Raaj Jyotisha

राज-ज्योतिष

परिभाषा

प्रजा के चतुर्विध रंजन के साधन को राष्ट्र कहते हैं |
यूरोप में "नेशन" शब्द का जो अर्थ है वह 'राष्ट्र' का पर्याय नहीं है, नेशन का अर्थ है एक ही कूंए में पैदा होने वाले एक ही नस्ल के मानव-सरीखे दिखने वाले मेंढकों का झुण्ड , जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक अवधारणा है जिसकी परिभाषा और लक्षण वेदों में इसपर विस्तृत सूक्तों, यजुओं आदि पर आधारित है |
चतुर्विध रंजन के साधन का अर्थ है चारों पुरुषार्थों की उपलब्धि का अवसर प्रदान करके केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सर्वांगीण रंजन के समस्त उपकरणों का समुच्चय | ऐसा टिकाऊ सनातन राष्ट्र संसार में एक ही होता है जिसे प्रजा का चतुर्विध भरण करने के कारण भारत कहते हैं |
राष्ट्र के ज्योतिषीय अध्ययन को राजज्योतिष कहते हैं | यह राजा के कल्याण का साधन नहीं है, उसके लिए 'जातक' है | वैदिक संस्कृति में मर्यादा की रक्षा करने वाले पुरुषोत्तम राजा भी उसी को मानते हैं जो प्रजा के चतुर्विध कल्याण हेतु व्यक्तिगत सुख-दुःख की परवाह न करे | कलियुग में अनगिनत क्षणिक और छद्म राष्ट्र उत्पन्न हो जाते हैं जो प्रजा के बहुमत को दुःख ही देते हैं, किन्तु सनातन राष्ट्र भारत कलियुग में अशक्त तो होता है किन्तु कभी नष्ट नहीं होता | राष्ट्र के भौगोलिक विस्तार को देश कहते हैं |
तीनों कालों में जिसका अस्तित्व हो और दश दिशाओं में जिसका विस्तार हो वह देश कहलाता है | दश दिशाएँ हैं — चार दिशाएँ, चार विदिशायें, ऊर्ध्व और अधर | दिशाओं के बीच में विदिशा होती है | भारत देश की सभी दिशाओं के मध्य स्थान को भी ऋषियों ने विदिशा की संज्ञा दी जहां से भारत का देशचक्र बनता है | सनातन संस्कृति के अन्धयुग में इसका नाम विकृत होकर भेलसा हो गया था , अब धर्म का पुनरुत्थान-काल आया है तो पुनः विदिशा नाम का जिला-केन्द्र बन गया है |
जैसा की पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था, राष्ट्र एक जीवन्त प्राणी है जो हर कालखण्ड में अपने संरक्षण-संवर्धन हेतु पुरानी संस्थाओं को नवीन परिस्थितियों के अनुरूप स्वतः अनुकूलित कर लेता है अथवा नयी संस्थाएं खड़ी कर लेता है | राष्ट्र तय करता है कि कब कितने पुरुष और कितनी स्त्रियाँ राष्ट्र में होनी चाहिए (सेक्स-अनुपात), राष्ट्र तय करता है कि कब किस चुनाव में किस राजनैतिक दल के पक्ष या विपक्ष में कैसी अदृश्य लहर प्रचारतन्त्र द्वारा झूठे प्रचार के बावजूद और तथाकथित चुनाव-विशेषज्ञों को झुठलाकर विशाल देश के कोने-कोने में जनता में अवचेतन मनों को टेलिपैथी द्वारा जोड़कर अप्रत्याशित परिणाम ला देंगी, राष्ट्र तय करता है कि उसके लोग धर्म का पालन न करें तो कैसे उनका नाश हो और पालन करें तो कैसे उनका संरक्षण हो |
व्यक्ति के पिछले और वर्तमान जीवन के कर्मों के फल कब पककर प्राप्त हो सकते हैं इसका काल-विधान ज्योतिषशास्त्र का जातक विभाग है, सम्पूर्ण राष्ट्र के सभी लोगों के सामूहिक कर्मफल का कालविधान राजज्योतिष है |

राजज्योतिष के विभाग

प्राचीन राजज्योतिष की सारी विधाएं उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु मूल विधि अक्षुण्ण है , और राजज्योतिष की सभी अवशिष्ट तथा लुप्त विधाएं भी इसी मूल विधि के ही अंग हैं |
व्यक्तिगत कुण्डलियाँ बनानी हों या राष्ट्र की कुण्डली, फलादेश की विधि एक ही है जो पराशर ऋषि के होराशास्त्र पर आधारित है जिसका दो तिहाई लुप्त हो चुका है किन्तु एक तिहाई देवचन्द्र झा जी और गणेशदत्त पाठक जी ने प्रकाशित कराया, परन्तु सीताराम झा ने पाण्डुलिपि में ही मनमाने फेरबदल करके भ्रष्ट संस्करण प्रकाशित करा दिया जिसे अब दक्षिण भारतीय ज्योतिषियों का इन्टरनेट पर आधिपत्य होने के कारण सर्वत्र मान्यता मिलती जा रही है (क्योंकि भावचलित को गायब करने से दक्षिण भारत में मुख्य जन्मकुण्डली पर अल्प प्रभाव पड़ता है जबकि विषुवत से दूर के प्रदेशों में अधिकाधिक कुण्डलियाँ गलत बनने लगती हैं) |
व्यक्तिगत कुण्डली और राष्ट्र की कुण्डली एक ही गणित और फलित से बनती हैं, किन्तु कई महत्वपूर्ण बातों में भारी अन्तर होता है |
'राजज्योतिष' का प्रधान अंग है मेदिनी ज्योतिष ( Mundane Astrology ) जो पृथ्वी की सभी प्राकृतिक और कृत्रिम घटनाओं का अध्ययन करता है | इसके छ स्तर हैं :—

  1. पृथ्वीचक्र (पद्मचक्र) ,
  2. देशचक्र,
  3. प्रदेशचक्र (जनपद),
  4. मण्डलचक्र (जिला),
  5. ग्राम वा नगर चक्र, एवं
  6. गृह्य वा क्षेत्र (खेत) चक्र |

राजज्योतिष की अगली विधा है स्थापनाचक्र — किसी ग्राम या नगर या राज्य की स्थापना काल की कुण्डली या राजा/नेता के पदग्रहण काल की कुण्डली, जैसे कि स्वतन्त्र भारत के स्थापना काल की कुण्डली जो भारत के देशचक्र से भिन्न है और जिस सत्ताधारी वर्ग के हाथों में 15 अगस्त 1947 को सत्ता का हस्तान्तरण हुआ था उनका भाग्य दर्शाता है, पूरे देश का नहीं |

