Kaalachakra Siddhanta

कालचक्र-सिद्धान्त : सूक्ष्म से विराट तक का Noumenal TOE

विनय झा

मुख्य प्रतिपादन

कालचक्र-सिद्धान्त अथवा सिद्धान्तीय दृष्टि केवल खगोलविज्ञान नहीं है। यह दृश्य जगत् के पीछे स्थित अदृश्य कारण-ज्यामिति का विज्ञान है। आधुनिक भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, इतिहास और ज्योतिष दृश्य परिणामों का अध्ययन करते हैं; परन्तु कालचक्र-सिद्धान्त उन सबके Noumenal स्रोत का विवेचन करता है। इसी अर्थ में यह Unified Field Theory से भी व्यापक Theory of Everything है।

सामान्य आधुनिक विज्ञान वस्तुओं को बाहर से देखता है। वह प्रकाश, कण, पदार्थ, बल, रासायनिक संयोग, जैविक जीवन, ऐतिहासिक घटनाएँ और आकाशीय पिण्डों की गति को इन्द्रियगम्य रूप में मापता है। यह सब Phenomenal क्षेत्र है — अर्थात् वस्तु जैसी हमें दिखती है।

सिद्धान्तीय दृष्टि इससे भिन्न है। वह वस्तु की उस अदृश्य संरचना को देखती है जिससे दृश्य जगत् उत्पन्न होता है। यह Noumenal क्षेत्र है — वस्तु जैसी वह अपने वास्तविक कारण-स्वरूप में है। सूर्यसिद्धान्त इसी अदृश्य सूर्य-मेरीय ज्यामिति का गणित है।

आधुनिक Unified Field Theory भौतिक बलों को एक सूत्र में बाँधना चाहती है। किन्तु गुरुत्व स्वयं बल नहीं है; वह दिक्काल की वक्रता का दृश्य परिणाम है। अतः बलों को जोड़ने से पूर्ण सिद्धान्त नहीं मिलेगा। पहले दिक्काल की मूल कारण-ज्यामिति को समझना होगा। यही कालचक्र-सिद्धान्त का विषय है।

१. α : आयामहीन किन्तु आधारहीन नहीं

आधुनिक भौतिकी में fine-structure constant को प्रायः केवल एक आयामहीन नियतांक माना जाता है। उसका मान लगभग इस प्रकार है —

α⁻¹ = 137.035999177

α = 0.007297352564331425030245795264691683228

यह सत्य है कि α आयामहीन है। किन्तु आयामहीन होने का अर्थ यह नहीं कि उसका कोई स्रोत नहीं है। वह किसी मानव-निर्मित इकाई पर निर्भर नहीं करता, परन्तु उसका आधार ब्रह्माण्ड की वास्तविक ज्यामिति में है।

सिद्धान्तीय दृष्टि के अनुसार α का मूल स्रोत है — सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या और पृथ्वी-केन्द्र-से-मेरु-शिखर तक की दूरी का अनुपात। अतः α केवल कण-भौतिकी का नियतांक नहीं है; वह सूर्य-मेरु-ज्यामिति का सेतु-नियतांक है।

α आयामहीन है, परन्तु आधारहीन नहीं। उसका आधार सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य और मेरु-अक्ष की ज्यामिति है।

२. सूर्यसिद्धान्तीय मूल समीकरण

सूर्यसिद्धान्त से सूर्य का परिधि-समान मान प्राप्त होता है —

2πR⊙(SS) = 4,331,500.2 yojana

अतः सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या —

R⊙(SS) = 4,331,500.2 ÷ 2π

R⊙(SS) = 689,379.667833533265 yojana

अब इसी सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या को 2πα⁻¹ से विभाजित करने पर पृथ्वी-केन्द्र से मेरु-शिखर तक की दूरी मिलती है —

R⊕ + h(Meru) = R⊙(SS) ÷ (2πα⁻¹)

R⊕ + h(Meru) = 4,331,500.2 ÷ ((2π)²α⁻¹)

