History Of Pi (π)

वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात π का इतिहास

अठारहवीं शताब्दी के मध्य से वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात के लिए पाश्चात्य गणितज्ञों और भौतिकविदों ने ग्रीकवर्ण माला के चिह्न π का प्रयोग करना आरम्भ किया। उससे पहले इस संख्या के लिए c (circumference) या p (periphery) का प्रयोग यूरोप में होता था, जिसका अर्थ है 'परिधि'। 'p' से ही ग्रीक चिह्न π का प्रयोग यूरोप में प्रचलित हुआ। किन्तु विद्वानों का मानना है की इस संख्या का ज्ञान प्रागैतिहासिक काल से ही गणितज्ञों को ज्ञात था। इस विषय में आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों की मान्यता निम्नोक्त है :

मिश्र में ईसापूर्व 2589 से 2566 के बीच बने गिज़ा के पिरामिड में पिरामिड के आधार की परिधि और ऊँचाई का परस्पर अनुपात 1760 हाथ और 280 हाथ था, जो 22 / 7 है। इस आधार पर कुछ पाश्चात्य विद्वान अनुमान लगाते हैं की प्रागैतिहासिक मिश्रवासियों को π का मान ज्ञात था, यद्यपि वे इसकी परिभाषा नहीं जानते थे ["We can conclude that although the ancient Egyptians could not precisely define the value of π, in practice they used it". M. Verner, 2003, The Pyramids : Their Archaeology and History, p. 70 ; इसी विचार के अन्य लेखक हैं W. M. F. Petrie, 1940, Wisdom of the Egyptians, p. 30; तथा W. M. F. Petrie ने यही विचार अन्यत्र भी व्यक्त किये हैं : "Surveys of the Great Pyramids",1925, Nature Journal 116 (2930): 942–942. इसी विचार के अन्य लेखक हैं J. A. R. Legon (1991). "On Pyramid Dimensions and Proportions". Discussions in Egyptology 20: 25–34.]

किन्तु अन्य विद्वान इसे केवल संयोग मानते हैं, क्योंकि पिरामिड का आधार वर्गाकार होता है, वृत्ताकार नहीं ; अतः वर्गाकार परिधि के आधार पर वृत्त की परिधि से व्यास के अनुपात का अनुमान लगाना उचित नहीं। रॉजर हेर्त्ज़ फिश्लेर ने तो π के मान का प्रयोग किये बिना पिरामिड की ऊँचाई और परिधि के अनुपात के अन्य कई कारण गिनाएं (Herz-Fischler, 2000, The Shape of the Great Pyramid, Wilfrid Laurier University Press, p. 67–77, 165–166) ।