राजज्योतिष की तीसरी विधा — इसमें चौरासी प्राचीन (वैदिक तन्त्र के) तान्त्रिक चक्रों का प्रयोग होता है जिनमें से कई का व्यक्तिगत कुण्डली में भी प्रयोग होता है |

चौथी विधा — कई अवशिष्ट और लुप्त विशिष्ट तकनीकें जो फल को स्पष्ट करने में काम देती हैं |

दीर्घकालिक फलादेश का साधन - दिव्यवर्ष

भारतीय (वैदिक) ज्योतिष के समस्त सिद्धान्त ग्रन्थों और पुराणों के अनुसार 360 सौर वर्षों का एक दिव्य वर्ष होता है, अर्थात देवताओं का एक वर्ष | जिस प्रकार मेषारम्भ (निरयण सूर्य के मेष राशि में प्रवेश) सौर वर्ष के आरम्भ काल से मेदिनी ज्योतिष की कुण्डलियाँ मानचित्र पर बनती हैं, उसी प्रकार दिव्य वर्ष और दिव्य मास आदि की भी कुण्डलियाँ बनती हैं जिसकी परम्परा भुलाई जा चुकी है |
अब तो कुछ ऐसे भी डार्विनवादी तथाकथित हिन्दू हैं जो कहते हैं की दिव्य वर्ष ही मानवीय सौर वर्ष भी हैं और समस्त प्राचीन ग्रन्थों में त्रुटि है जिस कारण कुछ लाख वर्षों की आयु वाली मानव जाति को प्राचीन भारतीयों ने कई अरब वर्षों की आयु दे दी | क्या यह सम्भव है कि दूर-दूर बिखरे गाँवों में सुरक्षित समस्त प्राचीन ग्रन्थों में किसी कलियुगी दुष्ट ने गलत बातें जोड़ दीं ? गीता में भी उत्तरायण को देवों का दिन और दक्षिणायन को उनकी रात कहा गया है जो दिव्य वर्ष के ही दिन-रात हैं | यदि देवताओं और ऋषियों के सारे ग्रन्थ झूठे हैं तो ये लोग उन झूठे ग्रन्थों से दूर क्यों नहीं रह सकते, क्यों उनकी जाँच किये बिना उनकी प्रस्थापनाओं को संशोधित करना चाहते हैं ?
इन्टरनेट पर सक्रिय किसी भी आधुनिकतावादी ज्योतिषी ने मानचित्र पर मेदिनी चक्रों के अध्ययन की आवश्यकता भी स्वीकार नहीं की, यद्यपि वराहमिहिर जैसे कलियुग के प्रसिद्ध ज्योतिषियों ने भी विस्तार से इन मानचित्रीय चक्रों की चर्चा बृहत्-संहिता जैसे ग्रन्थों में की |
अतः इन आधुनिकतावादियों की बातों को किनारे करके प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं की जाँच ज्योतिष के सर्वमान्य सिद्धान्तों के आधार पर होनी चाहिए |

प्राचीन युगों की ऐतिहासिक घटनाओं की जाँच अधिक कठिन है, अतः उनकी चर्चा विस्तार से बाद में करेंगे, पहले उन महत्वपूर्ण घटनाओं और दीर्घकालीन प्रक्रियाओं की जाँच होनी चाहिए जिनकी ऐतिहासिकता और काल-निर्धारण विवादास्पद नहीं हैं |

सनातन संस्कृति के उत्थान और पतन का अध्ययन प्रस्तुत प्रबन्ध का मुख्य विषय है जिसके अन्तर्गत महत्वपूर्ण घटनाओं की ज्योतिषीय गवेषणा द्वारा दीर्घकालिक कालचक्रीय गति को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा |
कालचक्र की वार्षिक परिधि को ही धर्मचक्र कहते हैं जिसमें बारह दर्श (अमावस) तथा बारह पूर्णमास के मुहूर्तों में सर्वप्रथम वैदिक यज्ञ 'दर्शपौर्णमास' होते थे, मलमास या अधिकमास की गिनती धार्मिक वर्षकृत्य (वर्ष के धार्मिक कृत्यों या अनुष्ठानों) में नहीं होती जिस कारण उसे 'मल' या 'अधिक' की संज्ञा दी गयी |
चौबीस अरों (spokes) वाले धर्मचक्र का आरम्भ मेषारम्भ के निकट चैत्र मास की अमावस से होता है जब चैत्र शुक्लपक्ष का आरम्भ होता है, क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में सारे ग्रहों के सहित सूर्य तथा चन्द्र मेषारम्भ पर ही स्थित थे | मेषारम्भ से मानवीय सौर वर्ष का आरम्भ होता है जो देवताओं का मध्याह्न है | देवों का सूर्योदय उत्तरायण को होता है और असुरों का 'दिन' दक्षिणायन अर्थात कर्क संक्रान्ति से होता है, जिसके निकटतम चान्द्रमास श्रावण से असुरों के वाममार्गी तान्त्रिक धार्मिक वर्ष का आरम्भ होता था — इसे सिकन्दर से जोड़ने की परम्परा पञ्चांगकारों में प्रचलित है, जैसा की मकरन्द-प्रकाश ग्रन्थ में उल्लेख है, और अकबर से दान लेने वाले ब्राह्मणों में इसी यवन प्रथा को को हिन्दुओं के धार्मिक वर्ष का आरम्भ मानने की प्रथा आज भी प्रचलित है जिसे अकबर के 'फसली साल' से जोड़ने का प्रयास किया गया, यद्यपि हिन्दुओं के धार्मिक वर्ष में अकबर की कोई रूचि नहीं थी, उसने भारत के फसल-चक्र से राजस्व की उगाही को जोड़ने के लिए फसली वर्ष का आरम्भ किया था क्योंकि मुहम्मद साहब के जीवन के अन्तिम वर्ष में उनको इल्हाम हुआ कि अधिकमास को वर्ष से हटा देना चाहिए जिसके बाद 360 तिथियों वाले चान्द्रवर्ष को हिजरी साल माना जाने लगा जो भारतीय मौसम चक्र और फसल चक्र से मेल नहीं खाता था, जिस कारण राजस्व के बहीखाते गड़बड़ाते थे | इन्हीं 360 तिथियों की अधिष्ठात्री देवियों की मूर्तियाँ काबा के चारों ओर थीं जिनको काबा के पुजारी घराने से आने वाले मुहम्मद साहब ने तोड़ा और अपने इष्टदेव को एकमात्र पूज्य घोषित किया | इन्हीं 360 तिथियों की अधिष्ठात्री देवियों के वाममार्गी तान्त्रिक विद्याओं के विशेषज्ञों को यूनान में सोफिस्ट (सूफी या "ज्ञानी") कहते थे जिन्हें सुकरात ने शास्त्रार्थ में पराजित किया तो उन 360 लोगों ने न्यायाधीश बनकर सुकरात को विषपान हेतु विवश किया | किन्तु मुहम्मद साहब के अन्तिम वर्ष से पहले अधिकमास भी अरबों के वर्ष में था | हिजरी वर्ष के अरबी नामों के अर्थ से स्पष्ट है की उसकी उत्पत्ति भारत के मौसम चक्र पर आधारित है, न की अरब के रेगिस्तानी मौसम पर (देखें लेख "हिजरी वर्ष की उत्पत्ति" : Hijri_Origins.pdf)|