फलतः —

R⊕ + h(Meru) = 800.652255332121 yojana

यहाँ पृथ्वी की सिद्धान्तीय त्रिज्या ठीक-ठीक —

R⊕ = 800 yojana

है। अतः मेरु की ऊँचाई —

h(Meru) = 800.652255332121 − 800

h(Meru) = 0.652255332121 yojana

और अनुपात —

800 ÷ 0.652255332121 = 1226.5135455444492418332912021916

यह अनुपात केवल अंकगणित नहीं है। यह पृथ्वी-मेरु अक्ष और सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-ज्यामिति के बीच सम्बन्ध का संकेत है।

३. संशोधित किलोमीटर-मान

मेरु के समीप पृथ्वी की स्थानीय भूमध्यीय त्रिज्या को लिया गया —

R⊕(Meru) = 6378.13821733406 km

यह ठीक-ठीक \(800\) yojana है। अतः —

1 yojana = 6378.13821733406 ÷ 800

1 yojana = 7.972672771667575 km

मेरु की ऊँचाई —

h(Meru) = 0.652255332121 × 7.972672771667575

h(Meru) = 5.200218326576087730631676575 km

इससे पृथ्वी-केन्द्र से मेरु-शिखर तक की दूरी —

R⊕(Meru) + h(Meru)

= 6378.13821733406 + 5.200218326576087730631676575

= 6383.338435660636087730631676575 km

अब सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या अथवा महाधुरी \(a\) —

a = (2πα⁻¹) × (R⊕ + h(Meru))

a = 861.0225765836003 × 6383.338435660636087730631676575

a = 5,496,198.5070776494017481636563331 km

निष्कर्ष

α⁻¹ = 4,331,500.2 ÷ ((2π)² × (R⊕(Meru) + h(Meru)))

अतः α का आधार सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या और पृथ्वी-मेरु अक्षीय दूरी का अनुपात है।

४. α का वास्तविक अर्थ

आधुनिक भौतिकी में α विद्युत्-चुम्बकीय अन्तःक्रिया की शक्ति बताता है। वह परमाणु-वर्णक्रम, इलेक्ट्रॉन की ज्यामिति, प्रोटॉन की संरचना, प्रकाश-पदार्थ सम्बन्ध, Quantum Electrodynamics तथा सूक्ष्मतम कणों के मापन में प्रवेश करता है।

किन्तु सिद्धान्तीय दृष्टि में यह केवल सूक्ष्म-जगत् का नियतांक नहीं है। यह सूक्ष्म से विराट तक एक ही ज्यामितीय सेतु का नियतांक है।

α सूक्ष्म कणों में भी कार्य करता है और सूर्य-मेरु-ब्रह्माण्डीय ज्यामिति में भी। इसका कारण यह है कि सूक्ष्म और विराट दोनों का मूल स्रोत एक ही कालचक्र-ज्यामिति है।

यदि मेरु की वास्तविक ऊँचाई और मेरु के समीप पृथ्वी की स्थानीय त्रिज्या अत्यन्त सूक्ष्म शुद्धता से मापी जाय, तो इस विधि से α का अधिक शुद्ध मान मिल सकता है। कण-भौतिकी α के दृश्य प्रभावों को मापती है; परन्तु सूर्यसिद्धान्त उसका अदृश्य ज्यामितीय स्रोत दिखाता है।

सूर्यसिद्धान्तीय \(R\) को telescope अथवा आधुनिक भौतिक यन्त्रों से नहीं मापा जा सकता, क्योंकि वह दृश्य पदार्थ-सूर्य की दूरी नहीं है। वह पाठ-प्रदत्त सिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या है। पाठ से \(2πR\) मिलता है, उससे \(R\) मिलता है, और \(R⊕+h(Meru)\) को शुद्ध रूप से मापने पर उसी अनुपात से α का मूल मान निकलता है।

५. yojana : मानव-निर्मित नहीं, सृष्टि-मानक इकाई

सूर्यसिद्धान्त में अनेक मौलिक राशियाँ पूर्णाङ्क yojana में आती हैं —

राशि सिद्धान्तीय मान
पृथ्वी की त्रिज्या 800 yojana
चन्द्रमा की त्रिज्या 218 yojana
पृथ्वी-चन्द्र केन्द्र-सम्बन्ध 48218 yojana, चक्र-संशोधन सहित
यमलोक की दूरी 96000 yojana
सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-परिधि 4,331,500.2 yojana