बेबीलोन में ईसापूर्व 1900 ले 1600 के बीच का एक पकी मिटटी पर आलेख मिला है जिसमे π का मान 25 / 8 (=3.125) प्रयुक्त हुआ है। मिश्र में 19वीं शती ईसापूर्व का प्रमाण Rhind Papyrus बतलाता है की π का मान 16 / 9 के वर्ग (=3.1605) माना जाता था। चीन में π के कई मान प्रचलित थे, जैसे की 3.1547, 3.1623, 3.1556, आदि। ईसा पूर्व 8 से 3 शताब्दी पहले लिखित हिब्रू बाइबिल में वर्णन है की सोलोमन के मंदिर में गोल कूप की परिधि 30 हाथ और व्यास 10 हाथ की थी, जिससे परिधि और व्यास का परस्पर अनुपात 3 प्राप्त होता है। टॉलेमी के समकालीन यहूदी रबी नेहेमिअह ने मिश्नात-ह-मिद्दोत नाम के ग्रन्थ में π का मान 22 / 7 प्रयोग किया है (-James A. Arieti, Patrick A. Wilson, 2003, The Scientific & the Divine, Rowman & Littlefield, p. 9–10)। ऐसे समस्त प्रमाणों का विश्लेषण करके पाश्चात्य विद्वान निष्कर्ष निकालते हैं की π का मान भले ही प्रागैतिहासिक काल में लोगों को मालूम था, इसकी प्राचीनतम उप्पत्ति यूनान के आर्किमिडिज़ ने लगभग ईसापूर्व 250 में सबसे पहले खोजी। आर्किमिडिज़ की पद्धति यह थी की वृत्त को 96 भुजाओं वाला बहुभुज मानकर सभी भुजाओं का योग ज्ञात किया जाए जो वृत्त की परिधि के तुल्य होगा। आर्किमिडिज़ ने जो मान ज्ञात किया वह था अधिकतम 22 / 7 (3.1429) एवं न्यूनतम 3.1408, दोनों का मध्यमान 3.14185 था। 150 ईस्वी में टॉलेमी ने अल्माजेस्ट में π का मान 3.1416 बताया, जो तबतक का सर्वाधिक शुद्ध मान था। पाश्चात्य विद्वानों का अनुमान है कि टॉलेमी ने यह शुद्ध मान आर्किमिडिज़ या पेर्गा के अप्पोलोनिउस की अनुपलब्ध कृतियों से लिया होगा। उपरोक्त पाश्चात्य उपलब्धियों की तुलना में भारतीयों को पिछड़ा हुआ दिखाने के लिए प्रमाण दिया जाता है की भारतीयों द्वारा प्राचीनतम उपलब्ध सिद्धान्त ग्रन्थ माने जाने वाले ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त में π का मान 10 का वर्ग मूल, अर्थात 3.1623, कहा गया है।

इस विषय पर आधुनिक विज्ञान के इतिहास से सम्बंधित "विशेषज्ञों" द्वारा लिखित समस्त आधिकारिक ग्रंथों में ऐसे ही विचार प्रचारित किये जाते हैं। अब देखें कि सच्चाई क्या है।

π के जितने भी मान प्राचीन काल में ज्ञात थे, उन सबमे सबसे शुद्ध मान टॉलेमी का था, किन्तु टॉलेमी का स्रोत क्या था यह कोई नहीं जानता। टॉलेमी ने समस्त सूत्रों, स्थिरांकों एवं अन्य समीकरणों की उपपत्तियां बतायी, किन्तु π का मान कैसे निःसृत हुआ इसपर वे मौन थे। स्पष्ट है कि टॉलेमी को यह मान किसी ऐसे परम्परागत स्रोत से प्राप्त हुआ जिससे उनका सीधा संपर्क नहीं था, अन्यथा अपनी आदत के अनुसार वे उपपत्ति जानने और बताने का पूर्ण प्रयास करते। वृत्त के 96 खंड करके सभी खण्डों को सरल रेखा मानकर गणना करने की पद्धति आर्किमिडिज़ ने खोजी ऐसा बतलाने वाले "विशेषज्ञ" इस तथ्य का उल्लेख नहीं करते कि इस पद्धति का प्रयोग सूर्यसिद्धांत में ज्यापिण्ड साधन में किया गया है, जिसमें π के शुद्ध मान 3.1416 का प्रयोग किया गया है, न की 10 के वर्गमूल का। आर्किमिडिज़ ने वृत्त के 96 खंड तो बताये, किन्तु 3.1416 के स्थान पर स्थूल मान उन्होंने प्राप्त किया। वृत्त के 96 खंड करके सभी खण्डों को सरल रेखा मानकर गणना करने की पद्धति आर्किमिडिज़ ने खोजी ऐसा बतलाने वाले "विशेषज्ञ" इस तथ्य का उल्लेख नहीं करते कि इस पद्धति का प्रयोग सूर्यसिद्धांत में ज्यापिण्ड साधन में किया गया है, जिसमें π के शुद्ध मान 3.1416 का प्रयोग किया गया है, न की 10 के वर्गमूल का। आर्किमिडिज़ ने वृत्त के 96 खंड तो बताये, किन्तु 3.1416 के स्थान पर स्थूल मान उन्होंने बताया, और स्थूल मान पर भी उन्हें इतना संदेह था की उन्होंने न्यूनतम मान और अधिकतम मान की केवल सीमाएं बताईं, शुद्ध मान स्पष्ट तौर पर नहीं बताया।

इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि π का मान 10 का वर्गमूल बतलाने वाला श्लोक सूर्यसिद्धांत में प्रक्षिप्त है, क्योंकि समूचे सूर्यसिद्धांत या भारत के किसी भी सिद्धांत में इस मान का कहीं भी उपयोग नहीं किया गया। इसके विपरीत सूर्यसिद्धांत में ज्यापिण्ड-साधन एवं उत्क्रमज्यापिण्ड-साधन में π का सही मान 48 बार प्रयुक्त किया गया, जिसे संयोग नहीं कहा जा सकता। पाश्चात्य लेखक तो कहते हैं कि सूर्यसिद्धांत टॉलेमी से बाद का ग्रन्थ है, अतः टॉलेमी से π का शुद्ध मान सूर्यसिद्धांत में आया होगा। किन्तु वृत्त को 96 भाग मानकर गणना करने की पद्धाति को रंगनाथ जैसे भारतीय विद्वानों ने शाकल्य का विचार बताया, जो वैदिक काल के विद्वान थे (बृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्क्य के बाद सबसे मूर्धन्य विद्वान शाकल्य को ही बताया गया है , ऋग्वेद की उपलब्ध शाखा भी शाकल ऋषि की है)। वैदिक काल के गणित के ग्रन्थ हैं सूल्वसूत्र, जिनमें यज्ञ की वेदियाँ बनाने के लिए आवश्यक गणित है। इन ग्रंथों में π के स्थूल मान का उपयोग किया गया है क्योंकि वेदी बनाने के लिए π के शुद्ध मान की आवश्यकता नहीं पड़ती, किन्तु ग्रह-गणित में दशमलव के कम से कम 3 - 4 अंकों तक π के शुद्ध मान की आवश्यकता है।, जिस आधार पर कहा जाता है कि ईसापूर्व 600 में जब सूल्वसूत्रों की रचना हुई तब भारतीयों को π के स्थूल मान की ही जानकारी थी। पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार ईसापूर्व 1200 में ऋग्वेद की रचना हुई, जब भारतीय आर्यों में बाइबिल की तरह केवल स्तुतियों वाला धर्म ही विद्यमान था, और जब सूल्वसूत्रों की रचना ईसापूर्व 600 में हुई जिनके आधार पर यज्ञकुण्ड तथा वेदी बनाना संभव हुआ तब कुछ ही दशकों के उपरान्त गौतम बुद्ध ने याज्ञिक धर्म का विरोध करना आरम्भ कर दिया ! इन "विशेषज्ञों" की बात सही मानी जाए तो कुछ ही दशकों तक याज्ञिक कर्मकाण्ड का प्रचलन भारत में रहा ! आश्चर्य की बात है कि तथ्यों को झुठलाने वाले ऐसे बेईमानों को भारत के भी धर्मनिरपेक्ष लोगों द्वारा "विशेषज्ञ" कहकर प्रचारित किया जाता है। अब देखें की उस काल के तथ्य क्या कहते हैं।

महाभारत में उल्लेख है कि अपनी राजधानी गिरिव्रज से जरासंध ने गदा मथुरा पर फेंकी तो मथुरा के पास कुल 99 योजन दूर जाकर वह गदा गिरी। वर्त्तमान में गिरियक नाम के ग्राम में प्रागैतिहासिक गिरिव्रज के ध्वंसावशेष हैं, जो इन्टरनेट पर निम्नोक्त पते पर देखा जा सकता है :

http://wikimapia.org/#lat=25.0164246&lon=85.5241442&z=13&l=0&m=b

मथुरा का इन्टरनेट पता है :

http://wikimapia.org/#lat=27.4997734&lon=77.6799059&z=13&l=0&m=b

दोनों स्थानों का परस्पर देशांतर है :