त्रेतायुग के अन्त तक सूर्यवंश से निकलने वाले इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की 360 रानियाँ होती थीं जिनकी गिनती व्यक्तिगत रानियों में नहीं होती थी | श्रीराम अपवाद थे क्योंकि युगान्त के कारण उनको पृथक काल नहीं मिला, दशरथ के काल में से ही ग्यारह सहस्र वर्ष उनको मिल पाए |
उन युगों की ऐतिहासिक घटनाओं का काल निर्धारण और ज्योतिषीय गवेषणा व्यर्थ है क्योंकि उन संस्कृतियों के अवशेष मिश्र के सूर्यपुर (ग्रीक भाषा में हेलिओपोलिस, जो अब 'काहिरा' है) से लेकर आर्यावर्त के भूगर्भजल में डूबे हैं | बिना भौतिक साक्ष्यों के कोई भौतिकवादी इतिहासकार मानेगा नहीं, भारत के साहित्यिक साक्ष्यों को केवल तभी साक्ष्य माना जाता है जब वे सनातनी परम्परा से बाहर के हों | कलियुग के म्लेच्छ इतिहासकार और उनके अनुचर तो "आहत मुद्राओं" (Punched Marked Coins) पर प्राप्त मगध के प्रागैतिहासिक राजचिह्न को भी गौतम बुद्ध से जोड़कर उसे बौद्धमत का धर्मचक्र कहते हैं और इसी भ्रामक सोच के कारण अशोक की लाट पर मगध राज्य राजचिह्न को आधुनिक भारत का राजचिह्न बना दिया गया, जैसे कि बौद्धमत आधुनिक भारत का राजकीय सम्प्रदाय हो ! मगध के प्रागैतिहासिक राजचिह्न को कई इतिहासकार दबे स्वर में "सूर्य" मानने के लिए तैयार हैं (गूगल search में ' Punched Marked Coins' टाइप करने पर सैकड़ों चित्र और उनसे संलग्न विवरण मिल जायेंगे जिनमें कई स्थलों पर इन सिक्कों पर 24 अरों वाले चिह्न को सूर्या कहा गया है), किन्तु इतना भी नहीं सोचते कि सौरवर्ष में चौबीस खण्ड नहीं होते, केवल बारह सौरमास होते हैं जिनमें शुक्ल और कृष्ण पक्ष नहीं होते | सौरवर्ष में से मलमास वाले भाग को निकालकर "शुद्ध" मासों वाले भागों में 360 तिथियों का शुद्ध वर्ष ही 24 अरों वाला धर्मचक्र है | मेषारम्भ से आरम्भ होने वाले सौरवर्ष को मुख्यमान (जो आजकल शक संवत कहलाता है, यह भी भारतीय ही है) कहते हैं जो गणित का आधार है, तथा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होने वाले धार्मिक वर्ष (जो आजकल विक्रम संवत कहलाता है) को गौणमान कहते हैं क्योंकि गणित समस्त गणना का मुख्य आधार होता है |

मानवीय सौरवर्ष के 360 चक्र पूरे होने पर एक दिव्यवर्ष बनता है जिसमें बारह दिव्यमास होते हैं | बारह सहस्र दिव्यवर्षों का एक महायुग होता है जिसके चारों युगों का वर्णन और गणित अथर्ववेद में वर्णित है | एक सहस्र महायुगों का एक कल्प होता है और 72000 कल्पों की ब्रह्मा जी की परमायु होती है जब नवीन ब्रह्मा जी विष्णुनाभि से निकलते हैं | सभी युगों, दिव्य वर्षों, आदि के आरम्भ काल की कुण्डलियों से उस पूरे युग या दिव्य वर्ष के फलादेश का पता चलता है जी दीर्घकालिक ऐतिहासिक परिघटनाओं का संज्ञान कराता है |

इतिहास के समूचे चक्र को कालचक्र कहते हैं जिसके दो भेद होते हैं, जिनका वर्णन इस लेख में है : कालचक्र| मुख्य सौरपक्षीय भेद है निरयण सूर्यसंचारकाल में बनने वाली कुण्डलियों का अध्ययन, और गौण भेद है 42000 वर्षीय अवसर्पिणी कालचक्र एवं 1200 वर्षीय उत्सर्पिणी कालचक्र को मिलाकर बनने वाला एक दृश्यपक्षीय खण्डकल्प जिसमें मानव की एक उप-प्रजाति पृथ्वी पर आती और जाती है | दृश्यपक्षीय कालचक्र सम गति से प्रवाहित "समय" पर नहीं चलता, यह तो संहारक "काल" का अंश है, और लोगारिथ्मिक पैमाने पर चलता है जिसकी प्रक्रिया गूढ़ है | लोगारिथ्मिक पैमाने पर इसके 6000 विभाग होते हैं जिनका प्राचीन विधान भुला दिए (नष्ट कर दिए ) जाने के कारण ईसाइयों ने मानवीय सृष्टि की आयु ही 6000 वर्षों की मान ली | दृश्यपक्षीय कालचक्र के ज्ञान से मानव जाति की जनसंख्या और प्रमुख सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है, किन्तु इससे कुण्डली नहीं बनती | कुण्डलियाँ सौरपक्ष से ही बनती है | उदाहरणार्थ, एक मानवीय सौरवर्ष का फलादेश निरयन मेषारम्भ कालीन कुण्डली से बनाते हैं, निरयण सूर्य की संक्रान्तियों के काल की कुण्डली से मासफल बनता है, निरयन सूर्य के प्रत्येक अंश से एक सौरदिन का फलादेश बनता है | मेदिनी ज्योतिष के सभी छ स्तरों के फलादेश इन्हीं कालखण्डों की कुण्डलियों से बनाए जाते हैं — पृथ्वीचक्र, देशचक्र, प्रदेशचक्र, मण्डलचक्र, नगर या ग्राम का चक्र, और गृह या क्षेत्र का चक्र |

