जन करे । वैदिक अर्थ था — जो इन्द्र का रञ्जन करे । इन्द्र प्रसन्न रहेंगे तो प्रजा सहित पूरा राज्य प्रसन्न रहेगा । उपनिषद में इन्द्र का अर्थ बताया गया — भीतर जो साक्षी दृष्टा है । गुप्तकाल में ही इतिहास−पुराण में प्रक्षिप्त अंश जोड़े गये,देवताओं के बारे में भद्दी कथायें गढ़ी गयी,आसुरी वाममार्ग का राजसत्ता पर आधिपत्य हुआ जिसने शीघ्र ही हिन्दुओं और बौद्धों के प्रमुख स्थलों और संस्थाओं पर आधिपत्य जमा लिया तथा पूजास्थलों में भी अश्लीलता भर दी । आर्थिक पतन भी हुआ — लगभग ६०० ईस्वी तक विदेश व्यापार तथा भारतीय नगरों का पतन हो गया जिसके कुछ ही काल के पश्चात अरब मुस्लिमों ने समुद्री व्यापार पर आधिपत्य जमा लिया । श्रमिक सङ्घों के पतन से उनका जातियों में रूपान्तरण आरम्भ हुआ । वर्णाश्रम व्यवस्था का जातीय व्यवस्था में रूपान्तरण हुआ,कर्म के स्थान पर जन्म की प्रधानता स्थापित हुई । वर्णाश्रम धर्म का पतन हुआ,सभी वर्णों ने अपने स्वाभाविक कर्मों का परित्याग कर दिया ।

इसी परिप्रेक्ष्य में इतिहास की ज्योतिषीय समीक्षा सम्भव है । मैकॉलेवादी असत्य का पर्दाफाश किये बिना सच्चा इतिहास प्रकट नहीं हो सकता ।

अब तो हिन्दुओं को पता ही नहीं है कि उनकी संस्कृति के कौन से तत्व वैदिक हैं और कौन से आसुरी!हालाँकि सारे आस्तिक हिन्दु अपने को वैदिक ही कहेंगे,अपने को असुर केवल नास्तिक−हिन्दू ही कह सकते हैं ।

कलियुग द्वितीय विदशा : शेष काल का चक्र−फलादेश

ईस्वी २०२० से लेकर ईस्वी २८९९ तक

कलियुग की अन्तिम विदशा का फल

सूर्यसिद्धान्तीय वर्ष से ईसाई वर्ष का अन्तर होने के कारण दीर्घकाल के दौरान दोनों में अन्तर बहुत बढ़ जाता है जिस कारण अधिकांश लोग गणना में त्रुटि कर सकते हैं । अतः ३१०२ ईसापूर्व में आरम्भ होने वाले ४३२००० वर्षीय कलियुग की अन्तिम विदशा युगान्त से ३००० वर्ष पहले मेष संक्रान्ति के समय आरम्भ होगी जिसका ईसाई वर्षमान है ईस्वी ४२५९१० ;कुण्डली सॉफ्टवेयर मेदिनी मोड में मेष संक्रान्ति स्वतः ढूँढ लेगा,केवल वर्ष मान ईस्वी ४२५९१० भरने की आवश्यकता पड़ेगी । तब जो कुण्डली बनेगी उसका फल निम्नोक्त है ।

लग्न में उच्च के सूर्य,नीच के बुध,उच्च के शुक्र तथा सम राहु हैं । सूर्य षष्ठेश भी हैं और ११ तथा १२वें भावों के स्वामी शनि भी सूर्य में अस्त हैं जिस कारण सूर्य ६,११ एवं १२ के स्वामी बनकर अत्यधिक अशुभ और पापमय हैं । बुध भी ४ और ७ के स्वामी बनकर केन्द्रेशदोष के कारण अत्यधिक पापमय हैं — जिनके क्षेत्र में अफगान से ईराक और मक्का के पास तक के क्षेत्र हैं । राहु भी १२वें के स्वामी होकर हानिकारक हैं । शुक्र भी ३ और ८ के स्वामी होने के कारण अत्यधिक अशुभ हैं । अतः पूरे संसार का लग्न अत्यधिक अशुभ और पापमय है । बुध के कारण सौहार्द्र तथा कामवासना में नीचता,शुक्र के कारण मारकाट एवं मृत्यु,राहु के कारण हानि,तथा सूर्य के कारण रोग,वैर एवं पाप की पराकाष्ठा । नीच शनि सूर्य के सबसे पास है,अतः सूर्य का उच्चत्व भङ्ग कर रहा है । शुक्र के पास उसी राशि में बुध है जो शुक्र के उच्चत्व को भङ्ग कर रहा है । अतः शुक्र की वृष राशि पर शुक्र की अल्पदृष्टि के कारण शुक्र का प्रभाव अल्प है और वृष में स्थित मङ्गल का प्रभाव वृष पर पूर्ण बली है । मङ्गल तीसरे में बैठने के कारण तथा धर्मेश होने के कारण शुभ है और भ्रातृकारक होने के कारण पराक्रम का कारक भी है । परन्तु शुक्र की दूसरी राशि तुला पर शुक्र की अधिक दृष्टि के कारण उसके क्षेत्र का फल अशुभ है । चन्द्रमा पञ्चमेश होने के कारण शुभ हैं औशर उसी मेष राशि में लग्नेश दशमेश बुहस्पति भी अत्यधिक शुभ हैं,किन्तु उसी मेष में अत्यधिक अशुभ सूर्य तथा शनि उनके शुभत्व का क्षरण कर रहे हैं । परिणामस्वरूप कुल मिलाकर वृष राशि ही संसार में सर्वाधिक शुभ है जिसका कारक है पराक्रम−कारक मङ्गल और पराक्रम के तीसरे भाव में वृष राशि । अतः सूर्यादि के कारण जो विश्वयुद्ध होगा उसमें मङ्गल के कारण वृषस्थ भारत−चीन−जापान वाले क्षेत्र की विजय होगी ।