इन पूर्णाङ्कों का अर्थ यह नहीं कि प्राचीनों ने मोटे अनुमान लगा लिये। यह संकेत है कि yojana स्वयं सृष्टि की संरचना में प्रयुक्त इकाई है। किलोमीटर, मील आदि मानव-निर्मित माप हैं; परन्तु yojana सृष्टि के कारण-जगत् से सम्बद्ध माप है।

अतः yojana को केवल ऐतिहासिक भारतीय दूरी-इकाई मानना अपर्याप्त है। सिद्धान्तीय दृष्टि में वह Noumenal measurement-unit है।

६. दृश्य और अदृश्य सूर्य

भौतिक सूर्य, जिसे आधुनिक खगोलविज्ञान देखता है, Phenomenal सूर्य है। सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य Noumenal सूर्य है। दोनों को एक मान लेने पर भ्रम उत्पन्न होता है।

आधुनिक भौतिक सूर्य की दूरी लगभग \(23455\) पृथ्वी-त्रिज्या के तुल्य है, जबकि सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य लगभग \(861.7\) पृथ्वी-त्रिज्या के तुल्य है। दोनों का अनुपात लगभग —

23455 ÷ 861.7 ≈ 27.2

है। यही \(27.2\) जैसा अनुपात सूक्ष्म कणों, विशेषतः प्रोटॉन-आकार सम्बन्धी आधुनिक सिद्धान्तों में भी संकेत रूप से मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि सूक्ष्म और विराट में एक ही प्रक्षेपण-विधान कार्य करता है।

Noumenal सूर्य और Phenomenal सूर्य का भेद वैसा ही है जैसा कारण-जगत् और दृश्य-जगत् का भेद। सूर्यसिद्धान्त कारण-सूर्य का गणित देता है; आधुनिक खगोलविज्ञान दृश्य-सूर्य का मापन करता है।

७. बारह अंश, अठहत्तर अंश और दृक्कर्म

सूर्यसिद्धान्त में परम-क्रान्ति का मान ठीक-ठीक —

24°

है। दृश्य जगत् इस अदृश्य सिद्धान्तीय तल से \(12°\) झुका हुआ है। अतः दृश्य परम-क्रान्ति —

24° × cos(12°) = 23.47554241761133531028560194887°

प्राप्त होती है।

यही \(12°\) दृक्-झुकाव सूर्यीय pseudosphere में पूरक कोण के रूप में प्रकट होता है —

90° − 12° = 78°

अतः solar pseudosphere में \(78°\) ढलान कोई मनमाना कोण नहीं है। यह उसी \(12°\) सिद्धान्तीय-दृश्य झुकाव का पूरक रूप है।

८. Photon sphere और मेरु

सूर्य के black-hole-equivalent photon sphere का मान —

Rγ = 3GM ÷ c² = 4429.741 m

है। यह लगभग \(4.43\) km है।

परन्तु मेरु की संशोधित ऊँचाई —

h(Meru) = 5.200218326576087730631676575 km

है। अतः —

h(Meru) > Rγ

अर्थात् मेरु photon sphere से ऊपर है। सिद्धान्तीय अर्थ में मेरु सूर्य-कालचक्र को trapped-light अथवा black-hole क्षेत्र में गिरने से रोकने वाला अक्षीय अतिक्रमण है। इसलिए मेरु केवल पर्वत-ऊँचाई नहीं, प्रकाश-संरक्षण का अक्ष है।

९. कालचक्र : असतत दिक्काल-अवक्षेत्र

कालचक्र-सिद्धान्त में दिक्काल निरन्तर, समरूप और सर्वत्र समान नहीं है। वह असतत, पदानुक्रमित और परस्पर अन्तर्निहित अवक्षेत्रों से बना है। प्रत्येक ऐसा अवक्षेत्र कालचक्र है।