हर चक्र में सोलह मुख्य कुण्डलियाँ (षोडशवर्ग) और अनेक द्वितीयक (निःसृत, secondary, derived) कुण्डलियाँ होती हैं, जैसे की कारकांश, आरूढ़, आदि | मेदिनी की भाँति जातक (व्यक्तिगत) में भी ये सारी कुण्डलियाँ होती हैं जो अधिकाँश ज्योतिषी समयाभाव के कारण नहीं बनाते जिस कारण अनेक कुण्डलियों की सही प्रक्रियाएं भी अब भुला दी गयीं हैं, केवल मूल श्लोक बचे हैं जिनके गलत अर्थ वे भाष्यकार लगाते हैं जिन्होंने कभी उनकी प्रायोगिक जाँच तक करने की आवश्यकता नहीं समझी | ऋषियों के प्राचीन फलित ग्रन्थों का सारांश द्वापर युग के अन्त में अन्तिम वैदिक ऋषि पराशर जी ने संकलित किया जो पाराशरी होरा के नाम से प्रसिद्ध था, आधुनिक काल में उसके तीन खण्ड कर दिए गए हैं — लघु, मध्य और बृहत् पराशर होराशास्त्र | अन्तिम ऋषि होने के कारण कलियुग के लिए पराशर ऋषि ही अन्तिम प्रमाण हैं |
आज यूरोप तो क्या, भारत का भी कोई ज्योतिषी नहीं जानता कि नोस्त्रादमुस की तरह दीर्घकालीन वैश्विक महत्त्व की घटनाओं की भविष्यवाणी कैसे की जाय | हिन्दू राज्यों के पतन के कारण राजज्योतिष का भी पतन हो गया | अब तो कई धूर्त अपने को राजज्योतिषी कहते हैं किन्तु राजज्योतिष असल में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों का ज्योतिष है जिसकी पद्धति वे सीखना भी नहीं चाहते, केवल व्यक्तिगत कुण्डलियाँ बनाकर धन कमाने में व्यस्त रहते हैं, और यदि कोई जानकार व्यक्ति बताना चाहे तो उसे शत्रु समझ लेते हैं — क्योंकि व्यक्तिगत कुण्डलियाँ बनाने से पैसा झड़ता है जबकि राजज्योतिष से आज भी भारत के शासक वर्ग को कोई सरोकार नहीं है, यद्यपि जब संकट सिर पर आता है तो हमारे शासक भी अपनी व्यक्तिगत कुण्डली दिखाते हैं, किन्तु राष्ट्र के कल्याण हेतु ज्योतिष की सहायता नहीं लेना चाहते | एक तरह से यह भी ठीक ही है, क्योंकि राजसत्ता यदि ज्योतिषियों से सलाह लेकर पञ्चवर्षीय योजनायें बनाने लगे तो धूर्त धन्धेबाजों के गिरोह वहाँ भी कब्जा जमा लेंगे और देश का बेड़ा गर्क करा देंगे |

मेदिनीचक्र बनाने की विधि

इस प्राचीन पद्धति के अनेक उदाहरणों सहित विस्तृत वर्णन प्रस्तुत वेबसाइट पर कई वर्षों से हैं | इन सारे मेदिनी वाले लेखों के उदाहरण मुफ्त Kundalee Software के MEDINI मोड्यूल द्वारा बनाए गए हैं जिसका डाउनलोड वेब-लिंक यहाँ क्लिक करने पर दिख जाएगा |
[ यह Kundalee Software डाउनलोड करने से पहले कई लोग डाउनलोड पेज के निर्देश ठीक से नहीं पढ़ते और फिर शिकायत करते रहते हैं कि सॉफ्टवेयर इन्स्टॉल नहीं होता |]
प्रस्तुत वेबसाइट के मेदिनी टैब में सबसे विस्तृत उदाहरण है आधुनिक युग का इतिहास जो 20-4-2015 को अन्तिम बार सम्पादित किया गया था |

नोस्त्रदामुस की विधि स्थूल और अस्पष्ट थी, किन्तु प्राचीन वैदिक यामल तन्त्रों और ऋषियों के ज्योतिष ग्रन्थों पर आधारित प्रस्तुत वैदिक विधि अत्यधिक सूक्ष्म है, यद्यपि केवल संक्षिप्त महत्वपूर्ण बिन्दुओं का ही इन मेदिनी लेखों में स्पष्टीकरण किया गया है, शेष बिन्दुओं का स्पष्टीकरण इसी वेबसाइट के मेदिनी के सिवा अन्य समस्त लेखों में मिल जाएगा क्योंकि मेदिनी हो या जातक, मूल विधि एक ही है |
तब हज़ारों वर्षों के विश्व इतिहास की ज्योतिषीय झलक आसानी से दिखाना सम्भव हो सकेगा , जो ऋषियों की प्राचीन पद्धति के पुनरुद्धार हेतु आवश्यक है | व्यक्तिगत कुण्डली में जन्मकाल की कुछ अनिश्चितता भी रहती है, किन्तु राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय कुण्डलियों में वर्ष या मास आदि के प्रवेश काल की कुण्डली बनती है जिसमें काल पूर्णतया शुद्ध रहता है जिस कारण ज्योतिषीय विधियों और नियमों को भी समझने में शंका की सम्भावना नहीं रहती |