सप्तसिन्धु के सम्भल में कल्कि अवतार का अवतरण होगा । मैक्समूलर के चेले सप्तसिन्धु को पंजाब कहते हैं किन्तु ऋग्वेद में तीन सप्तसिन्धुओं का वर्णन है जिनमें महाभारत के अनुसार मुख्य सप्तसिन्धु हैं आर्यावर्त वाले — कौशिकी,गण्डकी,सरयू,गोमती,गंगा,यमुना,पूर्वगामिनी विलुप्त सरस्वती;उक्त प्रदेश में पश्चिम उत्तरप्रदेश का सम्भल मध्ययुग तथा आधुनिक युग में भी प्रसिद्ध रहा है जहाँ कल्कि अवतार आयेंगे और कलियुग की अन्तिम विदशा में सम्पूर्ण विश्व के आसुरी समुदायों का नाश करके धर्म की संस्थापना करेंगे । अशुभ शुक्र के कारण भारत के वेदविरोधी नकली हिन्दुओं का भी नाश होगा ।

असुरों के लिये क्रूर और युद्धकारक मङ्गलग्रह हर महायुग के अन्त में इसी प्रकार कल्कि अवतार के माध्यम से विश्व का मङ्गल करते हैं जिस कारण नाम “मङ्गल” पड़ा । पाराशरी होराशास्त्र के अनुसार विष्णु के दशावतारों में से पहले नौ अवतार नवग्रहों से अवतरित होते हैं जिनमें मङ्गल से सतयुग के नृसिंह हैं । कल्कि किसी ग्रह से नहीं आते क्योंकि विष्णु के अवतार होने के बावजूद वे संसार का पालन करने नहीं आते,अगले महायुग के सतयुग की तैयारी हेतु गन्दगी का संहार करने आते हैं,अतः उनमें मङ्गल से अवतरित नृसिंह का अंश रहता है । नृसिंह पूर्णावतार हैं,कल्कि अंशावतार ।

फिलहाल कुण्डली सॉफ्टवेयर के वितरित वर्सन में इतने दीर्घकाल की गणना प्रतिबन्धित है किन्तु अब जो वर्सन वितरित होगा उसमें सम्पूर्ण कल्प की गणना सम्भव होगी । सम्पूर्ण कल्प की गणना कुण्डली सॉफ्टवेयर के वितरित वर्सन में दो दशक पहले से थी किन्तु गलत ईसाई वर्ष भरकर लोग मेरा दिमाग चाटते थे जिस कारण प्रतिबन्धित करना पड़ा था । ईसाई वर्ष मूर्खतापूर्ण और अप्राकृतिक है जिस कारण गणना में बहुत माथापच्ची करनी पड़ती है ।

निष्कर्ष

इन कुण्डलियों की जाँच करने पर तीन बातें स्पष्ट तौर पर सही सिद्ध होती हैं —

१⋅
सूर्यसिद्धान्तीय गणित−ज्योतिष एवं पाराशरी फलित−ज्योतिष ब्रह्मज्ञान का अंश है जिसपर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भूत−वर्तमान−भविष्य निर्भर होने के लिये बाध्य है ।

२⋅
विश्व का सम्पूर्ण ज्ञात इतिहास उपरोक्त फलादेश का अनुसरण करता है,अतः वास्तविक इतिहास का ज्ञान ज्योतिष ही देता है ।

३⋅
पुराणों और महाकाव्यों में वर्णित इतिहास सत्य है और म्लेच्छों द्वारा इतिहास के नाम पर जो कुछ भी लिखा जाता है वह मिथकीय गल्प है ।

महाभारत का युद्ध जिन पाँच ग्रामों की माँग से आरम्भ हुआ था वे थे पानीपत,सोनीपत,बागपत,तिलपत और इन्द्रपत । प्रस्थ का अपभ्रंश हुआ पत । ये सारे ग्राम कुरुक्षेत्र में हैं । अतः महाभारत का युद्ध ही पानीपत का युद्ध है जो हर कल्प में हजारों बार होता है,कुण्डलियों के अनुसार उतार−चढ़ाव होता रहता है । छिटपुट लड़ाइयाँ सनातनी हार सकते हैं,युद्ध में अन्तिम विजय धर्म की ही होती है

पृथ्वीमाता को ही मेदिनी भी कहते हैं । मेदिनी ज्योतिष द्वारा ही ब्रह्मज्ञान को बाह्य संसार में प्रकट तथा सिद्ध किया जा सकता है । इसी कारण ज्योतिष को वेद की आँख कहते हैं ।

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