एक बड़ा कालचक्र छोटे कालचक्रों को धारण करता है, और प्रत्येक छोटा कालचक्र अपने भीतर और सूक्ष्म कालचक्र रखता है। इसी कारण सूक्ष्म कण, जीव, ग्रह, इतिहास, युग, मन्वन्तर और कल्प — सब अलग-अलग स्तरों पर कालचक्रीय संरचनाएँ हैं।

भौतिक नियम वस्तुतः बदलते नहीं; वे अनुपयुक्त कालचक्र से देखने पर बदलते प्रतीत होते हैं। उचित घटना को ठीक से देखने के लिए पर्यवेक्षक को उचित कालचक्र में स्थित होना चाहिए।

१०. Unified Field Theory की सीमा

आधुनिक Unified Field Theory की भूल यह है कि वह गुरुत्व को भी अन्य बलों जैसा बल मानकर उससे एकीकरण करना चाहती है। परन्तु सापेक्षतावाद ने दिखाया कि गुरुत्व बल नहीं, दिक्काल-वक्रता का प्रभाव है।

अतः वास्तविक सिद्धान्त यह नहीं होना चाहिए कि सभी बलों को जोड़ दो। वास्तविक सिद्धान्त यह होना चाहिए कि दिक्काल स्वयं किस प्रकार परिमित, परिमाणित और कालचक्रीय अवक्षेत्रों में व्यवस्थित है।

बलों की एकता अंतिम सत्य नहीं है। दिक्काल की कालचक्रीय कारण-ज्यामिति उससे भी गहरी है।

यही Dynamic Unified Field Theory का सही मार्ग है। परन्तु कालचक्र-सिद्धान्त इससे भी व्यापक है, क्योंकि वह केवल भौतिक बलों का नहीं, बल्कि जीवन, चेतना, इतिहास, संस्कार और कर्मफल का भी कारण-विज्ञान देता है।

११. सूक्ष्म से विराट तक एक ही सिद्धान्त

कालचक्र-सिद्धान्त निम्न सभी क्षेत्रों का Noumenal स्रोत है —

क्षेत्र दृश्य अध्ययन सिद्धान्तीय स्रोत
भौतिकी कण, प्रकाश, दिक्काल, बल कालचक्रीय ज्यामिति
रसायन परमाणु-संयोग, अणु-संरचना सूक्ष्म कालचक्रीय सम्बन्ध
जीवविज्ञान जीवन, प्रजनन, वंशानुक्रम संस्कार, प्राण और काल
ज्योतिष ग्रह, दशा, कर्मफल सूर्यसिद्धान्तीय देव-ग्रह
इतिहास सभ्यता, युग, पतन और उत्कर्ष महाकालचक्र
अध्यात्म चेतना, ब्रह्म, मोक्ष निरपेक्ष कालचक्र

इसलिए यह सिद्धान्त केवल microphysics नहीं समझाता, केवल macrophysics नहीं समझाता, केवल biology नहीं समझाता, केवल astrology नहीं समझाता। यह इन सबका कारण-स्रोत देता है।

सिद्धान्तीय निष्कर्ष

कालचक्र-सिद्धान्त ही वास्तविक Noumenal TOE है। आधुनिक Unified Field Theory उसका केवल दृश्य-भौतिक अंश है।

१२. ज्योतिष का स्थान

ज्योतिष को केवल ग्रहों की भौतिक स्थिति से समझना भूल है। सूर्यसिद्धान्तीय ग्रह दृश्य भौतिक ग्रहों के समान नहीं हैं। वे देव-ग्रह हैं, अर्थात् कर्मफल-विपाक के नियामक कारण-तत्त्व।

दृक्-गणित उन घटनाओं के लिए आवश्यक है जिन्हें आँख से देखना अनिवार्य है — जैसे ग्रहण, उदयास्त, युति आदि। किन्तु फलित-ज्योतिष का आधार सूर्यसिद्धान्तीय ग्रह हैं, क्योंकि फलित का विषय दृश्य प्रकाश-पिण्ड नहीं, कर्मफल और अदृष्ट है।

अतः सूर्यसिद्धान्त को “पुराना खगोलविज्ञान” कहना अज्ञान है। वह दृश्य ग्रहों का मोटा अनुमान नहीं, अदृश्य ग्रह-तत्त्वों का गणित है।