पहले ईसापूर्व 582 से लेकर ईसा के पश्चात 1579 तक के इतिहास की संक्षिप्त रूपरेखा दिखाना आवश्यक है, तत्पश्चात उसकी पृष्ठभूमि में विशिष्ट घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण उचित होगा, जैसे कि तराइन, चित्तौर, पानीपत, पलासी, वाटरलू, सिकन्दर या चन्द्रगुप्त आदि के युद्ध अथवा विश्वयुद्ध | ऐसी घटनाओं के ज्योतिषीय अध्ययन द्वारा उन छुपी हुई प्रक्रियाओं और कारणों का भी खुलासा हो सकता है जो सामान्यतः इतिहासकारों की दृष्टि में नहीं आते | "ईसापूर्व 582 से लेकर ईसा के पश्चात 1579 तक" जैसे कालखण्ड मेरे मनमाने नहीं है, देवताओं द्वारा निर्धारित "दिव्य वर्ष" पर आधारित हैं, व्यक्तियों के नाम या वंश पर आधारित युगों का नामकरण भारतीय परम्परा नहीं है, जैसे की गुप्तकाल या मुगलकाल|

अब दिव्य वर्षों की कुण्डलियों के फलादेश की प्रक्रिया पर आते हैं जो इतिहास की गूढ़ प्रक्रियाओं को समझने में सहायक है | कल्प के आरम्भ से सृष्टि के आरम्भ तक 47400 दिव्य वर्ष बीतें जब मानवीय सृष्टि का अभाव था | सृष्टि के आरम्भ से कलियुग के आरम्भ तक 5433000 दिव्य वर्ष बीतें | कलियुग का आठवाँ दिव्य वर्ष ईसापूर्व 582 से ईसापूर्व 222 तक था | कलियुग के आठवें दिव्य वर्ष की कुण्डली बनाने के लिए Kundalee Software के डिफ़ॉल्ट सेटिंग में ऊपर दाहिनी ओर के कॉम्बो से "मेदिनी" चुन लें, उसके बाद ऊपर बांयीं ओर के कॉम्बो से संसार के लिए "मेरु" अथवा भारत के लिए "विदिशा" चुन लें | तत्पश्चात बांयी ओर वर्ष वाले खाने में "-582" लिखकर "स्टार्ट" बटन दबा दें, अन्य कोई छेड़छाड़ न करें, 'मेरु' चुनने पर मानचित्र पर "जगत-लग्न" अथवा पृथ्वीचक्र की लग्न-कुण्डली बन जायेगी और 'विदिशा' चुनने पर भारत का देशचक्र बनेगा| अन्य सारे षोडश वर्गों और अन्यान्य कुण्डलियों को भी मानचित्र पर बनाने का प्रावधान इस सॉफ्टवेयर में है |

ईसापूर्व 582 से ईस्वी 1939 तक की सभी दिव्य वर्षों के आरम्भ काल की लग्न-कुण्डलियाँ इस पेज के नीचे FILES बटन दबाने पर दिखेंगी |

विश्व-इतिहास का दीर्घकालीन सारांश

(राज-ज्योतिष की गोपनीय विधि, कुण्डली सॉफ्टवेयर पर आधारित)
संलग्न चित्र में 1939 से 2299 ईस्वी तक के 360-वर्षीय दिव्य वर्ष की वैश्विक कुण्डली है | पहले कालचक्र का दीर्घकालीन फलादेश स्पष्ट कर लें, जो समूची सृष्टि में लागू रहता है |
पूर्वी अफ्रीका के मेरु पर्वत (माउंट केन्या) में सृष्टि का केन्द्र है जहाँ से जगत-लग्न की कुण्डली बनती है | ईसापूर्व 40000 में मानव की वर्तमान प्रजाति (sub-specie) का प्रादुर्भाव हुआ था जिसके बाद दो दिशाओं में इसका विस्तार सर्वाधिक हुआ — बड़े काले अक्षर में "2" संख्या वाली वृष राशि में तथा बड़े काले अक्षर में "5" संख्या वाली सिंह राशि में , क्योंकि वर्ष के आरम्भ में वर्ष-कुण्डलियाँ बनती हैं जब सिंह राशि के स्वामी उच्च में रहते हैं और वृष के स्वामी शुक्र या तो उच्च में रहते हैं या उच्चस्थ सूर्य के साथ रहते हैं या स्वगृह में रहते हैं, जिस कारण पूरे विश्व पर सदैव इन्ही दो राशियों में स्थित देशों का वर्चस्व रहता है |
कालचक्र (अवसर्पिणी) के आरम्भ में सिंह राशि में मेरु से आरम्भ होकर उसके बाद सूडान (मेरु-सभ्यता और कुश सभ्यता) , फिर मिस्र, तत्पश्चात ग्रीस, उसके बाद रोम, फिर स्पेन-फ्रांस-जर्मनी (हैप्सबर्ग) और तब इंग्लैंड एवं अन्ततः अमरीका का वर्चस्व होता है |
कालचक्र के आरम्भ में वृष राशि में मेरु से आरम्भ होकर उसके बाद भारत, फिर चीन, और तब कोरिया एवं जापान का वर्चस्व होता है |
कालचक्र उलटा घूमता है (उत्सर्पिणी, चित्र में मोटे लाल तीर से दिखाया गया है) उपरोक्त देशों का वर्चस्व उलटे क्रम में होता है | उलटे कालचक्र की गति 36 गुनी तेज होती है | अवसर्पिणी 42000 वर्षों का होता है, और उत्सर्पिणी केवल 1200 वर्षों का | उत्सर्पिणी में पुराणी sub-specie का extinction होता है और नयी मानव प्रजाति आती है | उत्सर्पिणी का आरम्भ 2000 ईस्वी की मेष संक्रान्ति को हो चुका है | अमरीका का पतन आरम्भ हो गया , ब्रिटेन में तेल के कूँए खोजे गए, अब जर्मनी उठने वाला है जिस कारण अमरीका और ब्रिटेन मिलकर जर्मनी को रोकने के लिए अरब शरणार्थियों को बलपूर्वक वहां भेज रहे हैं, किन्तु यूरोपियन संघ की नीतियाँ अब मुख्यतः जर्मनी और उसका कनिष्ठ सहयोगी फ्रांस तय करने लगा है, ब्रिटेन तो संघ से भाग खड़ा हुआ है | पूर्व में जापान का वर्चस्व समाप्त हुआ और अब कोरिया एवं चीन आगे आ गए हैं, जिसके बाद भारत की बारी है | कालचक्र की गति मेरु के पास धीमी और मेरु से दूर तीव्र होती है (लोगरिथमिक स्केल होता है) जिस कारण भारत का वर्चस्व लगभग 41 हज़ार वर्षों तक और भारत का पतन केवल एक हज़ार वर्षों तक होता है | सिंह राशि में भी अमरीका-इंग्लैंड का उत्थान अल्पकाल के लिए और सूडान-मिस्र का उत्थान दीर्घकाल के लिए होता है | शुक्र दो राशियों के स्वामी होते हैं, जिनमें चन्द्रमा के उच्चत्व के कारण वृष शुभ है और शनि के उच्चत्व के कारण तुला अशुभ है | अतः वृष के क्षेत्र में शुभ स्वभाव की सभ्यता पनपती है | कुण्डली में शुक्र वृष में अथवा उसके बगल में उच्चत्व को प्राप्त करता है जिस कारण कालचक्र में वृष का वर्चस्व होता है, तुला का नहीं | काम (जनसंख्या), कला, साहित्य, संस्कृति, आदि में वृष का वर्चस्व रहता है | सिंह क्रूर है, अतः सिंह राशि के देश युद्ध आदि क्रूर और पाप कर्मों वाले होते हैं | कालचक्र के आरम्भिक भागों में पाप का बल अल्प होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है | अतः मिस्र या ग्रीस की तुलना में अमरीका पाप की पराकाष्ठा तक पँहुचता है | मिस्र या ग्रीस के सम्प्रदायों की तुलना में रोमन चर्च अपेक्षाकृत अशुभ होता है, और उससे भी अधिक अशुभ प्रोटेस्टेंट है जिसमें वासना को स्वतन्त्रता मिलती है | सूर्य और शुक्र की राशियों के अलावा कभी कभी बुध की मिथुन और कन्या राशि का बल भी बढ़ता है क्योंकि बुध भी 35% समय उच्च के सूर्य के साथ रहते हैं | परन्तु सूर्य और शुक्र वर्ष-कुण्डली में सदैव बलवान होते हैं |