85.5241442 - 77.6799059 = 7.8442383 अंश

यदि 7.8442383 अंश 99 योजन के तुल्य है तो 360 अंश 4543.46 योजन के बराबर होगा। गिरिव्रज का अक्षांश है 25:00:59.13, जिसकी कोज्या (cosine0 ; cos 25:00:59 = 0.9061866 इष्टस्थानीय एवं विषुवतीय भूपरिधियों का परस्पर अनुपात है। इष्टस्थानीय भूपरिधि 4543.46 योजन है तो विषुवतीय भूपरिधि का मान 5013.826 योजन एवं विषुवतीय भूव्यास का मान 1595.95 योजन होगा।

महाभारत में 99 योजन पूर्णांक संख्या का प्रयोग किया गया है, जिसमे आधे योजन की स्थूलता संभव है, जो 1 / 198 भाग की त्रुटि के तुल्य है। 1595.95 का 198 वाँ भाग है 8 योजन। इसका अर्थ यह है कि महाभारत में वर्णित विषुवतीय भूव्यास का मान 1595.95 योजन औसत है, जिसमे 8 योजन की त्रुटि हो सकती है, अर्थात 1588 से 1604 योजन तक। सूर्यसिद्धान्तानुसार विषुवतीय भूव्यास का मान 1600 योजन है। अतः महाभारत में जिस भूपरिधि और π एवं कोज्या का उपयोग व्यास जी ने किया वह सूर्यसिद्धान्त से मेल खाता है।

व्यास जी ने ही पुराणों की रचना की। नारद पुराण एवं अन्य पुरानों का गणित पूर्णतः सूर्यसिद्धान्तीय है। अतः महाभारत का गणित सूर्यसिद्धान्त से मेल खाए यह तो स्वाभाविक ही है। पाश्चात्य लेखक तो झटपट कह देंगे कि महाभारत और सूर्यसिद्धान्त गुप्त काल की रचनाएं हैं, अर्थात ईसा के पश्चात 400 ईस्वी की।

लेकिन तथ्य कुछ और ही कहते हैं। ईसा से लगभग 500 वर्ष पहले पाटलिपुत्र की स्थापना अजातशत्रु ने की, जो बाद में मगध की राजधानी बन गया। लेकिन पाटलिपुत्र से पहले राजगीर मगध की राजधानी थी। अजातशत्रु के हर्यंक वंशीय पुरखों के काल में भी राजगीर ही मगध की राजधानी थी, कम से कम 7 वीं शती ईसापूर्व तक या उससे भी पहले। गिरिव्रज उससे भी बहुत पहले की राजधानी थी। गिरियक में गिरिव्रज के प्रागैतिहासिक ध्वंसावशेष मिल चुके हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्ष पुरातत्वविदों को गौतम बुद्ध से पहले के बिहार में रूचि ही नहीं है। किन्तु बिना भौतिक उत्खनन किये महाभारत के शाब्दिक उत्खनन द्वारा ही यह सिद्ध किया जा सकता है कि आर्किमिडिज़ से हजारों वर्ष पहले व्यास जी π का शुद्ध मान जानते थे और पृथ्वी के भूगोल से लेकर आकाशीय पिंडों की गतियों का सूक्ष्म ज्ञान भी उन्हें था।

गुप्त काल के आसपास भूव्यास का मान 1600 योजन नहीं, बल्कि 1100 योजन से भी न्यून प्रचलित था, जिसके प्रमाण हैं आर्यभटीय और पञ्चसिद्धान्तिका जैसे ग्रन्थ। अतः भूव्यास 1600 योजन बताने वाले ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त और महाभारत प्रागैतिह्हसिक काल की रचनाएँ हैं, क्योंकि किसी भी ज्ञात ऐतिहासिक काल में भूव्यास का मान 1600 योजन नहीं मिलता।