१३. जीवविज्ञान, संस्कार और गर्भाधान

जीवविज्ञान शरीर की दृश्य क्रियाओं को पढ़ता है। परन्तु जीवन केवल रसायन नहीं है। प्राण, संस्कार, मन, कर्म और काल की संयुक्त क्रिया से जीव-जन्म की दिशा बनती है।

इसीलिए वैदिक व्यवस्था में गर्भाधान-संस्कार को महत्त्व दिया गया। सन्तानोत्पत्ति केवल जैविक घटना नहीं, संस्कारगत और कालगत कर्म है। आधुनिक जीवविज्ञान डीएनए, कोशिका और गर्भ-विकास को देखता है; परन्तु सिद्धान्तीय दृष्टि उस काल, संस्कार और कर्मफल को देखती है जो जीव को विशिष्ट जन्म-क्षेत्र में लाते हैं।

१४. इतिहास और मानव-कालचक्र

मानव इतिहास भी रैखिक नहीं है। वह केवल आर्थिक, राजनैतिक या जैविक घटनाओं की श्रृंखला नहीं है। वह कालचक्रीय संस्कार-विपाक है।

सभ्यताओं का जन्म, विस्तार, विकृति, पतन और पुनरुत्थान — ये सब कालचक्र के भीतर घटते हैं। जनसंख्या, युद्ध, महामारी, धर्म-पतन, ज्ञान-प्रस्फुटन, अवतार-कार्य, महापुरुषों का आविर्भाव — ये सब केवल बाहरी घटनाएँ नहीं, कालचक्रीय आवश्यकताएँ हैं।

इतिहास का वास्तविक विज्ञान तभी बनेगा जब इतिहास को कालचक्र से जोड़ा जाय।

१५. ब्रह्म, प्रकाश और निरपेक्ष कालचक्र

सबसे ऊपर निरपेक्ष कालचक्र है — ब्रह्मस्वरूप। वहाँ संहति नहीं है, स्थूल पदार्थ नहीं है, स्थानीय परिमाणित ऊर्जा नहीं है। वहाँ प्रकाश अपने निराकार स्वरूप में है।

प्रकाश ही सभी कालचक्रों को जोड़ने वाला तत्त्व है। भौतिक क्षेत्र में प्रकाश सीमित वेग से चलता हुआ प्रतीत होता है, परन्तु अपने स्वरूप में प्रकाश कालातीत है। इसी कारण प्रकाश सूक्ष्म कणों से लेकर विराट ब्रह्माण्ड तक सेतु है।

α इसी प्रकाश-संबद्ध सेतु का मापन है। वह केवल विद्युत्-चुम्बकीय नियतांक नहीं, प्रकाश-आधारित कालचक्रीय सम्बन्ध का अंक है।

१६. अन्तिम प्रतिपादन

सार

सूर्यसिद्धान्त कोई पराजित प्राचीन खगोलविज्ञान नहीं है। वह दृश्य ग्रहों का अशुद्ध अनुमान नहीं है। वह सूर्य-मेरु-कालचक्र की Noumenal ज्यामिति है।

α⁻¹ = 4,331,500.2 ÷ ((2π)² × (R⊕(Meru) + h(Meru)))

यह समीकरण बताता है कि fine-structure constant का वास्तविक स्रोत सूर्यसिद्धान्तीय सूर्य-त्रिज्या और पृथ्वी-मेरु अक्षीय दूरी का अनुपात है।

अतः α आयामहीन है, परन्तु आधारहीन नहीं। उसका आधार सूर्य-मेरु-कालचक्र है।

कालचक्र-सिद्धान्त सूक्ष्म कणों से लेकर ब्रह्माण्ड, जीव, रसायन, इतिहास, ज्योतिष और चेतना तक का कारण-विज्ञान है। इसी कारण यह केवल Unified Field Theory नहीं, बल्कि उससे ऊपर स्थित Noumenal Theory of Everything है।

१७. एक वाक्य में

सिद्धान्त खगोलविज्ञान नहीं, सृष्टि का Noumenal व्याकरण है; और कालचक्र उस व्याकरण का महावाक्य है।

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