कलियुग का दिव्यवर्ष-8 : ईसापूर्व 582 से ईसापूर्व 222

इस कुण्डली में ग्रीस-रोम आदि क्षेत्र एकादश भाव में हैं | एकादश भाव पूर्णतया सूर्य की सिंह राशि में है, सूर्य सप्तम भाव में उच्चस्थ और राहू सहित हैं | केन्द्र (सप्तम भाव) में सूर्य का बल और भी बढ़ जाता है | एकादशेश सर्वाधिक पापफल देता है | दशमेश होने के कारण चन्द्रमा भी पापग्रह बनकर एकादश में बैठकर उस क्षेत्र को और भी अधिक पापमय बना रहे हैं | धर्म (नवम भाव) और मोक्ष (द्वादश भाव) के स्वामी बुध सूर्य के साथ हैं किन्तु सूर्य उनके शत्रु हैं | विवेक और विद्या के स्वामी शनि लग्न में उच्चस्थ बैठकर पञ्च-महापुरुष योग बना रहे हैं और सूर्य से पूर्ण अतिशत्रू सम्बन्ध बना रहे हैं |
अतः ग्रीस और रोम का उत्थान तो है किन्तु उनके प्रभाव-क्षेत्रों में पाप का साम्राज्य और धर्म, विद्या एवं विवेक का नाश है | सिकन्दरिया में महान पुस्तकालय को जलाया गया, विद्वानों की सर्वत्र हत्या की गयी | ग्रीस और रोम में प्रागैतिहासिक (वैदिक) जनतान्त्रिक परम्पराओं का नाश इसी काल में हुआ, प्राचीन संस्कृति के पुनरुत्थान की मांग करने वाले सुकरात को विष पिलाया गया जो पापियों के आधिपत्य का सूचक है | सप्तम भाव में सूर्य है जो प्रवास का भाव भी है | अतः सूर्य के क्षेत्र एकादश, उसमें स्थित चन्द्रमा के क्षेत्र दशम, और सूर्य के प्रभाव में स्थित बुध के क्षेत्र नवम और द्वादश — इन क्षेत्रों पर ग्रीस और रोम का साम्राज्यवादी प्रभाव बढ़ा और यवन प्रवासियों के उपनिवेश खुले — सिन्धु नदी से अटलाण्टिक तट तक | इन सभी प्रदेशों में सबसे अशुभ फल फारस को मिला जहाँ सूर्य की शत्रु दृष्टि थी |

साम्राज्यवाद बलवान पापग्रह का परिणाम है क्योंकि साम्राज्यवाद के कारण लोकतांत्रिक परम्पराओं और संस्थाओं का नाश होता है और जनहित के बदले उच्च वर्ग के हित में राजसत्ता जुट जाती है |
भारत मृत्यु के अष्टम भाव में है किन्तु वहां स्वगृही शुक्र लग्नेश होकर बैठकर उस भाव को शुभ बना रहे हैं | जिस प्रकार सूर्य और उनके सम्बन्धियों के कारण पश्चिम में यवनों का उत्थान हुआ, उन्हीं ग्रहों - सूर्य, राहू और चन्द्रमा द्वारा सर्वतोभद्र-वेध के कारण भारत में भयंकर मारकाट (मृत्युभाव) के परिणामस्वरूप मगध का उत्थान हुआ | सूर्य की लगभग शून्य दृष्टि भारत पर थी जिस कारण सिकन्दर द्वारा भारत को जीतने की योजना सफल नहीं हो सकी — स्वगृही शुक्र के कारण भारत का ग्रह बलवान था, सूर्य बलवान होते हुए भी भारत पर प्रभावहीन था | अष्टम भाव गुप्त विद्या का भाव होता है, मोक्ष त्रिकोण का अंग है | इसी काल में भारत में 65 सन्यासी सम्प्रदायों का उल्लेख मिलता है, बौद्ध और जैन जैसे संन्यास आश्रम वाले सम्प्रदाय भी उन्हीं में से थे | किन्तु सनातनी संन्यास आश्रम का पतनकाल था क्योंकि अत्यधिक अशुभ (3-6 के स्वामी) होकर बृहस्पति मोक्ष भाव में थे और भारत पर उनकी पूर्ण एवं अतिशत्रु दृष्टि थी | स्वगृही शुक्र के कारण भारत का राजनैतिक एकीकरण हुआ | किन्तु भारत की तुलना में चीन में साम्राज्यवाद का विकास अधिक हुआ क्योंकि चीन पर शुक्र के भाव में होने के अलावा सूर्य का सर्वतोभद्र वेध भी था — इसी काल में "चीन" का एकीकरण हुआ और साम्राज्यवाद ने भौगोलिक विस्तार हेतु विशाल अभियान आरम्भ किया | भारत में खूँखार साम्राज्यवाद का विस्तार शुक्र से विद्ध नाम वाले अशोक ने किया जिसपर साम्राज्यवादी सूर्य से प्रभावित चन्द्रमा और बुध के भी अशुभ वेध थे | इन तीनों ग्रहों का वेध "ब" (बुद्ध) पर भी था, किन्तु उसपर शनि का अतिरिक्त वेध भी था जो केन्द्रेश-त्रिकोणेश होने के कारण शुभ राजयोगकारी तो थे ही, उच्चस्थ होकर लग्न में बैठने के कारण पञ्च-महापुरुष योग भी बना रहे थे | अतः दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में अशोक से भी बहुत अधिक बलवान बुद्ध का राजयोग था और वह योग शनि के कारण धार्मिक और शुभ था — भारत से चीन तक |