अब एक अन्य तथ्य पर गौर करें। शाकल्य पद्धति के अनुसार वृत्त की परिधि के 96 खंड किये जाएँ तो प्रत्येक खंड सरल रेखा माना जा सकता है। इसका क्या अर्थ है इसपर आजतक किसी ने प्रकाश नहीं डाला। वृत्त में 21600 कला (360 अंश) होते हैं, जिसे π से विभक्त करें तो त्रिज्या का मान प्राप्त होता है। त्रिज्या का अर्थ है परिधि पर व्यासार्ध-तुल्य चाप द्वारा केंद्र पर बने कोण का कलात्मक मान, जो लगभग 3438 (3437.74677) कला या 57.3 अंश है। त्रिज्या को आधुनिक गणित में रेडियन कहा जाता है। सिद्धांत ज्योतिष से अनजान आधुनिक हिंदी के लेखकों ने त्रिज्या को व्यासार्ध का पर्याय मान लिया है, जो पारम्परिक अर्थ से भिन्न है। वृत्त की परिधि के 96 खंड करें तो प्रत्येक खंड 3.75 अंश (225 कला) का होगा, जिसकी ज्या को त्रिज्या से गुणित करें तो 224.84 या पूर्णांक में 225 प्राप्त होता है जिसे ज्यापिण्ड कहते हैं। लेकिन यदि उक्त खंड को दो गुना कर दें तो 7.5 अंश की ज्या को त्रिज्या से गुणित करने पर 448.716 या स्थूलतः 449 मिलता है, जो की 7.5 अंशों के कलात्मक मान 450 से न्यून है। किन्तु वृत्त की परिधि को 96 खण्डों में बाँटें तो प्रत्येक खंड के ज्यापिण्ड का मान उक्त खंड के कलात्मक मान के तुल्य होता है। शाकल्य सिद्धान्त का तात्पर्य यही है की किसी कोण की ज्यापिण्ड का त्रिज्यात्मक मान उस कोण के कलात्मक मान के तुल्य तभी हो सकता है जब वह कोण वृत्त के 96 वें खंड से बडा न हो।

आर्कीमिदिज़ का योगदान यही था कि उन्होंने वृत्त की परिधि को 96 खण्डों में बांटकर प्रत्येक खंड को सरल रेखा मानते हुए परिधि और व्यास के अनुपात तो त्रिकोणमिति द्वारा मापने का प्रयास किया। किन्तु उन्होंने कोई नयी खोज नहीं की। यह आधुनिक यूरोप का अहंकार है जो प्राचीन यूनान को ही समस्त विद्यायों का स्रोत बतलाने का दुराग्रह पालता है।

1400 ईस्वी के आसपास संगमग्राम के माधव ने अनंत श्रेणी की विधि खोज निकाली, जिसके आधार पर π का मान मनचाहे अंकों तक ज्ञात किया जा सकता है। पश्चिम में इसकी खोज 270 वर्षों के बाद हुई, लेकिन आज भी यूरोपियन विद्वानों के नाम ही छात्रों को पढ़ाये जाते हैं। माधव ने दशमलव के 11 अंकों तक π का शुद्ध मान ज्ञात कर लिया था, लेकिन उन्ही की पद्धति से अरबों अंकों तक π का मान ज्ञात किया जा सकता है, जो संगणकों की सहायता से संभव हुआ है। माधव ने जो मान निकाला, उससे भी अधिक शुद्ध मान निम्नोक्त चमत्कारिक सूत्र द्वारा निकाला जा सकता है :

65656127 = 65656565 - (365 * 6 / 5) अथवा = 65656565 - ऑक्टल 666

अब 18000 के वर्ग को दो गुना करें और फल को 65656127 से विभक्त करें, फल π का वर्ग मिलेगा जो 12 अंकों तक शुद्ध है।

-VJ

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