राजनीति हेतु दशमांश-वर्ग देखना चाहिए (इसके लिए Kundalee Software में स्विचबोर्ड में MAIN बटन दबाएँ, जो पेज खुलेगा उसमें "षोडशवर्ग दशा" में 10 लिखकर उसके बटन को दबाएँ|) दशमांश-वर्ग में राशि ही भाव होता है | उसमें सूर्य मेष में उच्चस्थ हैं जिस कारण तमिल और केरल अशोक के साम्राज्यवाद से बच गए | शुक्र चतुर्थ (केन्द्र) एवं नवम (त्रिकोण) के स्वामी होने के कारण राजयोगकारक हैं और भूमि के चतुर्थ भाव (केन्द्र) में स्वगृही बैठकर बलवान योग बना रहे हैं जिस कारण लग्न-वर्ग के शुभ फलों की वृद्धि और अशुभ फलों में कमी हुई | दशमांश-वर्ग की शक्ति लग्न-कुण्डली से बहुत अल्प होती है, किन्तु प्रभावी ग्रह बली हो तो महत्वपूर्ण बन जाता है | दशमांश-वर्ग भारत में सर्वाधिक सर्वतोभद्र वेध मगध पर था — सूर्य, शनि, मंगल और राहू — ये चारों पापग्रह थे | भारत से बाहर सर्वाधिक वेध यवन पर था | इन्ही दोनों के विस्तार का युग था | भारत में बुद्ध नहीं होते तो और भी अधिक मारकाट मचती | बुद्ध क्या खाते थे इससे अधिक महत्त्व इस तथ्य का है कि उन्होंने अनावश्यक साम्राज्यविस्तार वाले युद्धों के विरुद्ध वातावरण बनाया |
"च" पर उच्च सूर्य का वेध प्रथम एवं दशम दोनों वर्गों में था जिस कारण चीन को बल मिला तो भारत में चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने देश को बचाया और एकताबद्ध किया - सूर्य के कारण युद्ध द्वारा न कि प्रवचन द्वारा |
इसी प्रकार अन्य वर्गों के फल पाराशरी होरा के अनुसार बनाएं | तब स्पष्ट हो जाएगा की जिन साम्राज्यवादी आक्रान्ताओं को उनके प्रशंसक इतिहासकार शुभ बताकर पढ़ाते हैं वे असल में खून-खराबा करने वाले अशुभ और पापी हमलावर थे जिन्होंने अनेक संस्कृतियों को नष्ट किया |

इसी दिव्यवर्ष की विदिशा-कुण्डली (भारत का देशचक्र) बनाने पर जो फल मिलेगा वह लोकतान्त्रिक जनपदों के महासंघ कलिंग के बारे में मेगास्थानीस के वर्णन को सत्यापित करता है और साम्राजवादी इतिहासकारों को झुठलाता है, किन्तु यह अत्यधिक विस्तृत विषय है | कलिंग-युद्ध का मुख्य क्षेत्र ओड़िसा नहीं था, यद्यपि वह भी पूरी तरह से युद्ध में सम्मिलित था, वहां तो मौर्यों के पतन होते ही खारवेल का महान साम्राज्य स्थापित हुआ | कलिंग-युद्ध से सर्वाधिक क्षति मगध के चारों ओर उन गणराज्यों को हुई जो चाणक्य के महासंघ में सम्मिलित थे | गुप्त साम्राज्य वैशाली की राजकुमारी कुमारदेवी से वैवाहिक सम्बन्ध के कारण बढ़ा तो मौर्यों के काल में वैशाली लुप्त कैसे हो सकता था ? आजतक हमारे इतिहासकार अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए साम्राज्यवादी भ्रमजाल से निकल नहीं पाए हैं | अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारतीयों को यह पता चले कि जिस युग में अंग्रेजों के पूर्वज जंगली थे उस युग में भी भारत में लोकतन्त्र की परम्पराएं विश्व में सर्वाधिक विकसित थीं | अंग्रेज तो पढ़ाते थे कि भारतीय स्वराज्य के योग्य ही नहीं हैं, सदैव आक्रान्ताओं द्वारा ही शासित रहे हैं और रहेंगे | उनके 'मूलनिवासी' चेले आजतक यही उपनिवेशवादी हल्ला मचाते हैं , जिन्हें पता ही नहीं है कि इन्हीं तथाकथित मूलनिवासियों के दलित और पिछड़े वर्गों के नेता प्राचीन भारतीय गणराज्यों के नियन्ता थे - लोरिक, सलहेस (शैलेश), दीनाभद्री, आदि इन महावीरों की लोकगाथाएं आज भी असम से गुजरात तक दलितों और पिछड़े समुदायों में प्रचलित हैं |

केवल लोरिक महाकाव्य में मैंने 26 स्थलों को चुना और उन सभी स्थानों की पुरातात्विक जाँच की, उन सबके ऊपरी स्तर लगभग ईस्वी 600 के थे और नीचे भूगर्भजल तक के स्तर लगभग ईसापूर्व 600 के थे — रोमन साम्राज्य के पतन और इस्लाम के उदय के कारण भारत के व्यापार का नाश हुआ जिस कारण यहाँ के कारीगर और वणिक वर्गों का पतन हुआ और वे "पिछड़े" बन गए | ईस्वी 600 से पहले इन तथाकथित पिछड़े और दलित वर्गों के घर पक्की ईंटों के बनते थे जिनके प्रमाण मिलते हैं, और ब्राह्मण झोपड़ियों में रहते थे जिनके कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं बचे, केवल ग्रन्थ बचे हैं जिनमें भारत के अन्धयुग में प्रक्षिप्त अंश जोड़े गए और जो सही अंश बचे हैं उनकी जानबूझकर झूठी व्याख्याएं पढाई जाती हैं |
जिस वर्ष सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया उस वर्ष का वर्षफल (दिव्य नहीं, सामान्य वर्ष) बनाएं, तब पता चलेगा कि सिकन्दर भारत में घुसने के मुख्य मार्ग — पंजाब — द्वारा क्यों नहीं घुस सका और क्यों उत्तर झेलम की ओर से भारत में घुसने का प्रयास कर रहा था, बाद में दक्षिण पंजाब के मुल्तानी मालव वीरों (जो उज्जैन में मालवों की ही शाखा थे) से उसका संघर्ष हुआ जिनके भालों से घायल होकर वह भागा और उसी चोट से रास्ते में ही मर गया, फिर भी मक्कारों द्वारा उस हत्यारे गुण्डे को विश्व-विजेता कहा जाता है जिसके लिए झेलम और मालव जैसे एक-एक जिले भी पर्याप्त थे !!

फारस का पतन

ऊपर मैंने एक बात का उल्लेख किया था — "भारत में खूँखार साम्राज्यवाद का विस्तार शुक्र से विद्ध नाम वाले अशोक ने किया जिसपर साम्राज्यवादी सूर्य से प्रभावित चन्द्रमा और बुध के भी अशुभ वेध थे |"
किन्तु "अ" का वेध केवल अशोक के नाम पर ही नहीं था, उस युग में साम्राज्यवाद आरम्भ करने वाले अजातशत्रु और अलेक्सान्दर (अल-केशिन-तृ : मिश्री हीएरोग्लिफ में ग्रीककाल का उच्चारण) के नाम भी अशोक की तरह ही विद्ध थे |
फारस को सबसे अधिक क्षति पँहुची यह तो मैंने लिखा किन्तु उसकी विस्तृत व्याख्या नहीं की | एक लेख में सारी घटनाओं का विवरण सम्भव नहीं है | किन्तु उन तथ्यों का उल्लेख आवश्यक है जो इतिहासकार जानबूझकर छुपाते हैं | फारस में वेद-विरोधी असुरों का राज था जो पारसियों के धर्मग्रन्थ 'जेंड-अवेस्ता' के काल से ही असुर-महत (मोहेंजोदड़ो का महिषासुर) के भक्त थे, उसे "अहुर-मज्द" कहते थे और सप्तसिन्धु को हप्त-हिन्दू कहते थे ("हिन्दू" शब्द की उत्पत्ति वहीं से हुई)| सिकन्दर ने उनके अन्तिम साम्राज्य को नष्ट कर दिया जो हख्मनी वंश का था |
उस वंश में अन्तिम शक्तिशाली सम्राट था क्षयार्ष जिसके नाम का अर्थ है "ऋषियों के आर्ष धर्म का क्षय करने वाला असुर-पूजक"| "आर्ष" का अर्थ ही है "ऋषियों के आर्ष धर्म या मत" | यूरोपियन इतिहासकारों ने जानबूझकर इतिहास की पुस्तकों में नाम बिगाड़कर क्षयार्ष को Xerxes लिखा और जेर्क्सीज कहा जो ग्रीक अपभ्रंश था, प्राचीन फारसी नहीं | प्राचीन फारसी नाम "क्षयार्ष" पढ़ाते तो भारतीय छात्र रहस्य जान लेते कि जिस "आर्य" शब्द पर ईरान का नामकरण हुआ था उस वैदिक "आर्यान" का पतन बहुत पहले ही हो चुका था और असुरों का कब्जा ईसापूर्व दूसरी-तीसरी सहस्राब्दी में ही ईरान में हो चुका था, अतः वैदिक काल उससे बहुत पहले मानना पड़ता ! (वेदों का गलत काल पढ़ाने के लिए तथ्यों का विकृतीकरण हर स्तर पर किया गया जिसपर राष्ट्रवादी इतिहासकार भी ध्यान नहीं देते, क्योंकि उनकी संख्या अल्प है और संघ परिवार को इन बातों में रूचि नहीं है ; शिक्षा-प्रणाली से वामपन्थी कचड़े को निकालने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है !!)
अतः सिकन्दर का फारस से युद्ध या उससे पहले क्षयार्ष का यूनान पर आक्रमण असुरों का आपसी युद्ध था |
क्षयार्ष बहुत शक्तिशाली साम्राज्य का स्वामी था, किन्तु यूनान का उत्थान और फारस का पतन उसके असफल यूनान-आक्रमण से ही आरम्भ हुआ | इसका कारण है उस दिव्यवर्ष के सर्वतोभद्रचक्र में "क्ष" (अर्थात "क", क्योंकि क्ष = क् + ष) पर चन्द्रमा और बुध के वेध थे | चन्द्रमा अत्यधिक अशुभ थे - केन्द्रेश-दोष (दशमेश) से ग्रस्त होकर एकादश में स्थित थे, ये दोनों लक्षण अशुभ हैं | बुध उच्चस्थ और अशुभ सूर्य के साथ थे और सूर्य उनके शत्रु थे | अतः क्षयार्ष से ही फारस का पतन आरम्भ हुआ जिसका पूरा साम्राज्य सिकन्दर के हाथ लग गया, इसे यूरोप के धूर्तों ने विश्व-विजय की संज्ञा दी, यद्यपि वह केवल फारस के साम्राज्य का विजय था | विश्व उतना ही बड़ा तो नहीं था |
फारस का अन्तिम हख्मनी राजा था "द" ("दारा", जिसे यूरोप के मूर्ख "डेरियस" कहते हैं) जिसे सिकन्दर ने हराया था जिसपर बृहस्पति का सम्मुख वेध था | बृहस्पति पूरी कुण्डली में सबसे अशुभ ग्रह थे, तीसरे और छठे भावों के स्वामी होकर हानि के बारहवें भाव में थे, अतिशत्रू बुध की राशि में थे जिस कारण अशुभता बढ़ गयी, और वक्री भी थे | वक्री ग्रह शुभ हो तो शुभत्व बढ़ता है और अशुभ हो तो अशुभत्व बढ़ता है |
सर्वतोभद्रचक्र को त्रैलोक्यदीपक और चक्रराज कहा जाता है | वेदतुल्य माने जाने वाले यामल तन्त्र के चौरासी ज्योतिषीय चक्रों में यह सबसे प्रमुख है | इसका जो व्यक्ति गलत उद्देश्यों से प्रयोग करता है उसे यह चक्र नष्ट कर डालता है |

Unless otherwise stated, the content of this page is licensed under Creative Commons Attribution-Noncommercial 2.5 License.